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Friday, 7 December 2007

नरसंहार

मोदी के पास सोहराबुद्दीन, मिया मुशर्रफ़, आतंकवाद, मदरसे, -------------और न जाने इन जैसे कितने? मुद्दे है, ये तो शायद उन्हें भी नही मालूम, क्योकि किसी भी मुद्दे और घटना को कैसे और कब सांप्रदायिक मोड़ देना है ये उसके होने के बाद वो सोचते होंगे।
- अभी ज्यादा दिन नही हुए जब "तहलका" ने गुजरात दंगो मे बजरंगियो कि वीरगाथा उन्ही कि जुबानी सुनाई और दिखाई थी। इससे ये तो साबित हो ही गया कि गुजरात का नरसंहार सुनियोजित था, " क्रिया कि प्रतिक्रिया" नही था। और इसे गुजरात मे संविधान कि शपथ लेकर शासन करने वालो ने सक्रियता के साथ बढाया, प्रोत्साहित किया और संरक्षण दिया। मोदी और उनकी पिशाच पलटन के अलावा विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, Rss , और भारतीय जनता पार्टी कि इनसब मे सोची समझी साजिश थी।
- इस कुकर्म पर पश्चाताप तो दूर, इसमे शामिल लोग वीरगाथा कि तरह उसका बयान करते है। प्रशासन तंत्र, पुलिस, और इसे रोक सकने कि जिम्मेदारी रखने वाले सब लोग या तो इस संहार मे शामिल थे या उसके उसके "मूक दर्शक"।
- केन्द्र मे नए गठबंधन कि सरकार आने के बाद कई लोग मोदी सरकार कि बर्खास्तगी कि उम्मीद लगाए थे। लेकिन धर्मनिरपेक्षता को अपनी विजय का मुख्य आधार बताने वाली केन्द्र सरकार इस दंगे को लेकर कुछ नही कर पायी। २००२ मे हुए नरसंहार के बाद स्वतंत्र भारत के इतिहास मे सबसे बड़ा हत्यारा राजनेता फिर से चुना गया और वर्त्तमान मे जो हालत है, ऐसे मे वो फिर निष्कंटक चुन गया तो ये लोकतंत्र के माथे पर एक धब्बा होगा।
---बहुत से लोग तर्क(कु) देंगे कि अगर जनता हत्यारे को चुनती है तो उसका जनादेश सिर माथे पर रखना होगा, भले ही उस हत्यारे पर कितनों का खून क्यो न लगा हो। हिटलर भी, जनतांत्रिक तरह से ही हत्यारा तानाशाह बना था।
- कुछ लोग इसे बहुसंख्यक समुदाय कि नाराजगी का डर बताते है, जिससे डर कर केन्द्र इसे हटा नही पा रही है। लेकिन ये कोरी बकवास है। सबसे पहले तो ये हिन्दू समाज कि परम्परा, इतिहास और आत्मबोध का अपमान है, कि उसे हत्यारी राजनीती का पोषक बताया जाये। आख़िर भारत मे जो धरमनिर्पेक्षता है उसका मूलाधार हिन्दू समाज कि अपनी बहुलता और सहिष्णुता ही है।
- सांप्रदायिक राजनीति करने वाले और उसे अपने लाभ के लिए प्रोत्साहित करने वाले सब लोगो को हारना ही होगा। आज नही तो कल ये होकर रहेगा।

Monday, 26 November 2007

हॉवर्ड कि हार

ऑस्ट्रेलिया मे हुए आम चुनाव मे दक्षिणपंथी नेता " जान हॉवर्ड " और उनका दल बुरी तरीके से हार गया है। हॉवर्ड कि ये हार मानीखेज है। 11 साल तक गठबंधन सरकार चलाने वाले हॉवर्ड ने अपने शासन मे अमरीका कि चम्पुगीरी के अलावा कुछ किया भी नही था। दरअसल ये आम चुनाव हार्वर्ड कि नीतियों पर जनमत का फैसला है।
- चुनाव मे फतह पाने वाली "लेबर पार्टी " और उसके नेता "केविन रूड " अब सत्ता संभालेंगे। चुनाव के समय रूड ने "ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव कम करने का प्रयास ", " क्योटो प्रोटोकोल पर हस्ताक्षर करने" और " इराक से सेना वापस" बुलाने का दावा किया था।
- हॉवर्ड ने इमिग्रेशन को अश्वेतो और भूरो के लिए खासा मुश्किल बना दिया था। हार्वर्ड कि हार से भारत को भी फायदा होगा। इमिग्रेशन कानून ढीला होने भारतीयों का वहा जाना आसान होगा, वही "Atomic Enregy" के मुद्दे पर भी भारत को ज्यादा सहयोग मिलने कि उम्मीद है।

