मोदी के पास सोहराबुद्दीन, मिया मुशर्रफ़, आतंकवाद, मदरसे, -------------और न जाने इन जैसे कितने? मुद्दे है, ये तो शायद उन्हें भी नही मालूम, क्योकि किसी भी मुद्दे और घटना को कैसे और कब सांप्रदायिक मोड़ देना है ये उसके होने के बाद वो सोचते होंगे।
- अभी ज्यादा दिन नही हुए जब "तहलका" ने गुजरात दंगो मे बजरंगियो कि वीरगाथा उन्ही कि जुबानी सुनाई और दिखाई थी। इससे ये तो साबित हो ही गया कि गुजरात का नरसंहार सुनियोजित था, " क्रिया कि प्रतिक्रिया" नही था। और इसे गुजरात मे संविधान कि शपथ लेकर शासन करने वालो ने सक्रियता के साथ बढाया, प्रोत्साहित किया और संरक्षण दिया। मोदी और उनकी पिशाच पलटन के अलावा विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, Rss , और भारतीय जनता पार्टी कि इनसब मे सोची समझी साजिश थी।
- इस कुकर्म पर पश्चाताप तो दूर, इसमे शामिल लोग वीरगाथा कि तरह उसका बयान करते है। प्रशासन तंत्र, पुलिस, और इसे रोक सकने कि जिम्मेदारी रखने वाले सब लोग या तो इस संहार मे शामिल थे या उसके उसके "मूक दर्शक"।
- केन्द्र मे नए गठबंधन कि सरकार आने के बाद कई लोग मोदी सरकार कि बर्खास्तगी कि उम्मीद लगाए थे। लेकिन धर्मनिरपेक्षता को अपनी विजय का मुख्य आधार बताने वाली केन्द्र सरकार इस दंगे को लेकर कुछ नही कर पायी। २००२ मे हुए नरसंहार के बाद स्वतंत्र भारत के इतिहास मे सबसे बड़ा हत्यारा राजनेता फिर से चुना गया और वर्त्तमान मे जो हालत है, ऐसे मे वो फिर निष्कंटक चुन गया तो ये लोकतंत्र के माथे पर एक धब्बा होगा।
---बहुत से लोग तर्क(कु) देंगे कि अगर जनता हत्यारे को चुनती है तो उसका जनादेश सिर माथे पर रखना होगा, भले ही उस हत्यारे पर कितनों का खून क्यो न लगा हो। हिटलर भी, जनतांत्रिक तरह से ही हत्यारा तानाशाह बना था।
- कुछ लोग इसे बहुसंख्यक समुदाय कि नाराजगी का डर बताते है, जिससे डर कर केन्द्र इसे हटा नही पा रही है। लेकिन ये कोरी बकवास है। सबसे पहले तो ये हिन्दू समाज कि परम्परा, इतिहास और आत्मबोध का अपमान है, कि उसे हत्यारी राजनीती का पोषक बताया जाये। आख़िर भारत मे जो धरमनिर्पेक्षता है उसका मूलाधार हिन्दू समाज कि अपनी बहुलता और सहिष्णुता ही है।
- सांप्रदायिक राजनीति करने वाले और उसे अपने लाभ के लिए प्रोत्साहित करने वाले सब लोगो को हारना ही होगा। आज नही तो कल ये होकर रहेगा।
Friday, 7 December 2007
Saturday, 1 December 2007
राम शिला या एक और चुनावी मुद्दा
आज ऑफिस आते वक़्त एक तथाकथित राष्ट्रवादी पार्टी का प्रचार रथ( जीप) पीछे से शोर मचाते बगल से निकला। इस रथ पर एक शीशे के एक्वेरियम मे कुछ तैर रहा था। कुछ आगे जाकर ये रथ एक नुक्कड़ पर रूक गया। कौतुहलवश मैने भी अपनी मोटरसाईकिल उस तरफ मोड़ दी।
- राम धुन के भजन के साथ उस पार्टी के कारसेवको ने उस पत्थर को सब लोगो को राम शिला कह कर, पूजा करने कि सलाह दी। मैंने उस पत्थर को हाथ से स्पर्श करने का अनुरोध किया।
- वो पत्थर, पत्थर न होकर मूंगे कि चट्टान थी। हालांकि इस बात को वहा "सेवको " को बताना अपनी सेवा करवाने जैसा था, इसलिए चुपचाप रामजी कि मूर्ति को प्रणाम कर, मै वापस अपनी राह पर चल पड़ा।
- राम सेतु भारतीय जनमानस के मन मे सदियों से रचा बसा है। इस लिए कार सेवको कि वो चट्टान, पत्थर नही है तो , इससे राम सेतु को कोई फर्क नही पड़ता। राम सेतु रामायण मे वर्णित है तो ये हमारे लिए पूज्य है।
- लेकिन इस पवित्र सेतु को मुद्दा बना कोई पार्टी अपना उल्लू सीधा करे तो ये सरासर गलत है।
- हमारे देश के कुछ दल इसी तरह के भावनात्मक मुद्दों के जरिये चुनाव जीतना अपना शगल बना चुके है। ये हरकत न सिर्फ देश के लोकतंत्र के साथ मजाक है, बल्कि ये हम हिन्दुस्तानियों कि भावनाओ के साथ भी भद्दा मजाक है।
- राम धुन के भजन के साथ उस पार्टी के कारसेवको ने उस पत्थर को सब लोगो को राम शिला कह कर, पूजा करने कि सलाह दी। मैंने उस पत्थर को हाथ से स्पर्श करने का अनुरोध किया।
- वो पत्थर, पत्थर न होकर मूंगे कि चट्टान थी। हालांकि इस बात को वहा "सेवको " को बताना अपनी सेवा करवाने जैसा था, इसलिए चुपचाप रामजी कि मूर्ति को प्रणाम कर, मै वापस अपनी राह पर चल पड़ा।
- राम सेतु भारतीय जनमानस के मन मे सदियों से रचा बसा है। इस लिए कार सेवको कि वो चट्टान, पत्थर नही है तो , इससे राम सेतु को कोई फर्क नही पड़ता। राम सेतु रामायण मे वर्णित है तो ये हमारे लिए पूज्य है।
- लेकिन इस पवित्र सेतु को मुद्दा बना कोई पार्टी अपना उल्लू सीधा करे तो ये सरासर गलत है।
- हमारे देश के कुछ दल इसी तरह के भावनात्मक मुद्दों के जरिये चुनाव जीतना अपना शगल बना चुके है। ये हरकत न सिर्फ देश के लोकतंत्र के साथ मजाक है, बल्कि ये हम हिन्दुस्तानियों कि भावनाओ के साथ भी भद्दा मजाक है।
Monday, 26 November 2007
हॉवर्ड कि हार
ऑस्ट्रेलिया मे हुए आम चुनाव मे दक्षिणपंथी नेता " जान हॉवर्ड " और उनका दल बुरी तरीके से हार गया है। हॉवर्ड कि ये हार मानीखेज है। 11 साल तक गठबंधन सरकार चलाने वाले हॉवर्ड ने अपने शासन मे अमरीका कि चम्पुगीरी के अलावा कुछ किया भी नही था। दरअसल ये आम चुनाव हार्वर्ड कि नीतियों पर जनमत का फैसला है।
- चुनाव मे फतह पाने वाली "लेबर पार्टी " और उसके नेता "केविन रूड " अब सत्ता संभालेंगे। चुनाव के समय रूड ने "ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव कम करने का प्रयास ", " क्योटो प्रोटोकोल पर हस्ताक्षर करने" और " इराक से सेना वापस" बुलाने का दावा किया था।
- हॉवर्ड ने इमिग्रेशन को अश्वेतो और भूरो के लिए खासा मुश्किल बना दिया था। हार्वर्ड कि हार से भारत को भी फायदा होगा। इमिग्रेशन कानून ढीला होने भारतीयों का वहा जाना आसान होगा, वही "Atomic Enregy" के मुद्दे पर भी भारत को ज्यादा सहयोग मिलने कि उम्मीद है।
- चुनाव मे फतह पाने वाली "लेबर पार्टी " और उसके नेता "केविन रूड " अब सत्ता संभालेंगे। चुनाव के समय रूड ने "ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव कम करने का प्रयास ", " क्योटो प्रोटोकोल पर हस्ताक्षर करने" और " इराक से सेना वापस" बुलाने का दावा किया था।
- हॉवर्ड ने इमिग्रेशन को अश्वेतो और भूरो के लिए खासा मुश्किल बना दिया था। हार्वर्ड कि हार से भारत को भी फायदा होगा। इमिग्रेशन कानून ढीला होने भारतीयों का वहा जाना आसान होगा, वही "Atomic Enregy" के मुद्दे पर भी भारत को ज्यादा सहयोग मिलने कि उम्मीद है।
Saturday, 24 November 2007
आख़िर ये ही निशाना क्यो ?