Thursday, 8 November 2007

सुनो

" मुसलमानों एवं इस्लाम के बारे मे किसी प्रकार कि कटुता एवं दुर्भावना को अपनी वाणी अथवा वृति मे स्थान न दे, क्योंकि वे भी अपने राष्ट्र के अंग है। "
----पारदर्शक पत्रिका मे छपे ये शब्द संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार के है।

Monday, 22 October 2007

बंदर लीला


रविदास मार्ग से करीब हर दिन ऑफिस के लिए आते वक़्त एक नजारा आम होता है। महंगी कारे फुटपाथ से लगी रहती है, और उसमे से निकला एक हाथ ( हाथ शरीर से लगा होता है और मन, पाप छुपाने के लिए भलाई करता है।) मौसमी फलो को, जो कभी कभी काफी महंगे भी होते है , वानर देवता को उदरस्थ करने के लिए देता जाता है।
- हालांकि वही एक नोटिस बोर्ड भी लगा है। जिसपर बंदरो को किसी भी तरह का खाने का सामान देने कि मनाही लिखी है। लेकिन ऐसी ना जाने कितनी नोटिस लगी रहती है, इनकी परवाह कौन करता है। और तो और कई बार इसी बोर्ड पर बंदर महाराज बिराजे रहते है, और दानवीर का हाथ केले का भोग लगाता रहता है।
- रविवार को दिल्ली प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष बाजवा जी कि मौत ने एक बार फिर समूची दिल्ली मे आवारा जानवरों कि समस्या कि तरफ लोगो का ध्यान खीचा है। हालांकि फौरी ऐलान के बाद सरकार और नगर निगम इस बारे मे कुछ खास नही करने वाला है। ये बात अटल सत्य है।
- हालांकि हर दिन होते अतिक्रमण ने बहुत से जानवरों से उनका नैसर्गिक आवास छीन लिया है। यही वजह है कि ये जानवर आबादी मे घुस आये है। दिल्ली जैसे शहर मे जब हालात ऐसे है तो बाकी जगहों पर जानवरों के रहने वाली जगहों पर होने वाला अतिक्रमण और आबादी को आवारा जानवरों से हो रही परेशानियों का क्या हाल होगा ये तो बस इसे झेलने वाले ही जानते होंगे।

Thursday, 20 September 2007

राम के नाम पर


एक बार फिर मुल्क कि फिजा खराब कि जा रही है। ये सब हो रहा है, एक पुल के नाम पर। सेतु समुन्द्रम प्रोजेक्ट से सम्बंधित एक मुकदमे मे केंद्र सरकार जो हलफनामा दिया, वही इस रगडे कि वजह बन गया है। अपने हलफनामे मे ASI ने राम सेतु के अस्तित्व को तो नकारा ही साथ ही "राम जी" के अस्तित्व पर भी सवाल खड़ा कर दिया।
- राम हों या मोहम्मद, ईसा मसीह हों या कृष्ण किसी वैज्ञानिक प्रमाण के मोहताज नहीं है। ये लोगों की भावनाओं, उनकी आस्थाओं का प्रतीक हैं।
- दरअसल केंद्र सरकार का ये हलफनामा परमाणु मुद्दे से आम लोगो को दूर करने और अपने वामपंथी साथियों कि अकड़ को कम करने के लिए इस्तेमाल किया गया लगता है। वामपंथी इस हो हल्ले मे अपनी बात नही कह सकते, और यही केंद्र सरकार चाहती है।
- जहा तक BJP का सवाल है तो उनके लिए तो "बिल्ली के भाग्य से छिका टुटा" है। UP कि हार से बिखरती इस रामलीला मंडली को नया ऑक्सिजन मिल गया।
- राम के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। आस्था के प्रश्न उठाने और उसे सतही ढंग से झुठलाने की सारी प्रक्रिया बार-बार इसीलिए दोहराई जा रही है क्योंकि मुद्दों पर परिपक्व तरीक़े से बहस करने की राजनीतिक परंपरा अभी तक ठीक से स्थापित नहीं हो सकी है। सरकार ही नहीं, सभी राजनीतिक दलों को यह समझदारी दिखानी चाहिए और बहसों को हमेशा मुद्दों पर केंद्रित रखना चाहिए, राजनीति के अखाड़े में धर्म पर बहस, मंदिरों-मस्जिदों में राजनीतिक बहस हमेशा से जटिलता पैदा करते रहे हैं.

Wednesday, 19 September 2007

आओ खेले राम राम


हां तो भाई राम जी एक फिर ख़तरे मे है। एक बार 'बाबर' ने पंगा ले लिया था। वो तो हमारे भगवा भाई बंधु लोग थे जो बाबर कि निशानी पर चढ़ कर उसे उसकी औकात बता दी। अब एक बार फिर राम जी को खतरा है। न, न इस बार कोई "बाहरी आक्रमणकारी" नही है, बल्कि हिंदुस्तान का एक ख़ानदानी सपूत कह रहा है कि" कौन है ये राम?"
- अब उसे कौन बताये कि ये अयोध्या वाले राम जी है। जो मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाते है। अरे वही जिनके नाम पर, हां सिर्फ नाम पर, भगवा झंडे वालो ने हजारो देशद्रोहियों को उनकी औकात बतायी थी।
- राम के नाम पर ठेकेदारी करने वाले ये वही लोग है जिन्होंने कभी राम के नाम पर वोट लूट कर सरकार बनायीं थी, और सरकारी मलाई मिलते ही ये राम को भूल गए है। ये भूल गए कि इन्होने एक बार नारा दिया था कि" मंदिर वही बनायेंगे"।
- ये फिर दुबारा राम को बचाने का ठेका ले रहे है। एक बार फिर इन्हें दिल्ली फतह करने कि उम्मीद दिखायी देने लगी है। पर शायद इन्हें ये याद नही कि " काठ कि हांडी बार बार नही चढती"।

Thursday, 6 September 2007

जय थानेश्वर

लाल टोपी वाले जनता के सामने तो अकड़ के रहते है लेकिन भगवान् के आगे दंडवत होना उनकी मज़बूरी है। हो भी क्यो ना, आख़िर स्वर्ग किसे नही चाहिऐ। दिन भर नेताओ, गुंडों, ठेकेदारों और अपने आला अफसरों कि नाजायज खवाहिशो को पुरा करते और जनता कि पुकार को अनसुना कर अपनी जेब भरते मासूम पुलिस वाले आख़िर भगवान् कि शरण मे न जाये तो कहा जाये।
- बुधवार को सुबह NDTV पर आ रहे विशेष मे थानों और दफ्तरों मे इश्वर के रहने पर सवाल उठाया गया। कहा जाता है कि ईश्वर सर्वव्यापी है। अब हर जगह है तो थानों और दफ्तरों मे रहने से लोगो को क्यो तकलीफ हो रही है। इसी प्रोग्राम मे रविश कुमार ने "Newsroom" से टिपण्णी कि, की थानों और दफ्तरों मे भगवान् का राजनितिक, आर्थिक और सामाजिक पहलू है। दफ्तरों मे आने वाले "नजराने" को भगवान् पर चढा कर उसे काले से सफेद करने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है। इसके अलावा हर मंदिर पर एक आदमी का रोजगार फिट हो जाता है। जाहिर है मंदिर होगा तो, भक्त आएंगे, भक्त आएंगे तो प्रसाद और धुप बिकेगी, मिला ना दर्जनों को रोजगार। इन मंदिरों का सबसे बड़ा फायेदा राजनितिक है। 1990 के बाद जब "राम लीला मंडळी" ने (इसे भाजपा पढे) "जय राम जी कि" को "जय श्री राम" मे बदल डाला था प्रशासन का "सम्प्रदायिकरण" शुरू हो गया था। मुद्दों कि जगह "राम नाम" को वोट मांगने कि वजह बनाने के बाद थानों और दफ्तरों मे मंदिर बनाने का सिलसिला तेज हो गया।
- यु भी जिस देश मे स्कूलों कि संख्या 2 लाख और मंदिरों कि संख्या 6 लाख हो वहा धार्मिक स्थानो कि थोड़ी और बढ़ जाये तो फर्क नही पड़ता। बहुत दिन हुए जब "जनसत्ता" मे मे "सुभाष गताडे" का एक लेख आया था इसमे सुभाष जी ने जबलपुर और मदुरई का उदाहरण देकर ये समझाया था कि कैसे आम जनता और नगर प्रशासन के तालमेल के बाद दोनो शहरो मे सैकडो अवैध मंदिरों, दरगाहों और पूजा स्थलों को तोड़ा गया था। सारे हिंदुस्तान मे प्रयास तो ऐसे ही होने चाहिऐ, और हो भी रहे है।
- दुसरी जगह का तो कह नही सकता लेकिन मेरे शहर "मुज़फ़्फ़रपुर" का एक वाकया आपके पेशे नजर है। "सादपुरा" जहा मेरा घर है, से "जिला स्कूल" जाते हुए "MDDM" कालेज के सामने एक पीपल का पेड हुआ करता था। 1995 तक वहा दो एक गोल पत्थरों के सिवा और कुछ नही था, एकाएक एक त्यौहार आया, मंदिर के नाम पर कारसेवा हुई और आज वहा सड़क को संकरा किये हुए एक भव्य पूजा स्थल है। अब ऐसे मे सुधार कि क्या गुंजाईश है, आप ही बताये?