नरोदा पाटिया से लेकर नंदीग्राम तक एक ही खास तबका निशाने पर है। दक्षिणपंथी हो वामपंथी सभी उन्हें अपने कब्जे मे लेने और घेटो मे रखने के लिए कोशिशे कर रहे है। दरअसल पूर्ण बहुमत पाए बुद्धदेव, मोदी कि तरह बरताव कर रहे है। २००२ मे भी कुछ ऐसा ही हुआ था। उस नरसंहार का सीधा असर चुनाव पर पड़ा और लोकतंत्र को धोखा देकर एक हत्यारा उस राज्य का भाग्यविधाता बन गया है।
- बंगाली भद्रलोक के कथित प्रतिनिधि बाबु बुद्धदेव भी प्रचंड बहुमत पाकर लगता है, निरंकुश हो गए है। यही वजह है कि अब वो राज्य के लोगो का बटवारा "अपने लोग" और " वो लोग" के तौर पर कर रहे है।
- दरअसल नंदीग्राम कि हिंसा हो या कोलकाता का हालिया उप्रद्रव, इन सबसे एक बात तो साबित हो ही गयी कि बंगाली समाज, को पिछले ३० सालो मे वामपंथियों ने "लाल " कर दिया है।
- जिस राज्य का "डीजीपी" प्रदेश कि कानून व्यवस्था ठीक रखने कि अपनी जिम्मेदारी छोड़ कर "एक मुसलमान, और एक हिन्दू" के बीच का विवाह, बरबाद करने पर तुला हो, वो पुलिस और वो डीजीपी तनाव और हिंसा के वक्त निरपेक्ष होकर काम कर सकेगा, इसकी गुंजाइश कम ही होती है।
- रिजवान, नंदीग्राम और कोलकाता कि घटनाओं के समय केन्द्र सरकार कि चुप्पी इसकी नपुंसकता प्रदर्शित करता है। दरअसल केन्द्र सरकार किसी काम कि नही है ये तो उसी वक्त पता चल गया था जब सारे सबूत होने के बाद भी इसने गुजरात कि सरकार को बर्खास्त नही किया।
- बंगाली भद्रलोक के कथित प्रतिनिधि बाबु बुद्धदेव भी प्रचंड बहुमत पाकर लगता है, निरंकुश हो गए है। यही वजह है कि अब वो राज्य के लोगो का बटवारा "अपने लोग" और " वो लोग" के तौर पर कर रहे है।
- दरअसल नंदीग्राम कि हिंसा हो या कोलकाता का हालिया उप्रद्रव, इन सबसे एक बात तो साबित हो ही गयी कि बंगाली समाज, को पिछले ३० सालो मे वामपंथियों ने "लाल " कर दिया है।
- जिस राज्य का "डीजीपी" प्रदेश कि कानून व्यवस्था ठीक रखने कि अपनी जिम्मेदारी छोड़ कर "एक मुसलमान, और एक हिन्दू" के बीच का विवाह, बरबाद करने पर तुला हो, वो पुलिस और वो डीजीपी तनाव और हिंसा के वक्त निरपेक्ष होकर काम कर सकेगा, इसकी गुंजाइश कम ही होती है।
- रिजवान, नंदीग्राम और कोलकाता कि घटनाओं के समय केन्द्र सरकार कि चुप्पी इसकी नपुंसकता प्रदर्शित करता है। दरअसल केन्द्र सरकार किसी काम कि नही है ये तो उसी वक्त पता चल गया था जब सारे सबूत होने के बाद भी इसने गुजरात कि सरकार को बर्खास्त नही किया।
Thursday, 8 November 2007
सुनो
" मुसलमानों एवं इस्लाम के बारे मे किसी प्रकार कि कटुता एवं दुर्भावना को अपनी वाणी अथवा वृति मे स्थान न दे, क्योंकि वे भी अपने राष्ट्र के अंग है। "
----पारदर्शक पत्रिका मे छपे ये शब्द संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार के है।
----पारदर्शक पत्रिका मे छपे ये शब्द संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार के है।
Monday, 22 October 2007
बंदर लीला

रविदास मार्ग से करीब हर दिन ऑफिस के लिए आते वक़्त एक नजारा आम होता है। महंगी कारे फुटपाथ से लगी रहती है, और उसमे से निकला एक हाथ ( हाथ शरीर से लगा होता है और मन, पाप छुपाने के लिए भलाई करता है।) मौसमी फलो को, जो कभी कभी काफी महंगे भी होते है , वानर देवता को उदरस्थ करने के लिए देता जाता है।
- हालांकि वही एक नोटिस बोर्ड भी लगा है। जिसपर बंदरो को किसी भी तरह का खाने का सामान देने कि मनाही लिखी है। लेकिन ऐसी ना जाने कितनी नोटिस लगी रहती है, इनकी परवाह कौन करता है। और तो और कई बार इसी बोर्ड पर बंदर महाराज बिराजे रहते है, और दानवीर का हाथ केले का भोग लगाता रहता है।
- हालांकि वही एक नोटिस बोर्ड भी लगा है। जिसपर बंदरो को किसी भी तरह का खाने का सामान देने कि मनाही लिखी है। लेकिन ऐसी ना जाने कितनी नोटिस लगी रहती है, इनकी परवाह कौन करता है। और तो और कई बार इसी बोर्ड पर बंदर महाराज बिराजे रहते है, और दानवीर का हाथ केले का भोग लगाता रहता है।
- रविवार को दिल्ली प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष बाजवा जी कि मौत ने एक बार फिर समूची दिल्ली मे आवारा जानवरों कि समस्या कि तरफ लोगो का ध्यान खीचा है। हालांकि फौरी ऐलान के बाद सरकार और नगर निगम इस बारे मे कुछ खास नही करने वाला है। ये बात अटल सत्य है।
- हालांकि हर दिन होते अतिक्रमण ने बहुत से जानवरों से उनका नैसर्गिक आवास छीन लिया है। यही वजह है कि ये जानवर आबादी मे घुस आये है। दिल्ली जैसे शहर मे जब हालात ऐसे है तो बाकी जगहों पर जानवरों के रहने वाली जगहों पर होने वाला अतिक्रमण और आबादी को आवारा जानवरों से हो रही परेशानियों का क्या हाल होगा ये तो बस इसे झेलने वाले ही जानते होंगे।
Thursday, 20 September 2007
राम के नाम पर

एक बार फिर मुल्क कि फिजा खराब कि जा रही है। ये सब हो रहा है, एक पुल के नाम पर। सेतु समुन्द्रम प्रोजेक्ट से सम्बंधित एक मुकदमे मे केंद्र सरकार जो हलफनामा दिया, वही इस रगडे कि वजह बन गया है। अपने हलफनामे मे ASI ने राम सेतु के अस्तित्व को तो नकारा ही साथ ही "राम जी" के अस्तित्व पर भी सवाल खड़ा कर दिया।
- राम हों या मोहम्मद, ईसा मसीह हों या कृष्ण किसी वैज्ञानिक प्रमाण के मोहताज नहीं है। ये लोगों की भावनाओं, उनकी आस्थाओं का प्रतीक हैं।
- दरअसल केंद्र सरकार का ये हलफनामा परमाणु मुद्दे से आम लोगो को दूर करने और अपने वामपंथी साथियों कि अकड़ को कम करने के लिए इस्तेमाल किया गया लगता है। वामपंथी इस हो हल्ले मे अपनी बात नही कह सकते, और यही केंद्र सरकार चाहती है।
- जहा तक BJP का सवाल है तो उनके लिए तो "बिल्ली के भाग्य से छिका टुटा" है। UP कि हार से बिखरती इस रामलीला मंडली को नया ऑक्सिजन मिल गया।
- राम के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। आस्था के प्रश्न उठाने और उसे सतही ढंग से झुठलाने की सारी प्रक्रिया बार-बार इसीलिए दोहराई जा रही है क्योंकि मुद्दों पर परिपक्व तरीक़े से बहस करने की राजनीतिक परंपरा अभी तक ठीक से स्थापित नहीं हो सकी है। सरकार ही नहीं, सभी राजनीतिक दलों को यह समझदारी दिखानी चाहिए और बहसों को हमेशा मुद्दों पर केंद्रित रखना चाहिए, राजनीति के अखाड़े में धर्म पर बहस, मंदिरों-मस्जिदों में राजनीतिक बहस हमेशा से जटिलता पैदा करते रहे हैं.
Wednesday, 19 September 2007
आओ खेले राम राम

हां तो भाई राम जी एक फिर ख़तरे मे है। एक बार 'बाबर' ने पंगा ले लिया था। वो तो हमारे भगवा भाई बंधु लोग थे जो बाबर कि निशानी पर चढ़ कर उसे उसकी औकात बता दी। अब एक बार फिर राम जी को खतरा है। न, न इस बार कोई "बाहरी आक्रमणकारी" नही है, बल्कि हिंदुस्तान का एक ख़ानदानी सपूत कह रहा है कि" कौन है ये राम?"