Wednesday, 5 September 2007

'फ़र्ज़ी इंटरव्यू'

पॉयनियर और 'स्वतंत्र भारत' ने अक्तूबर 1994 में अपने एक 'फ़र्ज़ी इंटरव्यू' मे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अनंत कुमार सिंह जो तब मुज़फ़्फ़रनगर के ज़िलाधिकारी थे पर ये आरोप लगाया था कि वो महिलाओ के प्रति नकारात्मक सोच रखते है। इस मामले मे लखनऊ के चीफ़ जुडिशियल मजिस्ट्रेट ने दस साल तक चले मुक़दमे के बाद सोमवार को पॉयनियर अख़बार के तत्कालीन रिपोर्टर रमन कृपाल को एक वर्ष सश्रम कारावास और 5500 रुपए जुर्माना भरने की सज़ा सुनाई।
- ये मामला पत्रकारों के सामने एक नजीर पेश करता है। हालांकि इस मामले मे संवाददाता के साथ साथ पॉयनियर के तत्कालीन संपादक अजित भट्टाचार्य, 'स्वतंत्र भारत' के तत्कालीन संपादक घनश्याम पंकज और प्रिंटर-प्रकाशक संजीव कंवर और दीपक मुखर्जी को भी छह-छह महीने की जेल की सज़ा सुनाई गई है। संवाददाताओ के साथ साथ "Boss" को मिली सजा उन सरफिरे संपादकों और मालिकों को एक सीख है जो अपनी TRP और बिक्री के लिए रिपोर्टर का शोषण करने से नही चूकते।

Wednesday, 29 August 2007

ज्यादती या मनोरंजन


मंगलवार को भागलपुर मे एक चोर के पकड़े जाने और उस बाद जो ड्रामा हुआ और सहरसा के DM द्वारा बिहार के CM को पहचानने से इनकार किया जाना, बिहार मे प्रशानिक तंत्र कि कि आम लोगो से विमुखता का जीता जागता प्रमाण है। नितीश कुमार को शायद पता तो होगा ही लेकिन उन्हें पहली बार इस बात का इल्हाम हुआ होगा कि उनके अधिकारी कितने असंवेदनशील है। जब एक जिलाधिकारी, मुख्यमंत्री से सीधे मुह बात नही करता, तो वो बाढ़ से घिरे लोगो से किस क़दर पेश आता होगा ये बात शायद किसी से छुपी नही है। ऐसे भी बाढ़ आने के बाद राहत कार्य करवाने मे DM बहुत मसरूफ रहते है। यही वो मौका होता है जब एक DM लाखो रुपए "जरूरतमंद" लोगो तक पहुचाता है। ऐसे मे CM ने उसे फ़ोन करके परेशान ही किया है।

- भागलपुर मे पुलिस कि मौजूदगी मे जो कुछ हुआ, कम से कम वो सब भागलपुर पुलिस के लिये नया नही है। ऐसा ही कुछ इनलोगों ने " अख् फोरवा काण्ड" के दौरान किया था।

- इस लिये भाई लोग पुलिस और DM साहब से बच कर। इन्हें आप "Public Servant" नही समझे। ये लाट साहब है। ये जो चाहे कर सकते है।

- एक और बात जो भागलपुर काण्ड के दौरान दिखायी देती है वो ये कि आम लोगो ने कैमरा देख कर कुछ ज्यादा ही मर्दानगी दिखा दी। और इन सब को कैमरे के जरिये शूट किया जाता रहा।

Sunday, 26 August 2007

यौमे आजादी कि परेशानिया - 2

सीन 1 -
10 अगस्त को busstand पर उतरने के बाद लगा कि शायद अँधेरे मे अपने stand से आगे या पिछे उतर गया हु। हरदम गुलजार रहने वाली जगह पर शमशान जैसे खामोशी थी। रात को वैसे तो इस इलाके मे लौटती गाडियों कि भीड़ लगी रहती है। लेकिन आज सवारिया भी कम थी। दरअसल यहा कभी सब्जी मंडी हुआ करती थी। शाम के वक्त यहा लोगो कि भरी भीड़ होती थी। सब्जी बेचते लोग, किस्म किस्म कि आवाजे निकालते थे। इन सब्जी वालो से इनकी सब्जियों कि कीमत को लेकर जिरह करती औरते । पुरे इलाके मे एक अजब किस्म का शोर होता था। ये शोर कही से भी परेशान करने वाला नही होता था। लेकिन अब यहा नीम खामोशी पसरी रहती है।
15 अगस्त आकर चला गया। सोचा था कि शायद इन्हें यौमे आजादी तक के लिए हटाया गया है। स्वतंत्रता दिवस के बाद सब्जी बेचने वाले फिर वापस आ जायेंगे। लेकिन इस ब्लॉग को लिखते वक़्त तक वो जगह वीरान ही पडी है।
सीन 2 -
११ अगस्त से १७ अगस्त तक करीब २५ हजार कि आबादी के लिए सब्जी और खाने पीने कि दुसरी चीजो कि जबर्दस्त किल्लत हो गई थी। १८ अगस्त को कुछ सब्जी वालो ने निचली गली मे अपना ठेला लगाया। जाहिर है, पहले जिन लोगो को सब्जी लेने दूर जाना पड़ रह था, उनके लिए ये ठेले बड़ी राहत का बायस थे। लेकिन ये आराम ज्यादा दिन का नही था। २० अगस्त को लोकल थाने के सिपाहियों ने बिल्कुल गुंडों कि तरह सब्जी बेचने वालो पर हमला किया, कई सब्जीफरोश घायल हो गए। अगले दो तीन दिन तक वहा कोई सब्जी वाला नजर नही आया।

सीन 3 -
- दिन २२ अगस्त
निचली सड़क कि गली नंबर २३ के मुह पर भरी भीड़ थी। लोग किसी दुकान मे घुसने के लिए मारा मारी कर रहे थे। जो नही घुस सके थे, वो दुकान के बाहर रखी "Aquaphina" का पानी पी कर, फिर अन्दर जाने कि कोशिश कर रहे थे। दरअसल निचली सडक कि उस गली के बाहर "6 Ten" का स्टोर खुल गया था। इस स्टोर मे सब्जी बेचने कि दुकान खुली थी।
----यानी १५ अगस्त के नाम पर सब्जी फरोशो को बेरोजगार कर, पिछले दरवाजे से स्टोर को बुलावा भेजा गया था। करीब २०० सब्जी फरोशो कि कीमत पर "6 Ten" को यहा सेट किया गया। यानी १५ अगस्त को एक अंग्रेजी हुकूमत की वापसी कि खुशिया तो मनाई गई। वही यहा एक और " कम्पनी" वापस आ गई।

Tuesday, 14 August 2007

तस्लीमा पर हमला

कुछ मसरूफ था इस लिए ब्लॉग नही लिख सका। ज्यादा दिन नही हुए जब बंगलादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन पर हैदराबाद मे हमला हुआ। ये हमला उन कमजोर लोगो ने किया है जिनके पास तस्लीमा कि बातो को काटने का और कोई हथियार नही है। तस्लीमा ने जो कुछ भी लिखा हो, वो गलत है या सही इस पर अभी बात नही करनी है। लेकिन तस्लीमा पर हुआ हमला ठीक वैसा ही है जैसा बजरंगी या शिव सैनिक मकबूल फ़िदा पर करते है या सयाजी विश्वविद्यालय मे।
- सभ्य समाज को ऐसी हरकतों का पुरजोर एह्तेजाज करना चाहिऐ। हम अपनी संस्कृति और धर्म के मामलो मे उन ठेकेदारों को कतई बर्दाश्त नही कर सकते जो धर्म और संस्कृति के बारे मे रत्ती भर भी नही जानते।

Wednesday, 1 August 2007

कलम को सलाम




आज जब आदमी कि पहचान उस के जेब मे पडे पैसे से कि जा रही हो, ऐसे मे कथित तौर पर भूमंडलीकरण कि आंधी मे आई अमीरी ? के बीच गरीब और गरीबी कि सही तस्वीर पेश करने वाले पत्रकार "Palagummi sainath " को प्रतिष्ठित " Ramon Magsaysay Award " से नवाज़ा गया है।
- ये पुरस्कार आज के दौर मे उस ठण्डी हवा कि तरह है, जब पत्रकारो को भूतो और पिशाचो कि कहानिया लाने का दवाब झुलसाता रहा है।
- विकास कि अंधी दौर मे जब हर तरफ पैसे कि झूठी शान बघारी जा रही हो। भारत से गरीबी के "बिला" जाने का दावा किया जा रहा हो, ऐसे मे sainath कि कलम समाज को आइना दिखाने का काम कर रही है।
- इस कलम को सलाम --------

Monday, 30 July 2007

ये नही मानेंगे

" चालकों को निर्देश दिया जाता है कि गेयर बदलने के लिये कलच का प्रयोग करे। गाडी बंद करने के बाद चाभी निकाल ले। " ये वाक्य करीब करीब हर डीटीसी बस मे चालक के नजदीक लिखी रहती है। बावजूद इसके मैंने कभी चालकों को कलच का प्रयोग करते हुए नही देखा। कल बस से सफ़र के दौरान चालक कि इस "तेजी" पर ध्यान गया। बिना कलच दबाये वो ऐसे गेयर बदल रहा था , जैसे गोवा मे सरकार बदलती है। शायद यही ग़ैर जिम्मेदाराना रवैया है कि बहुत कम वक्त मे DTC कि बसें खटारा हो जाती है। चालक, बसो को सरकारी सम्पति मान कर ऐसे ही रगड़ते रहते है। यही सब वजहे है कि दिल्ली परिवहन को हर दिन करोडो का घाटा होता है।
- निजी बस मालिक साल दो साल मे अपनी बसो को २ से ४ कर लेते है वही, सरकारी परिवहन व्यवस्था हमेशा घाटे का सौदा साबित होती है।