- अब उसे कौन बताये कि ये अयोध्या वाले राम जी है। जो मर्यादा पुरुषोत्तम कहे जाते है। अरे वही जिनके नाम पर, हां सिर्फ नाम पर, भगवा झंडे वालो ने हजारो देशद्रोहियों को उनकी औकात बतायी थी।
- राम के नाम पर ठेकेदारी करने वाले ये वही लोग है जिन्होंने कभी राम के नाम पर वोट लूट कर सरकार बनायीं थी, और सरकारी मलाई मिलते ही ये राम को भूल गए है। ये भूल गए कि इन्होने एक बार नारा दिया था कि" मंदिर वही बनायेंगे"।
- ये फिर दुबारा राम को बचाने का ठेका ले रहे है। एक बार फिर इन्हें दिल्ली फतह करने कि उम्मीद दिखायी देने लगी है। पर शायद इन्हें ये याद नही कि " काठ कि हांडी बार बार नही चढती"।
Thursday, 6 September 2007
जय थानेश्वर
लाल टोपी वाले जनता के सामने तो अकड़ के रहते है लेकिन भगवान् के आगे दंडवत होना उनकी मज़बूरी है। हो भी क्यो ना, आख़िर स्वर्ग किसे नही चाहिऐ। दिन भर नेताओ, गुंडों, ठेकेदारों और अपने आला अफसरों कि नाजायज खवाहिशो को पुरा करते और जनता कि पुकार को अनसुना कर अपनी जेब भरते मासूम पुलिस वाले आख़िर भगवान् कि शरण मे न जाये तो कहा जाये।
- बुधवार को सुबह NDTV पर आ रहे विशेष मे थानों और दफ्तरों मे इश्वर के रहने पर सवाल उठाया गया। कहा जाता है कि ईश्वर सर्वव्यापी है। अब हर जगह है तो थानों और दफ्तरों मे रहने से लोगो को क्यो तकलीफ हो रही है। इसी प्रोग्राम मे रविश कुमार ने "Newsroom" से टिपण्णी कि, की थानों और दफ्तरों मे भगवान् का राजनितिक, आर्थिक और सामाजिक पहलू है। दफ्तरों मे आने वाले "नजराने" को भगवान् पर चढा कर उसे काले से सफेद करने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है। इसके अलावा हर मंदिर पर एक आदमी का रोजगार फिट हो जाता है। जाहिर है मंदिर होगा तो, भक्त आएंगे, भक्त आएंगे तो प्रसाद और धुप बिकेगी, मिला ना दर्जनों को रोजगार। इन मंदिरों का सबसे बड़ा फायेदा राजनितिक है। 1990 के बाद जब "राम लीला मंडळी" ने (इसे भाजपा पढे) "जय राम जी कि" को "जय श्री राम" मे बदल डाला था प्रशासन का "सम्प्रदायिकरण" शुरू हो गया था। मुद्दों कि जगह "राम नाम" को वोट मांगने कि वजह बनाने के बाद थानों और दफ्तरों मे मंदिर बनाने का सिलसिला तेज हो गया।
- यु भी जिस देश मे स्कूलों कि संख्या 2 लाख और मंदिरों कि संख्या 6 लाख हो वहा धार्मिक स्थानो कि थोड़ी और बढ़ जाये तो फर्क नही पड़ता। बहुत दिन हुए जब "जनसत्ता" मे मे "सुभाष गताडे" का एक लेख आया था इसमे सुभाष जी ने जबलपुर और मदुरई का उदाहरण देकर ये समझाया था कि कैसे आम जनता और नगर प्रशासन के तालमेल के बाद दोनो शहरो मे सैकडो अवैध मंदिरों, दरगाहों और पूजा स्थलों को तोड़ा गया था। सारे हिंदुस्तान मे प्रयास तो ऐसे ही होने चाहिऐ, और हो भी रहे है।
- दुसरी जगह का तो कह नही सकता लेकिन मेरे शहर "मुज़फ़्फ़रपुर" का एक वाकया आपके पेशे नजर है। "सादपुरा" जहा मेरा घर है, से "जिला स्कूल" जाते हुए "MDDM" कालेज के सामने एक पीपल का पेड हुआ करता था। 1995 तक वहा दो एक गोल पत्थरों के सिवा और कुछ नही था, एकाएक एक त्यौहार आया, मंदिर के नाम पर कारसेवा हुई और आज वहा सड़क को संकरा किये हुए एक भव्य पूजा स्थल है। अब ऐसे मे सुधार कि क्या गुंजाईश है, आप ही बताये?
Wednesday, 5 September 2007
'फ़र्ज़ी इंटरव्यू'
पॉयनियर और 'स्वतंत्र भारत' ने अक्तूबर 1994 में अपने एक 'फ़र्ज़ी इंटरव्यू' मे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी अनंत कुमार सिंह जो तब मुज़फ़्फ़रनगर के ज़िलाधिकारी थे पर ये आरोप लगाया था कि वो महिलाओ के प्रति नकारात्मक सोच रखते है। इस मामले मे लखनऊ के चीफ़ जुडिशियल मजिस्ट्रेट ने दस साल तक चले मुक़दमे के बाद सोमवार को पॉयनियर अख़बार के तत्कालीन रिपोर्टर रमन कृपाल को एक वर्ष सश्रम कारावास और 5500 रुपए जुर्माना भरने की सज़ा सुनाई।
- ये मामला पत्रकारों के सामने एक नजीर पेश करता है। हालांकि इस मामले मे संवाददाता के साथ साथ पॉयनियर के तत्कालीन संपादक अजित भट्टाचार्य, 'स्वतंत्र भारत' के तत्कालीन संपादक घनश्याम पंकज और प्रिंटर-प्रकाशक संजीव कंवर और दीपक मुखर्जी को भी छह-छह महीने की जेल की सज़ा सुनाई गई है। संवाददाताओ के साथ साथ "Boss" को मिली सजा उन सरफिरे संपादकों और मालिकों को एक सीख है जो अपनी TRP और बिक्री के लिए रिपोर्टर का शोषण करने से नही चूकते।
- ये मामला पत्रकारों के सामने एक नजीर पेश करता है। हालांकि इस मामले मे संवाददाता के साथ साथ पॉयनियर के तत्कालीन संपादक अजित भट्टाचार्य, 'स्वतंत्र भारत' के तत्कालीन संपादक घनश्याम पंकज और प्रिंटर-प्रकाशक संजीव कंवर और दीपक मुखर्जी को भी छह-छह महीने की जेल की सज़ा सुनाई गई है। संवाददाताओ के साथ साथ "Boss" को मिली सजा उन सरफिरे संपादकों और मालिकों को एक सीख है जो अपनी TRP और बिक्री के लिए रिपोर्टर का शोषण करने से नही चूकते।
Wednesday, 29 August 2007
ज्यादती या मनोरंजन

मंगलवार को भागलपुर मे एक चोर के पकड़े जाने और उस बाद जो ड्रामा हुआ और सहरसा के DM द्वारा बिहार के CM को पहचानने से इनकार किया जाना, बिहार मे प्रशानिक तंत्र कि कि आम लोगो से विमुखता का जीता जागता प्रमाण है। नितीश कुमार को शायद पता तो होगा ही लेकिन उन्हें पहली बार इस बात का इल्हाम हुआ होगा कि उनके अधिकारी कितने असंवेदनशील है। जब एक जिलाधिकारी, मुख्यमंत्री से सीधे मुह बात नही करता, तो वो बाढ़ से घिरे लोगो से किस क़दर पेश आता होगा ये बात शायद किसी से छुपी नही है। ऐसे भी बाढ़ आने के बाद राहत कार्य करवाने मे DM बहुत मसरूफ रहते है। यही वो मौका होता है जब एक DM लाखो रुपए "जरूरतमंद" लोगो तक पहुचाता है। ऐसे मे CM ने उसे फ़ोन करके परेशान ही किया है।
- भागलपुर मे पुलिस कि मौजूदगी मे जो कुछ हुआ, कम से कम वो सब भागलपुर पुलिस के लिये नया नही है। ऐसा ही कुछ इनलोगों ने " अख् फोरवा काण्ड" के दौरान किया था।
- इस लिये भाई लोग पुलिस और DM साहब से बच कर। इन्हें आप "Public Servant" नही समझे। ये लाट साहब है। ये जो चाहे कर सकते है।
- एक और बात जो भागलपुर काण्ड के दौरान दिखायी देती है वो ये कि आम लोगो ने कैमरा देख कर कुछ ज्यादा ही मर्दानगी दिखा दी। और इन सब को कैमरे के जरिये शूट किया जाता रहा।
Sunday, 26 August 2007
यौमे आजादी कि परेशानिया - 2
सीन 1 -
सीन 3 -
10 अगस्त को busstand पर उतरने के बाद लगा कि शायद अँधेरे मे अपने stand से आगे या पिछे उतर गया हु। हरदम गुलजार रहने वाली जगह पर शमशान जैसे खामोशी थी। रात को वैसे तो इस इलाके मे लौटती गाडियों कि भीड़ लगी रहती है। लेकिन आज सवारिया भी कम थी। दरअसल यहा कभी सब्जी मंडी हुआ करती थी। शाम के वक्त यहा लोगो कि भरी भीड़ होती थी। सब्जी बेचते लोग, किस्म किस्म कि आवाजे निकालते थे। इन सब्जी वालो से इनकी सब्जियों कि कीमत को लेकर जिरह करती औरते । पुरे इलाके मे एक अजब किस्म का शोर होता था। ये शोर कही से भी परेशान करने वाला नही होता था। लेकिन अब यहा नीम खामोशी पसरी रहती है।
15 अगस्त आकर चला गया। सोचा था कि शायद इन्हें यौमे आजादी तक के लिए हटाया गया है। स्वतंत्रता दिवस के बाद सब्जी बेचने वाले फिर वापस आ जायेंगे। लेकिन इस ब्लॉग को लिखते वक़्त तक वो जगह वीरान ही पडी है।
सीन 2 -११ अगस्त से १७ अगस्त तक करीब २५ हजार कि आबादी के लिए सब्जी और खाने पीने कि दुसरी चीजो कि जबर्दस्त किल्लत हो गई थी। १८ अगस्त को कुछ सब्जी वालो ने निचली गली मे अपना ठेला लगाया। जाहिर है, पहले जिन लोगो को सब्जी लेने दूर जाना पड़ रह था, उनके लिए ये ठेले बड़ी राहत का बायस थे। लेकिन ये आराम ज्यादा दिन का नही था। २० अगस्त को लोकल थाने के सिपाहियों ने बिल्कुल गुंडों कि तरह सब्जी बेचने वालो पर हमला किया, कई सब्जीफरोश घायल हो गए। अगले दो तीन दिन तक वहा कोई सब्जी वाला नजर नही आया।
सीन 3 -
- दिन २२ अगस्त
निचली सड़क कि गली नंबर २३ के मुह पर भरी भीड़ थी। लोग किसी दुकान मे घुसने के लिए मारा मारी कर रहे थे। जो नही घुस सके थे, वो दुकान के बाहर रखी "Aquaphina" का पानी पी कर, फिर अन्दर जाने कि कोशिश कर रहे थे। दरअसल निचली सडक कि उस गली के बाहर "6 Ten" का स्टोर खुल गया था। इस स्टोर मे सब्जी बेचने कि दुकान खुली थी।
----यानी १५ अगस्त के नाम पर सब्जी फरोशो को बेरोजगार कर, पिछले दरवाजे से स्टोर को बुलावा भेजा गया था। करीब २०० सब्जी फरोशो कि कीमत पर "6 Ten" को यहा सेट किया गया। यानी १५ अगस्त को एक अंग्रेजी हुकूमत की वापसी कि खुशिया तो मनाई गई। वही यहा एक और " कम्पनी" वापस आ गई।
Saturday, 25 August 2007
यौमे आजादी कि परेशानिया - १
15 अगस्त आया, 15 अगस्त आया, और आकर चला गया। पर इस बार इसने बहुत परेशान कर दिया। तिरंगा लहराने के पहले " परिंदा भी पर नही मार सके" जैसा सुरक्षा इंतजाम था। 10 अगस्त कि रात को मकान मालिक के साथ पुलिस का एक सिपाही हमारी "पहचान" करने आया। " पहचान " यानी हमारी "वफादारी"। मेडिकल के तलबा मेरे छोटे भाई को यह सब पिछले 3 साल से करना पड़ रहा था। मेरे लिये ये पहली बार था कि, मैं हिन्दुस्तानी ही हु, इसका सबूत देना पड़ा।
- कहा घर है?