Saturday, 28 July 2007

जो कहते है दर्द के मारे वो मत लिखो

9 जुलाई को chhattisgarh के errabore मे पुलिस के गश्ती दल पर हमला हुआ था। CRPF के १६ जवानों सहित जिला पुलिस के जवान और SPO भी इस नक्सली हमले मे खेत रहे। मुझे अपने stringer और Bureau Head से मुझे जो खबर मिली उसके अनुसार ८०० कि तादाद मे नक्सलियों ने तलाशी अभियान से लौट रही पुलिस पार्टी पर हमला किया था। अपने हफ्तावार प्रोग्राम के लिए मैंने स्टोरी बनायीं जिसमे घटना का विवरण और राज्य मे बढती हिंसा पर जोर था। अपनी स्टोरी मे मैंने नक्सल समस्या के हल के लिए बंदूक के इस्तेमाल को ग़ैर जरुरी बताया, इसके साथ साथ विकास योजनाओ मे जनता कि सीधी भागीदारी और भूमि के समान वितरण को नक्सल समस्या के समूल खात्मे के लिये जरुरी बताया था। जाहिर सी बात है छत्तीसगढ़ मे हिंसा बढ रही है, इसका मतलब है कि वो जरुरी काम नही हो रहे है जो शासन को करने चाहिऐ थे। स्टोरी एडिट होकर तैयार थी के इसे अपने सिनिअर्स को दिखाने का हुक्म मिला ।
- स्टोरी preview करने के बाद मुझसे कहा गया कि" पहले नक्सलियों के साथ थे क्या। " मेरे जवाब मिलने से पहले ही हुक्म मिला के " स्टोरी सरकार और पुलिस के पक्ष मे करो।
- क्या करता, अगले आधे घंटे मे वो स्टोरी बदल चुकी थी।
-ऑफिस से लौटते वक्त मेरी जुबान पर ये शेर था.........

हाकिम कि तलवार मुक़द्दस होती है,
हाकिम कि तलवार के बारे मे मत लिखो।
वो लिखो बस जो भी अमीरे- शहर कहे,
जो कहते है दर्द के मारे मत लिखो।

Tuesday, 24 July 2007

'बस' के सफ़र से बस तौबा


दिल्ली मे आज कल बस मे सफ़र करना सिर्फ सफ़र नही बल्कि " suffer" करना है। दिल्ली सरकार ने अपने तुगलकी फैसले मे एकाएक सारी निजी बसो को बंद करवा दिया है। बहाना है इनकी रफ़्तार पर रोक लगाने का, जिसके बारे मे लाल बत्ती मे घूमने वालो का कहना है कि ये जानलेवा है। हालांकि आकडे बताते है कि निजी बसो जिस तरह सड़को को रौंदती है, आम लोगो को कुचलती है, DTC उससे पिछे नही है। डीटीसी का स्टाफ वैसा ही रुखा और बेहूदा होता है जैसा ब्लू लाईन का।
- आज हालत ये है कि आप घंटो स्टाप पर खडे है और सडक से बस नदारद है। दिल्ली कि करीब ६७ फीसद जनता निजी परिवहन का उपयोग करती है। सरकार के एकाएक तुगलकी फैसले ने सफ़र करना मुश्किल बना दिया है।
- इस हो हल्ले मे सबसे ज्यादा पीसी जा रही है वो कामकाजी महिलाये जो हर दिन इन बसो का इस्तेमाल करती है। ये जानकर भी कि इस बस मे जाने का मतलब है, अपनी बेइज्जती करवाना, ये मेहनतकश महिलाये सफ़र करने को मजबूर है।

Wednesday, 18 July 2007

आओ खेले मांगली मांगली

सुना था "रेखा " मांगलिक थी, इस लिए जिसने भी उससे शादी कि वो धरती पर रेखा कि सेवा नही कर सका। खैर रेखा कि बात बाद मे। अभी हाल मे एय्श कि शादी हुई। उसकी भी शादी मे मंगल का दोष था, इस लिये ना जाने " angry young ? man " ने किस किस से उसकी शादी करायी, फिर अपने सुपुत्र अभिषेक के साथ उसका " पाणी ग्रहण" संस्कार करवाया।

- आज हमारे न्यूज़ रूम मे भी यही बहस का विषय बना था। लड़को को तो कोई भी भली लडकी मिल जाये तो वो " तर " जाये, इसलिये न्यूज़ रूम के चन्द कुवारे ( गौर करे ये बहुत कोशिशो से बचे है) लड़को को इसमे कोई दिलचस्पी नही थी। लडकिया अपने जन्मपत्री को लेकर ऐसे बांच रही थी जैसे बनारस का कोई पंडा अपने श्री मुख से पाठ कर रहा हो। कोई बोल रही थी लड़का लड़की दोनो का मांगलिक होना बहुत शुभ होता है। तो कोई लड़को का मांगलिक होना शुभ बता रही थी।

- पता नही क्यो पढे लिखे लोग भी इस तरह के अंधविशवास को ढोते है। ये ठीक वैसे ही है जैसे बहुत से लोग नयी गाडी लेकर पहले मंदिर जाते और उसे कई तरह के निशानों से पोत लेते है। मोटे सेठ अपने यहाँ काम करने वाले मजदूरों को वाजिब पगार नही देता लेकिन , " जय माता दी" के नाम पर लाखो का दान दे देता है।
- साथ काम करने वाली इन लड़कियों कि हालत रेत मे फसे उस आदमी कि तरह है जिसे हमेशा कुछ दुरी पर पानी का नख्लिस्तान नजर आता है।

- हालांकि सभी बडे बडे अदारो से पढ़ कर आयी है। वो भी दिल्ली के कालेजो से जहा सबो का दाखिला भी नही होता। लेकिन लगता है ये सिर्फ डिग्री के एतेबार से भारी है, दिमागी एतेबार से ये ना सिर्फ ये हलकी है बल्कि खाली भी है।

Friday, 6 July 2007

गोंड आदिवासी कला


गोंड जनजाति के कलाकार भले ही विदेशी भाषा नहीं जानते हो पर इनकी चित्रकला जर्मनी, इटली, फ्रांस और ब्रिटेन में पहुँच रही है और सराही जा रही है। जी हां, अब इन गोंड जनजाति को विदेशो मे पहचान मिल रही है।
- मिसाल के तौर पर, मध्य प्रदेश के मंडला जिले के सुनपुरी गाँव में जन्मी दुर्गाबाई की बनाई हुई तस्वीरें एक फ्रांसीसी किताब में छापी गई हैं जिसे अनुष्का रविशंकर और श्रीरीष राव ने लिखा है।
- अँगरेज़ी में बेगम रुकैया सख़ावत हुसैन के कहानी संग्रह 'सुल्तान ड्रीम' में भी दुर्गाबाई के चित्रों को देखा जा सकता है।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित एक अन्य गोंड कलाकार हैं भज्जू श्याम, भज्जू की तस्वीरों का एक संकलन 'द लंदन जंगलबुक′ के नाम से इटैलियन डच, फ्रेंच और अँगरेज़ी में प्रकाशित की जा चुकी है। इसकी अब तक तीस हज़ार से भी ज्यादा प्रतियां बेची जा चुकी हैं. इस किताब के लिए भज्जू को 'इंडिपेंडेंट पब्लिशर अवार्ड' भी मिल चुका है।
- कल तक मजदूरी कर किसी तरह जीवनयापन करने वाले ये गोंड अब अपने नैसर्गिक हुनर के जरिये कम से कम भूखे तो नही सो रहे है। हालांकि अभी आदिवासी क्षेत्रो मे इन्लोगो के जीवन मे अभी और विकास कि सम्भावना है। जरुरत है तो बस एक ईमानदार कोशिश कि, जिससे ये भोले लोग अपना भोलापन और सादगी बचा कर रख सके।

Monday, 2 July 2007

बंगाल कि जादुगरनी


बचपन मे सुना था कि बंगाल कि जादुगरनिया आदमी को जानवर बना क़ैद कर लेती है। लोक कवि भिखारी ठाकुर ने भी अपने गीतो मे पूर्वांचल कि उन औरतो के दर्द को उकेरा है जिनमे उनके पति उस समय बंगाल कमाने जाते थे और फिर लंबे समय तक वापस नही आते थे। भिखारी ठाकुर के गीतो मे विरह वेदना मे तड़पती उन औरतो का दर्द है, जो गीतो के माध्यम से बंगाली जादुगार्नियो पर उनके शौहरो को बरगलाने का जिम्मेदार मानती थी। उस वक्त तो ये सुनी सुनायी बाते थी। लेकिन अब तो एक सचमुच कि जादूगरनी आ गई है।

- पीसी सरकार (जूनियर) की 27 साल वर्षीय बेटी मानेका सरकार हाल में कोलकाता के स्टार थिएटर में आयोजित अपने पहले एकल शो के बाद देश की पहली पेशेवर महिला जादूगर बन गईं। आठ पीढ़ियों तक पुरुष ही इस खानदानी विरासत को आगे बढ़ाते रहे। लेकिन अब सरकार खानदान की नौवीं पीढ़ी की संतान मानेका ने इस जादुई विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया है।