- बिहार से हु।
- बिहार मे कहा ? बंगाल के पास के किसी ज़िले से?
- नही, मुज़फ़्फ़रपुर से।
- दिल्ली मे कब से हो?
- दुसरा साल है।
- क्या करते हो?
- पत्रकार हु।
-----इस जवाब के बाद सिपाही नरम पड़ गया। उसने एक फॉर्म भरवाया। फॉर्म पर तस्वीर चिपकवाई। परमानेंट और लोकल पता लिखवाया, और चला गया। हां, हमारे फ़्लैट के बाजु मे रह रहे उन लोगो से कोई फॉर्म नही भरवाया गया जो मुसलमान नही थे।
- हालांकि हमारे पडोसी जुलाई के आख़िर मे आये थे। अब ये मान भी लिया जाये कि ये सब सुरक्षा के लिये किया जा रहा था, तो फिर उन नए लड़को कि पड़ताल करने कि जरूरत क्यो नही महसूस कि गयी।
- आस पास के कई नए लड़को-? से बात करने पर पता चला कि, उनलोगों से पैसे भी वसूले गए। ये सब पुख्ता सुरक्षा इंतजाम के लिए किया जा रहा था, या उनके दिल और दिमाग मे कुछ और था, इसका कुछ तो अंदाजा मुझे महसूस हुआ, क्या आपको को भी ऐसा लगा?
- कहा घर है?
- बिहार से हु।
- बिहार मे कहा ? बंगाल के पास के किसी ज़िले से?
- नही, मुज़फ़्फ़रपुर से।
- दिल्ली मे कब से हो?
- दुसरा साल है।
- क्या करते हो?
- पत्रकार हु।
-----इस जवाब के बाद सिपाही नरम पड़ गया। उसने एक फॉर्म भरवाया। फॉर्म पर तस्वीर चिपकवाई। परमानेंट और लोकल पता लिखवाया, और चला गया। हां, हमारे फ़्लैट के बाजु मे रह रहे उन लोगो से कोई फॉर्म नही भरवाया गया जो मुसलमान नही थे।
- हालांकि हमारे पडोसी जुलाई के आख़िर मे आये थे। अब ये मान भी लिया जाये कि ये सब सुरक्षा के लिये किया जा रहा था, तो फिर उन नए लड़को कि पड़ताल करने कि जरूरत क्यो नही महसूस कि गयी।
- आस पास के कई नए लड़को-? से बात करने पर पता चला कि, उनलोगों से पैसे भी वसूले गए। ये सब पुख्ता सुरक्षा इंतजाम के लिए किया जा रहा था, या उनके दिल और दिमाग मे कुछ और था, इसका कुछ तो अंदाजा मुझे महसूस हुआ, क्या आपको को भी ऐसा लगा?
Tuesday, 21 August 2007
माया कि माया
रोमा पर रासुका के तहत मामला बना था, लेकिन माया सरकार ने २ दिन पहले रोमा पर लगे सारे आरोप वापस ले लिए और उन पुलिस वालो पर कारवाई करने का आदेश दिया है जिन्होंने भूमाफिया के शह पर रोमा पर झूठा मामला बनाया था।
अपने ही एक लोकसभा सांसद कि गिरफ़्तारी के बाद रोमा कि रिहाई का आदेश ये बताता है कि मुख्यमंत्री जनदबाव का अर्थ समझती है। दरअसल आदिवासियो कि आवाज बन कर इनकी जमीन भूमाफिया से वापस लेना रोमा कि गलती थी। कैमूर के इलाके मे अपराधी-नेता- पुलिस का ऐसा नापाक गठबंधन बन चूका है जिसमे आम लोग और भोले भाले आदिवासी पिस रहे है। मेधा पाटेकर और दुसरे जन संगठनों के लोगो से मिलने के बाद 19 तारीख को मायावती ने रोमा के रिहाई के आदेश दिए। " जो जमीन सरकारी है , वो जमीन हमारी है।" रोमा ने मायावती के ही दिए, नारे को अपनाया और आदिवासियो के हक के लिए काम करना शुरू किया।
- रोमा कि रिहाई दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार के लिये एक सीख है। वहा कुछ दिन पहले Dr. विनायक सैन को विभिन्न कानूनी धारा के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया है। उन पर नक्सल गतिविधियों मे शामिल होने और उन्हें मदद देने का आरोप लगाया गया है।
- रमण सिंह सरकार को रोमा के मामले से सीख लेकर Dr विनायक सैन को आरोप मुक्त कर देना चाहिऐ।
अपने ही एक लोकसभा सांसद कि गिरफ़्तारी के बाद रोमा कि रिहाई का आदेश ये बताता है कि मुख्यमंत्री जनदबाव का अर्थ समझती है। दरअसल आदिवासियो कि आवाज बन कर इनकी जमीन भूमाफिया से वापस लेना रोमा कि गलती थी। कैमूर के इलाके मे अपराधी-नेता- पुलिस का ऐसा नापाक गठबंधन बन चूका है जिसमे आम लोग और भोले भाले आदिवासी पिस रहे है। मेधा पाटेकर और दुसरे जन संगठनों के लोगो से मिलने के बाद 19 तारीख को मायावती ने रोमा के रिहाई के आदेश दिए। " जो जमीन सरकारी है , वो जमीन हमारी है।" रोमा ने मायावती के ही दिए, नारे को अपनाया और आदिवासियो के हक के लिए काम करना शुरू किया।
- रोमा कि रिहाई दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार के लिये एक सीख है। वहा कुछ दिन पहले Dr. विनायक सैन को विभिन्न कानूनी धारा के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया गया है। उन पर नक्सल गतिविधियों मे शामिल होने और उन्हें मदद देने का आरोप लगाया गया है।
- रमण सिंह सरकार को रोमा के मामले से सीख लेकर Dr विनायक सैन को आरोप मुक्त कर देना चाहिऐ।
Tuesday, 14 August 2007
तस्लीमा पर हमला
कुछ मसरूफ था इस लिए ब्लॉग नही लिख सका। ज्यादा दिन नही हुए जब बंगलादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन पर हैदराबाद मे हमला हुआ। ये हमला उन कमजोर लोगो ने किया है जिनके पास तस्लीमा कि बातो को काटने का और कोई हथियार नही है। तस्लीमा ने जो कुछ भी लिखा हो, वो गलत है या सही इस पर अभी बात नही करनी है। लेकिन तस्लीमा पर हुआ हमला ठीक वैसा ही है जैसा बजरंगी या शिव सैनिक मकबूल फ़िदा पर करते है या सयाजी विश्वविद्यालय मे।
- सभ्य समाज को ऐसी हरकतों का पुरजोर एह्तेजाज करना चाहिऐ। हम अपनी संस्कृति और धर्म के मामलो मे उन ठेकेदारों को कतई बर्दाश्त नही कर सकते जो धर्म और संस्कृति के बारे मे रत्ती भर भी नही जानते।
- सभ्य समाज को ऐसी हरकतों का पुरजोर एह्तेजाज करना चाहिऐ। हम अपनी संस्कृति और धर्म के मामलो मे उन ठेकेदारों को कतई बर्दाश्त नही कर सकते जो धर्म और संस्कृति के बारे मे रत्ती भर भी नही जानते।
Tuesday, 7 August 2007
बस्तर का बलात्कार...
मेरी न्यूज़ एजेंसी मे भी ये खबर आई थी, लेकिन इसे नही दिखलाने का हुक्म मिला। " छत्तीसगढ़ से सम्बंधित एक वेबसाइट पर इससे सम्बंधित एक खबर को अपने ब्लॉग पर डाल रहा हु।
- ये कालम विकल्प ब्यौहार जी का है।
- ये कालम विकल्प ब्यौहार जी का है।
- अब मन बहुत दुखी है। राष्ट्रीय महिला संगठन की एक रिपोर्ट का हिंदी अनुवाद करते हाथ- पैर कांपने लगे थे। क्या एक इनसान इस हद तक गिर सकता है? हमारी आदिवासी मां-बहनों के साथ ऐसा सुलूक ! वह भी हमारी चुनी सरकार के पूरे संरक्षण में। नहीं! ऐसा नहीं होना चाहिए। यह तो घोर पाप है। रावण के राज्य में भी महिलाओं के साथ ऐसा नहीं होता होगा।
एक 10 साल की बच्ची के साथ नगा बटालियन के जवान एक सप्ताह तक सामूहिक बलात्कार करते रहे और उसकी रिपोर्ट तक दर्ज नहीं कराई गई। उसके टुकडे-टुकडे कर फेंक दिया, जालिमों ने और हम... ऐसी चुप्पी आखिर कब तक ? कोई जल्द ही आपके और मेरे घर दस्तक देने आता होगा।
दंतेवाड़ा जिले में बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाओं जो वास्तव में छत्तीसगढ़ महतारी हैं, के साथ जो सुलूक किया जा रहा है, उसका परिणाम आने वाले समय में ठीक नहीं होगा। नक्सलियों से लड़ने के लिए स्थानीय पुलिस की नपुंसकता के कारण ही राज्य सरकार को नगालैंड और मिजोरम से जवानों को 'आयात' करना पड़ा है।
पहले तो सिर्फ नक्सली ही आदिवासियों का पेट फाड़ा करते थे अब ये नगा के जवान बुला लिए गए हैं, ताकि वे वहां की गर्भवती महिलाओं का पेट चीर कर भ्रूण निकाल सके। इससे सरकार को दो-दो फायदे जो हैं, एक यह कि आगे फिर कोई नक्सली बनने वाला नहीं बचेगा और दूसरा यह कि कोई बिरसा- मुंडा पैदा नहीं होगा।
रायपुर में ही मिजोरम के जवानों ने अपनी औकात दिखा दी। यह समाचार दबी कलम छप ही गया कि किस तरह मिजो जवानों ने अपने एक दिन के माना कैंप में शराब और लड़कियों की मांग की थी। कुछ स्थानीय महिलाओं ने इसकी शिकायत वहीं के अधिकारियों से की थी। कुछ समय के लिए राजधानी के पास ही मिजो जवानों का आतंक छा गया था। इतना ही नहीं उन जवानों ने माना के कुछ दुकानदारों से फोकट में खाने का सामान भी मांगा था। यह था प्रदेश में मिजो जवानों का पहला कदम।
अब हमारी सरकार का जवाबी कदम पढिए। इसकी शिकायत होने पर अधिकारियों ने कहा कि कल ही उन्हें बस्तर रवाना कर दिया जाएगा। वाह री मेरी सरकार!! मान गए। अब मिजो जवानों को अपनी वासना की पूर्ति के लिए रायपुर की लड़कियों को मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अब तो उन्हें बस्तर की दर्जनों आदिवासी लड़कियां मिल जाएंगी, वह भी बिना किसी विरोध के। उनके लिए शिविरों में पहले से ही पूरी व्यवस्था जो कर ली है आपने।
हमारी बहनों को छोड़ दो सरकार!! रायपुर के किसी बड़े घराने में पैदा नहीं होने की इतनी बड़ी सजा मत दो उन्हें।
यह बात तो पता थी कि वहां कुछ लड़कियां भी विशेष पुलिस अधिकारी बनी हैं। अब तक जो जानकारी मिलती रही उसके मुताबिक वही लड़कियां एसपीओ बन रहीं हैं जो नक्सलियों के हाथों अपने परिजनों को खो चुकी हैं। पहले यह सुनकर बड़ा गर्व होता था कि चलो छत्तीसगढ़ की हमारी बेटियां इतनी बहादुर तो हैं, कि अपने दुश्मनों के खिलाफ बंदूक भी उठा सकती हैं। लेकिन यदि रिपोर्ट की मानें तो यह सारी बातें कोरी बकवास ही निकलीं।
जिन परिस्थितियों में एक 18 साल से कम उम्र की लड़की एसपीओ बनी उसकी कहानी बताने की जरूरत नहीं। लेकिन एसपीओ बनी लड़कियों का क्या हाल कर रखा है, सोच कर शरीर कांप जाता है।
दंतेवाड़ा जिला पूरी तरह से नक्सल प्रभावित है और वहां थानों में यदा कदा नक्सलियों के हमले होते रहते हैं। राज्य पुलिस व सी.आर.पी.एफ. के जवान हमले के समय तो थाने में घुस जाते हैं और अपने हाथ में बंदूक लिए ये बच्चियां व बच्चे एस.पी.ओ. का बैज लगाए उनसे मोर्चा लेते हैं। यदि किस्मत से कोई नक्सली मार दिया जाता है, चाहे गश्त में भी, जहां यही स्थानीय एस.पी.ओ. सामने रहते हैं, तो फिर इनके जारी समाचार होते हैं- फलां आई.जी के निर्देशन में, एस.पी. की अगुवाई में हमारे जांबाज जावानों ने एक नक्सली को मार गिराया। फलां-फलां समान जब्त किया गया, इतने राउंड गोली चली और जवानों की लंबी-चौड़ी तारीफ के बाद अंत में एक लाइन भी जोड़ दी जाती है कि, इस मुठभेड़ में एक एसपीओ भी शहीद हो गया, जिसे सलामी दी गई।
एर्राबोर की घटना की जांच अब तक हो रही है। उसी का उदाहरण लें तो इस घटना ने यह जग जाहिर कर दिया कि पुलिस नाकाम है, और सफाई देने के सिवा कुछ कर भी नहीं सकती। सरकार ने शेरों से लड़ने बिल्लियों का सहारा लिया जो बेकार साबित हुए, तभी तो नगा और मिजो जवान बुलाए गए हैं। दो चक्की के बीच फंसी हमारी बस्तर की मां-बहनों की चिंता किसी को नहीं है।
चक्की चल रही है और खून की धारा बह रही है, और हम यह देख रहे हैं कि इस खून की उम्र कितनी है। आंख में पट्टी बांधकर नेत्रहीनों का दर्द महसूस करने वाले हमारे मुखिया क्या कभी बस्तर जाकर उन निरीह आदिवासी महिलाओं का दर्द उन्हीं की तरह महसूस कर पाएंगे।
सरकार का दावा है कि शिविरों में सब कुछ बहुत बढिय़ा हो रहा है। तो भाई जंगल में मोर नाचा किसने देखा? हमारे कुछ साथी पत्रकार बताते हैं कि मीडिया को साम, दाम, दंड और भेद की नीति अपनाते हुए चुप कर दिया गया है। एक भी समाचार सलवा जुड़ूम के खिलाफ छपी तो फिर समझ लीजिए कि आपकी 'पत्रकारिता' तो गई तेल लेने। या तो आपको इलाका छोड़ना पड़ेगा या तो फिर कलम। कुछ दिलेर कलम नहीं छोड़ते तो फिर उनके एनकाउंटर की पूरी आशंका बनी रहती है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि पुलिस के अत्याचार और सलवा-जुड़ूम के खिलाफ लिखने वालों को नक्सलियों का साथी घोषित कर देना कोई अच्छी बात नहीं है। छत्तीसगढ़ के कुछ अखबारों ने पुलिसिया अत्याचार के बीच चक्की के दूसरे पाटे को भी जनता के सामने लाया है। नक्सलियों द्वारा की गई हत्याएं और उनका आदिवासी विरोध, नक्सलियों की बर्बरता भी उतनी ही संजीदगी के साथ छापी जाती हैं। लेकिन अब करें क्या गलत कामों में हमें नक्सलियों का पलड़ा कुछ हल्का ही मिलता रहा है।
पुलिस की शहर में क्या इज़्जत है, वह तो सभी देखते ही रहते हैं। हर वह बच्चा जो होश संभालने लगता है, यह सुनने लग जाता है कि रुपए के लिए चालान किए जाते हैं और रुपए के लिए पुलिस अपने एरिया की दुकानों से हफ्ता वसूलती है।
राष्ट्रीय महिला संगठनों की रिपोर्ट में एक और चौकाने वाली बात सामने आई कि वहां के शिविरों में कुछ ऐसी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं जो जबरिया वहां रखी गईं हैं। ये बच्चों को पढ़ाती हैं। शिक्षिका हैं। डरी-सहमी सी शिक्षिकाएं जिनका बुझा चेहरा और डर से कांपते हाथ बस्तर की नई पीढ़ी गढ़ रहे हैं। शिविरों में विधवाओं की एक बड़ी संख्या है, जिनकी सुरक्षा करने वाला वहां कोई नहीं। जो सुरक्ष करने वाले हैं उनके बारे में खबर मिलती है कि वे उनकी ही इज़्जत से खेल रहे हैं। उन्हें घर नहीं जाने दिया जाता।
अब सरकार का एक बेहतरीन तर्क पढिए- 'नक्सलियों से ग्रामीणों की सुरक्शा के लिए उन्हें मुख्य मार्गों के किनारे शिविर बनाकर रखा जा रहा है।' उधर मुट्ठीभर नक्सली और इधर बटालियन पर बटालियन फिर् भी सुरक्षा के लिए एक जगह जानवरों की तरह ठूंस देना हास्यास्पद है। गांव खाली क्यों कराते हो, गांव को आबाद रखो और लड़ो नक्सलियों से! कल रायपुर में नक्सलियों की वारदातें शुरू हो जाएंगी तो क्या यहां से दूर एक कैंप बनाकर सबको रख दोगे?