- जादूगर P C सरकार हिंदुस्तान के जाने माने अय्येयार है। इनके पूर्वज बादशाह "जहाँगीर " के दरबार मे अपने फन का मुजाहेरा करते थे। बादशाह ने खुश होकर उस समय उन्हें "ढाका " के पास एक जमींदारी दी थी। तब से पुरा खानदान जादूगरी को ही पेशा बना कर अपने फन से लोगो का मनोरंजन कर रहा था। अब इस नौवी पीढी मे सिर्फ लडकिया थी, और ये आशंका जतायी जा रही थी कि क्या अब इस कला को आगे बढ़ाने वाला कोई नही होगा। जादूगर पी सी सरकार ने इन सब आशंकाओ को गलत साबित करते हुए अपनी विरासत अपनी बेटी को सौप दी। उम्मीद करनी चाहिए कि ये महिला जादूगर अपनी विरासत को बेहतरीन ढंग से आगे बढ़ाते हुए नए कीर्तिमान बनाएगी।

Friday, 29 June 2007

रामलीला मंडळी मे जूतम पैजार



BJP यानी रामलीला मंडळी मे एक बार फिर जूतम पैजार शुरू हो गई है। कार्यकारिणी कि बैठक मे जंग लगे लौह पुरुष ने संघ शरणागत राजनाथ सिंह के राज करने के तरीके पर उंगली उठा दी है। जाहिर सी बात है कि अभी आडवानी को मौका मिला है कि संघ ने उनकी जो बेइज्जती कि थी उसका बदला लिया जाये। आडवानी को पाकिस्तान कि यात्रा के दौरान दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ था कि " जिन्नाह सेकुलर थे "। उनके इस ज्ञान को प्रवचन कर सबको दीक्षित करने का खामियाजा आख़िर उन्ही को मिलना था सो मिला।
- आडवानी को UP और गोवा कि हार से संघ और राजनाथ मंडळी पर हमला करने का अच्छा बहाना मिल गया। दरअसल दोनो राज्यों मे हुए चुनाव मे पार्टी ने आडवानी खेमे को नजरअंदाज कर, संघ के निर्देशो के अनुसार काम किया था। हर जिले मे संघ के दर्जन भर पदाधिकारी BJP का प्रचार करने मे लगे थे। CD काण्ड इसी का नमूना था।
- इनसब के बाद भी अगर BJP का इन राज्यों मे कोई नामलेवा नही बचा तो जाहिर सी बात है कि आडवानी मौका देख कर चौका मारे। राष्ट्रपति चुनाव मे भैरो सिंह शेखावत का खड़ा होना और शिव सेना का इस मुद्दे पर अपने को एनडीए से अलग कर लेना इस बात को दिखाता है कि , लगातार होती हार से भगवा टीम मे अफरा तफरी मची है। अब देखना ये है कि सत्ता कि चाशनी मे लिपटा " राम लीला मंडली का गठबंधन कितनी जल्दी तार तार होता है। क्योकि देश हित मे इस नफरत फ़ैलाने वाली पार्टी का बर्बाद होना ही देश को आबाद रखेगा।

Wednesday, 27 June 2007

सिक्को का नया मोल

भाई लोग कभी सिक्को से दाढ़ी बनाईं है। " हां...हां ...बनाईं है भाई, तुम भी तो बनाते होगे। नाई के यहा सिक्के दे कर ही तो बनती है दाढ़ी।" बेशक बनती है पर तेजी से बदलती इस दुनिया मे जहा " Recycle" का जमाना है, कुछ भाई लोग गंदगी साफ कर रहे है........गंदगी नही साफ कर रहे है बल्कि सिक्के साफ कर रहे है।
----बंगलादेश सीमा पर सिक्को कि तस्करी हो रही है। बांग्लादेश में इन सिक्कों से रेज़र ब्लेड बनाए जा रहे हैं। इस तस्करी के कारण भारत के कई हिस्सों में सिक्कों की कमी हो गई है. हाल मे कोलकाता पुलिस द्वारा पकडे गए एक तस्कर ने इस बात का खुलासा किया है कि हमारे एक रुपए के सिक्के की कीमत दरअसल 35 रुपए जितनी है क्योंकि सिक्के से पाँच से लेकर सात ब्लेड बनाते हैं।
- इन इलाको मे सिक्के कि किल्लत से एक नई मुद्रा चलन मे आ गई है। सिक्कों की कमी से निपटने के लिए असम प्रदेश में चाय-बागान वाले अपने कर्मचारियों को कार्डबोर्ड या गत्ते से बनी सिक्कों की पर्चियाँ दे रहे हैं। इन पर्चियाँ पर लिखा रहता है कि ये पचास पैसे का सिक्का है,एक रुपए का या उससे ज़्यादा का। बागान के भीतर चीज़ें खरीदने या बेचने के लिए इन पर्चियों का इस्तेमाल किया जाता है।
- तो भाई बचा कर रखे अपने पास खुदरा पैसा। ये चिल्लर नही, बहुत काम कि चीज है। और अपने पास ज्यादा खुदरा पैसे नही रखे , वर्ना कल अखबारो मे ये शब्द मिलेंगे " पुलिस ने एक तस्कर को रंगे हाथो पकडा है। जिसके पास अठन्नी और चवन्नी मिली है।"