अरे सरकार! कुछ तो रहम करो। कम से कम हमारी मां-बहनों को तो छोड़ दो। आप नक्सलियों से लड़ो, हमारा पूरा समर्थन आपको है, लेकिन बस्तर का बलात्कार तो मत करो। ऐसे में हमारा साथ नहीं मिलने वाला। नगा और मिजो जवानों को नियंत्रण में रखो। नक्सलियों के खिलाफ लड़ने के लिए एक सकारातमक माहौल बनाओ। वहां की विषमताओं को दूर करो। वहां की मां-बहनों की इज़्जत करो। अपनी पुलिस को विश्वसनीय तो बनाओ, फिर देखो कैसे खत्म होता है नक्सलवाद। इसके लिए किसी बाहरी पुलिस अधिकारी की जरूरत नहीं। अपनों में भी बहुत दम है, यदि उन्हें तैयार कर सको तो। ( With thanks from www.itwariakhbar.com )
एक 10 साल की बच्ची के साथ नगा बटालियन के जवान एक सप्ताह तक सामूहिक बलात्कार करते रहे और उसकी रिपोर्ट तक दर्ज नहीं कराई गई। उसके टुकडे-टुकडे कर फेंक दिया, जालिमों ने और हम... ऐसी चुप्पी आखिर कब तक ? कोई जल्द ही आपके और मेरे घर दस्तक देने आता होगा।
दंतेवाड़ा जिले में बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाओं जो वास्तव में छत्तीसगढ़ महतारी हैं, के साथ जो सुलूक किया जा रहा है, उसका परिणाम आने वाले समय में ठीक नहीं होगा। नक्सलियों से लड़ने के लिए स्थानीय पुलिस की नपुंसकता के कारण ही राज्य सरकार को नगालैंड और मिजोरम से जवानों को 'आयात' करना पड़ा है।
पहले तो सिर्फ नक्सली ही आदिवासियों का पेट फाड़ा करते थे अब ये नगा के जवान बुला लिए गए हैं, ताकि वे वहां की गर्भवती महिलाओं का पेट चीर कर भ्रूण निकाल सके। इससे सरकार को दो-दो फायदे जो हैं, एक यह कि आगे फिर कोई नक्सली बनने वाला नहीं बचेगा और दूसरा यह कि कोई बिरसा- मुंडा पैदा नहीं होगा।
रायपुर में ही मिजोरम के जवानों ने अपनी औकात दिखा दी। यह समाचार दबी कलम छप ही गया कि किस तरह मिजो जवानों ने अपने एक दिन के माना कैंप में शराब और लड़कियों की मांग की थी। कुछ स्थानीय महिलाओं ने इसकी शिकायत वहीं के अधिकारियों से की थी। कुछ समय के लिए राजधानी के पास ही मिजो जवानों का आतंक छा गया था। इतना ही नहीं उन जवानों ने माना के कुछ दुकानदारों से फोकट में खाने का सामान भी मांगा था। यह था प्रदेश में मिजो जवानों का पहला कदम।
अब हमारी सरकार का जवाबी कदम पढिए। इसकी शिकायत होने पर अधिकारियों ने कहा कि कल ही उन्हें बस्तर रवाना कर दिया जाएगा। वाह री मेरी सरकार!! मान गए। अब मिजो जवानों को अपनी वासना की पूर्ति के लिए रायपुर की लड़कियों को मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अब तो उन्हें बस्तर की दर्जनों आदिवासी लड़कियां मिल जाएंगी, वह भी बिना किसी विरोध के। उनके लिए शिविरों में पहले से ही पूरी व्यवस्था जो कर ली है आपने।
हमारी बहनों को छोड़ दो सरकार!! रायपुर के किसी बड़े घराने में पैदा नहीं होने की इतनी बड़ी सजा मत दो उन्हें।
यह बात तो पता थी कि वहां कुछ लड़कियां भी विशेष पुलिस अधिकारी बनी हैं। अब तक जो जानकारी मिलती रही उसके मुताबिक वही लड़कियां एसपीओ बन रहीं हैं जो नक्सलियों के हाथों अपने परिजनों को खो चुकी हैं। पहले यह सुनकर बड़ा गर्व होता था कि चलो छत्तीसगढ़ की हमारी बेटियां इतनी बहादुर तो हैं, कि अपने दुश्मनों के खिलाफ बंदूक भी उठा सकती हैं। लेकिन यदि रिपोर्ट की मानें तो यह सारी बातें कोरी बकवास ही निकलीं।
जिन परिस्थितियों में एक 18 साल से कम उम्र की लड़की एसपीओ बनी उसकी कहानी बताने की जरूरत नहीं। लेकिन एसपीओ बनी लड़कियों का क्या हाल कर रखा है, सोच कर शरीर कांप जाता है।
दंतेवाड़ा जिला पूरी तरह से नक्सल प्रभावित है और वहां थानों में यदा कदा नक्सलियों के हमले होते रहते हैं। राज्य पुलिस व सी.आर.पी.एफ. के जवान हमले के समय तो थाने में घुस जाते हैं और अपने हाथ में बंदूक लिए ये बच्चियां व बच्चे एस.पी.ओ. का बैज लगाए उनसे मोर्चा लेते हैं। यदि किस्मत से कोई नक्सली मार दिया जाता है, चाहे गश्त में भी, जहां यही स्थानीय एस.पी.ओ. सामने रहते हैं, तो फिर इनके जारी समाचार होते हैं- फलां आई.जी के निर्देशन में, एस.पी. की अगुवाई में हमारे जांबाज जावानों ने एक नक्सली को मार गिराया। फलां-फलां समान जब्त किया गया, इतने राउंड गोली चली और जवानों की लंबी-चौड़ी तारीफ के बाद अंत में एक लाइन भी जोड़ दी जाती है कि, इस मुठभेड़ में एक एसपीओ भी शहीद हो गया, जिसे सलामी दी गई।
एर्राबोर की घटना की जांच अब तक हो रही है। उसी का उदाहरण लें तो इस घटना ने यह जग जाहिर कर दिया कि पुलिस नाकाम है, और सफाई देने के सिवा कुछ कर भी नहीं सकती। सरकार ने शेरों से लड़ने बिल्लियों का सहारा लिया जो बेकार साबित हुए, तभी तो नगा और मिजो जवान बुलाए गए हैं। दो चक्की के बीच फंसी हमारी बस्तर की मां-बहनों की चिंता किसी को नहीं है।
चक्की चल रही है और खून की धारा बह रही है, और हम यह देख रहे हैं कि इस खून की उम्र कितनी है। आंख में पट्टी बांधकर नेत्रहीनों का दर्द महसूस करने वाले हमारे मुखिया क्या कभी बस्तर जाकर उन निरीह आदिवासी महिलाओं का दर्द उन्हीं की तरह महसूस कर पाएंगे।
सरकार का दावा है कि शिविरों में सब कुछ बहुत बढिय़ा हो रहा है। तो भाई जंगल में मोर नाचा किसने देखा? हमारे कुछ साथी पत्रकार बताते हैं कि मीडिया को साम, दाम, दंड और भेद की नीति अपनाते हुए चुप कर दिया गया है। एक भी समाचार सलवा जुड़ूम के खिलाफ छपी तो फिर समझ लीजिए कि आपकी 'पत्रकारिता' तो गई तेल लेने। या तो आपको इलाका छोड़ना पड़ेगा या तो फिर कलम। कुछ दिलेर कलम नहीं छोड़ते तो फिर उनके एनकाउंटर की पूरी आशंका बनी रहती है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि पुलिस के अत्याचार और सलवा-जुड़ूम के खिलाफ लिखने वालों को नक्सलियों का साथी घोषित कर देना कोई अच्छी बात नहीं है। छत्तीसगढ़ के कुछ अखबारों ने पुलिसिया अत्याचार के बीच चक्की के दूसरे पाटे को भी जनता के सामने लाया है। नक्सलियों द्वारा की गई हत्याएं और उनका आदिवासी विरोध, नक्सलियों की बर्बरता भी उतनी ही संजीदगी के साथ छापी जाती हैं। लेकिन अब करें क्या गलत कामों में हमें नक्सलियों का पलड़ा कुछ हल्का ही मिलता रहा है।
पुलिस की शहर में क्या इज़्जत है, वह तो सभी देखते ही रहते हैं। हर वह बच्चा जो होश संभालने लगता है, यह सुनने लग जाता है कि रुपए के लिए चालान किए जाते हैं और रुपए के लिए पुलिस अपने एरिया की दुकानों से हफ्ता वसूलती है।
राष्ट्रीय महिला संगठनों की रिपोर्ट में एक और चौकाने वाली बात सामने आई कि वहां के शिविरों में कुछ ऐसी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं जो जबरिया वहां रखी गईं हैं। ये बच्चों को पढ़ाती हैं। शिक्षिका हैं। डरी-सहमी सी शिक्षिकाएं जिनका बुझा चेहरा और डर से कांपते हाथ बस्तर की नई पीढ़ी गढ़ रहे हैं। शिविरों में विधवाओं की एक बड़ी संख्या है, जिनकी सुरक्षा करने वाला वहां कोई नहीं। जो सुरक्ष करने वाले हैं उनके बारे में खबर मिलती है कि वे उनकी ही इज़्जत से खेल रहे हैं। उन्हें घर नहीं जाने दिया जाता।
अब सरकार का एक बेहतरीन तर्क पढिए- 'नक्सलियों से ग्रामीणों की सुरक्शा के लिए उन्हें मुख्य मार्गों के किनारे शिविर बनाकर रखा जा रहा है।' उधर मुट्ठीभर नक्सली और इधर बटालियन पर बटालियन फिर् भी सुरक्षा के लिए एक जगह जानवरों की तरह ठूंस देना हास्यास्पद है। गांव खाली क्यों कराते हो, गांव को आबाद रखो और लड़ो नक्सलियों से! कल रायपुर में नक्सलियों की वारदातें शुरू हो जाएंगी तो क्या यहां से दूर एक कैंप बनाकर सबको रख दोगे?
अरे सरकार! कुछ तो रहम करो। कम से कम हमारी मां-बहनों को तो छोड़ दो। आप नक्सलियों से लड़ो, हमारा पूरा समर्थन आपको है, लेकिन बस्तर का बलात्कार तो मत करो। ऐसे में हमारा साथ नहीं मिलने वाला। नगा और मिजो जवानों को नियंत्रण में रखो। नक्सलियों के खिलाफ लड़ने के लिए एक सकारातमक माहौल बनाओ। वहां की विषमताओं को दूर करो। वहां की मां-बहनों की इज़्जत करो। अपनी पुलिस को विश्वसनीय तो बनाओ, फिर देखो कैसे खत्म होता है नक्सलवाद। इसके लिए किसी बाहरी पुलिस अधिकारी की जरूरत नहीं। अपनों में भी बहुत दम है, यदि उन्हें तैयार कर सको तो। ( With thanks from www.itwariakhbar.com )
Sunday, 5 August 2007
अनुदान का खेल
पटना मे जॉब करते हुए मुझे एक बन्दे से मिलने का मौका मिला। जनाब कहने को तो एक NGO चलाते थे, लेकिन उनका असल धंधा अनुदान हासिल कर उसकी मलाई खाना था। खैर ऐसे बन्दे बहुत से है जिनके बारे मे बाद मे बात होगी। अभी अनुदान से सम्बंधित एक बात।
- हमारे देश मे अनुदान हासिल करने के कुछ नियम काएदे बने है। विदेशी अनुदान किस व्यक्ति या संस्था को लेने कि इजाजत होगी, इसके लिए 1976 का "विदेशी अनुदान (नियमन ) कानून" मौजूद है। इसी कानून के तहत " centre for equity studis" नाम कि एक संस्था ने कुछ साल पहले विदेशी अनुदान के लिये आवेदन दिया था। लेकिन इस संस्था के आवेदन को ये कह कर खारिज कर दिया गया कि " यह संगठन राजनितिक गतिविधियों मे संलिप्त है।" आपकी जानकारी के लिये ये बता दे कि इस संस्था के निदेशक "हर्ष मंदर " साहब है। दुबारा आवेदन करने और काफी इंतजार करने के बाद जब "मंदर साहब" ने सरकार से ये जानना चाहा कि राजनितिक गतिविधियों का क्या मतलब है तो, कहा गया कि " उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के कारणों कि वजह से ये नही बताया जा सकता। "
- 2004 मे ऊपर लिया गया फैसला 1976 के "विदेशी अनुदान (नियमन ) कानून" के तहत लिया गया था। 2006 मे तथाकथित धर्म निरपेक्ष सरकार ने इस कानून मे संशोधन किया।
- किसी भी राज्य के लिए अपने कानून बनाना उसका अधिकार है। लेकिन समाज को इस कानून बनने कि प्रक्रिया कि सतत निगरानी करनी चाहिए। ये इसलिये जरूरी है कि प्रायः आधुनिक राष्ट्र - राज्य खुद को अपने ही नागरिको के विरूद्व सुरक्षित करने के लिए उपाय करते हुए पाये गय है। "विदेशी अनुदान (नियमन ) कानून" मे परिवर्तन कि वजह राष्ट्रीय सुरक्षा का रहा है।
- राष्ट्रीय हित, आतंरिक सुरक्षा और राजनितिक प्रकृति के संगठन --ये वो कारण है जिनकी वजह से सरकार ये सुनिश्चित करना चाहती है कि विदेशी अनुदान का इस्तेमाल सिर्फ " सार्थक कार्यो " के लिये किया जाए। कौन से काम सार्थक है इस काम के लिये सरकार ने जिलाधिकारी तय कर रखे है। इसके साथ सरकार ही ये निर्णय करेगी कि कौन सा संगठन " राजनितिक प्रकृति " का है और इसलिये विदेशी अनुदान का पात्र नही है।
- --------शिक्षा हो या जन स्वास्थ, लोगो के भोजन का हक हो या सुचना का अधिकार, रोजगार का अधिकार हो या औरतो का अधिकार --इन सारे मुद्दों को किसी ना किसी रुप मे राजनितिक मुद्दा कहा जा सकता है। जल, जंगल और जमीन या रोजगार के हक का मुद्दा तो राजनैतिक है ही। केरल मे कोक के खिलाफ आंदोलन हो या तमिलनाडु मे समंदर किनारे पर्यटन स्थल बनाने के खिलाफ मछुआरों का संघर्ष, जंगल से बाहर किये जाने के खिलाफ आदिवासियो का आंदोलन हो, उड़ीसा, मुम्बई, बंगाल या छत्तीसगढ़, झारखण्ड मे विदेशी कम्पनियों या देशी पूंजी के लिये जमीन अधिग्रहण के खिलाफ अभियान --इनमे से कौन राजनितिक है और कौन सामाजिक?
- साम्प्रदायिकता के खिलाफ जनता को शिक्षित करना तो सही मे राजनितिक काम ही है। नए "विदेशी अनुदान (नियमन ) कानून" मे ऐसी गतिविधि को विदेशी अनुदान के लिए अनुचित माना गया है, जो समुदायों के बीच विभेद और वैमनस्य को बढावा देती हो। लेकिन हमे यह पता है कि रामजन्म भूमि आंदोलन से लेकर गुजरात के क़त्ल- ओ - गारत तक या उसके बाद गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, केरल, आदि मे ईसाईयों, मुसलमानो के खिलाफ निरंतर अभियान मे शामिल RSS , विश्व हिंदु परिषद या बजरंग दल को अभी तक राज्य कि तरफ से वैमन्स्यकारी गतिविधि का दोषी नही बताया गया है, जबकि वर्त्तमान सरकार M F hussain कि कलाकृति कि जांच करने के बाद इस नतीजे पर पहुंची है कि वे समुदायों के बीच नफरत पैदा कर सकती है, और उन पर करवाई कि जा सकती है। अगर हुसैन कोई विदेशी अनुदान लेना चाहे तो उन्हें रोका जा सकता है।
- विनायक सेन का मामला हो या सरोज मोंहंती कि गिरफ़्तारी का मुद्दा- अगर आप इनके समर्थन मे आवाज उठाते है तो आप कि गतिविधि को राजनितिक मानने का वाजिब कारण सरकार के पास है, और आप को विदेशी अनुदान नही मिलेगा।
- जिस देश मे सर्वोच्च ख़ुफ़िया संस्था RSS को सैनिक Training देने कि तैयारी कर सकती है। वहा कौन सी 'राजनीती' देशहित मे है और कौन सी देश विरोधी ? किसकी राजनीती को निष्प्रभावी करने कि कोशिश "विदेशी अनुदान (नियमन) कानून- २००६" का प्रस्ताव कर रहा है?
साभार ,
अपूर्वानंद जी
- हमारे देश मे अनुदान हासिल करने के कुछ नियम काएदे बने है। विदेशी अनुदान किस व्यक्ति या संस्था को लेने कि इजाजत होगी, इसके लिए 1976 का "विदेशी अनुदान (नियमन ) कानून" मौजूद है। इसी कानून के तहत " centre for equity studis" नाम कि एक संस्था ने कुछ साल पहले विदेशी अनुदान के लिये आवेदन दिया था। लेकिन इस संस्था के आवेदन को ये कह कर खारिज कर दिया गया कि " यह संगठन राजनितिक गतिविधियों मे संलिप्त है।" आपकी जानकारी के लिये ये बता दे कि इस संस्था के निदेशक "हर्ष मंदर " साहब है। दुबारा आवेदन करने और काफी इंतजार करने के बाद जब "मंदर साहब" ने सरकार से ये जानना चाहा कि राजनितिक गतिविधियों का क्या मतलब है तो, कहा गया कि " उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के कारणों कि वजह से ये नही बताया जा सकता। "
- 2004 मे ऊपर लिया गया फैसला 1976 के "विदेशी अनुदान (नियमन ) कानून" के तहत लिया गया था। 2006 मे तथाकथित धर्म निरपेक्ष सरकार ने इस कानून मे संशोधन किया।
- किसी भी राज्य के लिए अपने कानून बनाना उसका अधिकार है। लेकिन समाज को इस कानून बनने कि प्रक्रिया कि सतत निगरानी करनी चाहिए। ये इसलिये जरूरी है कि प्रायः आधुनिक राष्ट्र - राज्य खुद को अपने ही नागरिको के विरूद्व सुरक्षित करने के लिए उपाय करते हुए पाये गय है। "विदेशी अनुदान (नियमन ) कानून" मे परिवर्तन कि वजह राष्ट्रीय सुरक्षा का रहा है।
- राष्ट्रीय हित, आतंरिक सुरक्षा और राजनितिक प्रकृति के संगठन --ये वो कारण है जिनकी वजह से सरकार ये सुनिश्चित करना चाहती है कि विदेशी अनुदान का इस्तेमाल सिर्फ " सार्थक कार्यो " के लिये किया जाए। कौन से काम सार्थक है इस काम के लिये सरकार ने जिलाधिकारी तय कर रखे है। इसके साथ सरकार ही ये निर्णय करेगी कि कौन सा संगठन " राजनितिक प्रकृति " का है और इसलिये विदेशी अनुदान का पात्र नही है।
- --------शिक्षा हो या जन स्वास्थ, लोगो के भोजन का हक हो या सुचना का अधिकार, रोजगार का अधिकार हो या औरतो का अधिकार --इन सारे मुद्दों को किसी ना किसी रुप मे राजनितिक मुद्दा कहा जा सकता है। जल, जंगल और जमीन या रोजगार के हक का मुद्दा तो राजनैतिक है ही। केरल मे कोक के खिलाफ आंदोलन हो या तमिलनाडु मे समंदर किनारे पर्यटन स्थल बनाने के खिलाफ मछुआरों का संघर्ष, जंगल से बाहर किये जाने के खिलाफ आदिवासियो का आंदोलन हो, उड़ीसा, मुम्बई, बंगाल या छत्तीसगढ़, झारखण्ड मे विदेशी कम्पनियों या देशी पूंजी के लिये जमीन अधिग्रहण के खिलाफ अभियान --इनमे से कौन राजनितिक है और कौन सामाजिक?
- साम्प्रदायिकता के खिलाफ जनता को शिक्षित करना तो सही मे राजनितिक काम ही है। नए "विदेशी अनुदान (नियमन ) कानून" मे ऐसी गतिविधि को विदेशी अनुदान के लिए अनुचित माना गया है, जो समुदायों के बीच विभेद और वैमनस्य को बढावा देती हो। लेकिन हमे यह पता है कि रामजन्म भूमि आंदोलन से लेकर गुजरात के क़त्ल- ओ - गारत तक या उसके बाद गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, केरल, आदि मे ईसाईयों, मुसलमानो के खिलाफ निरंतर अभियान मे शामिल RSS , विश्व हिंदु परिषद या बजरंग दल को अभी तक राज्य कि तरफ से वैमन्स्यकारी गतिविधि का दोषी नही बताया गया है, जबकि वर्त्तमान सरकार M F hussain कि कलाकृति कि जांच करने के बाद इस नतीजे पर पहुंची है कि वे समुदायों के बीच नफरत पैदा कर सकती है, और उन पर करवाई कि जा सकती है। अगर हुसैन कोई विदेशी अनुदान लेना चाहे तो उन्हें रोका जा सकता है।
- विनायक सेन का मामला हो या सरोज मोंहंती कि गिरफ़्तारी का मुद्दा- अगर आप इनके समर्थन मे आवाज उठाते है तो आप कि गतिविधि को राजनितिक मानने का वाजिब कारण सरकार के पास है, और आप को विदेशी अनुदान नही मिलेगा।
- जिस देश मे सर्वोच्च ख़ुफ़िया संस्था RSS को सैनिक Training देने कि तैयारी कर सकती है। वहा कौन सी 'राजनीती' देशहित मे है और कौन सी देश विरोधी ? किसकी राजनीती को निष्प्रभावी करने कि कोशिश "विदेशी अनुदान (नियमन) कानून- २००६" का प्रस्ताव कर रहा है?
साभार ,
अपूर्वानंद जी
Thursday, 2 August 2007
छत्तीसगढ़ी ददरिया: एक परिचय
ऑफिस मे मुझे छत्तीसगढ़ "बीट" मिली हुई है। हालांकि ज्यादा दिन नही हुए है पर इस राज्य कि विविधता ने मुझे मोह लिया है। हर दिन इस राज्य के बारे मे मुझे नयी जानकारी मिलती है। हर राज्य कि तरह यहाँ कि अपनी समस्याए है। पर अभी तक जो जानकारी मुझे मिली है वो सचमुच अनोखी है। इस बार जानते है इस राज्य कि एक अनोखी लोक धुन को। इसके बारे मे मुझे युवराज गजपाल जी के लेख से जानकारी हुई। उन्ही का एक लेख आप के पेशेनजर है।
- छतीसगढ़ की लोक संस्कृति मे ददरिया का एक अलग ही मह्त्व है । आपको गाँवो मे, खेत–खलिहानो मे लोग ददरिया गाते , गुनगुनाते मिल जायेंगे । मुझे हाँलाकि संगीत के बारे मे ज्यादा ज्ञान नही है लेकिन मैने ददरिया को जैसा देखा और महसूस किया वो यहाँ पर लिखने की कोशिश कर रहा हूं ।
ददरिया को कुछ इस तरह से परिभाषित किया जा सकता है । ददरिया छत्तीसगढ़ी गाने की एक शैली/विधा है जिसमे गाने का मुखड़ा और अंतरा भावात्मक रूप से संबंध मुक्त होता है । या दूसरे शब्दो में कहें तो गाने के मुखड़े और अंतरे के मायने या अर्थ मे कोई विशेष संबंध नही होता । और यही वजह है कि किसी एक ददरिया के अंतरे को किसी दूसरे ददरिया के साथ आसानी से उपयोग किया जा सकता है ।
जैसा कि गाने मे होता है कि अंतरे का उपयोग, मुखड़े के भाव को पूरा करने के लिये किया जाता है वैसा ददरिया मे नही होता । ददरिया की तुलना हम गजल से कर सकते है । यद्दपि ददरिया और गजल की गायन शैली पूरी तरह से अलग है लेकिन दोनो की रचना मे काफी समानता है । गजल अलग-अलग शेर का संग्रह होता है और गजल मे भी मुखड़े का अंतरे (शेर) से भावात्मक रूप से संबंध नही होता है अगर कुछ अपवाद जैसे “ चुपके-चुपके रात दिन ...” को छोड़ दे तो ।
लेकिन गजल में समान “रदिफ” और “काफिया” के नियम होने की वजह से हमें ऐसा आभास होता है कि सारे शेर एक दुसरे से जुड़े है । गजल से जो परिचित नही है उन्हे बता दूं कि किसी गजल के हर शेर की दूसरी लाइन मे समान शब्द को ‘रदिफ’ और रदिफ के तुरंत पहले उपयोग होने वाले शब्द को ‘काफिया’ कहते है। समान रदिफ का मतलब तो समान शब्द होता है लेकिन समान काफिया का मतलब केवल लय के रूप मे समानता होती है न कि शब्दो के रूप मे ।
ये शैली अक्सर कव्वाली मे भी देखी जाती है जिसमे बीच मे कव्वाल जो अंतरा गाता है उसका मुखड़े से कोई संबंध नही होता । अधिकतर ददरिया के मुखड़े मे एक अवधारणा होती है जो कि लगभग अपने आप मे पूरी कहानी, सारांश मे बता देती है । उसके बाद आप अंतरे को किसी भी परिस्थिति के साथ जोड़कर और ददरिया के मुखड़े के लय के साथ मिलाकर पूरा ददरिया गा सकते है । मै ददरिया का एक उदाहरण यहाँ पर प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
पाँच के लगैया, पचीस लग जाय ।
बिना लेगे नई तो छोड़व, पुलिस लग जाय, हाय पुलिस लग जाय
बेल तरी बेलन, बेलन तरी ढोल ।
वहू ड़ोंगरी म सजन भाई मोर,
देख पाही तोला ले जाही का ग मोला , राउत भैया मोर ।
इस ददरिया में "बेल तरी बेलन" मुखड़ा है और " पाँच के लगैया " अंतरा है । यहाँ पर एक बात और बता दूँ कि अधिकतर ददरिया की शुरूवात अंतरे से होती है न कि मुखड़े से, और वही इस ददरिया मे भी है। यहाँ पर मुखड़े का हिन्दी मे अनुवाद करना कठिन है क्योकि इस मुखड़े मे एक अवधारणा है जिसका हिन्दी मे अनुवाद करने पर पूरा अर्थ चला जायेगा । ददरिया का अंतरा गजल के शेर की तरह दो लाईन का होता है, लेकिन ददरिया में अंतरे के दोनो लाईन के अर्थ या भाव मे संबंध होना आवश्यक नही होता । दोनो लाईनो के बीच मे केवल एक तुकबंदी होती है ।
यहाँ पर अगर फिर से ददरिया के अंतरे कि तुलना ग़जल के शेर से करें तो जैसा गजल के दो शेरो के बीच मे समान रदिफ और काफिया का नियम लागू होता है वही नियम ददरिया के अंतरे की दोनो लाईनो के बीच मे होता है । लेकिन दो अंतरों के बीच मे रदिफ और काफिया का नियम लागू नही होता । उपर के उदाहरण मे “लग जाय” को रदिफ कहा जा सकता है । ‘पचीस’ और ‘पुलिस’ को काफिया कहा जा सकता है ।
कभी–कभी समान रदिफ के नियम को शिथिल करके केवल समान काफिया के नियम से भी काम चलाया जा सकता है । वैसे मैने अभी उपर जो उदाहरण दिया है उसके अंतरे की दोनो लाईन के अर्थ मे कुछ संबंध नज़र आता है लेकिन अधिकतर ददरिया मे ऐसा नही होता । इस अंतरे के पहले लाईन मे ये कहा गया है कि मैं पाँच रूपये के बदले पच्चीस रूपया खरचने के लिये तैयार हूँ और दूसरे लाईन का मतलब है कि चाहे पुलिस का चक्कर लागाना पडे या जेल की हवा खाना पडे लेकिन मैं तुम्हे, तुम्हारे घर से भगा कर ले जाउँगा और शादी जरूर करुँगा । अंतरे का एक दूसरा उदाहरण देखिये ,
आमा के पाना, डोलत नईये।
का होगे टुरी ह, बोलत नईये।
इसमे पहली लाईन का मतलब है कि आम के पेड़ की पत्तियाँ हिल नही रही है और दूसरा लाइन का मतलब है कि पता नही क्यों लड़की मेरे साथ बात नही कर रही है । इस अंतरे को अगर देखे तो इसमे दोनो लाईन के बीच मे ऐसा कोई अर्थपूर्ण संबंध नजर नही आता । और ऐसा अधिकतर ददरिया के अंतरे मे होता है ।
जैसा कि मैने पहले लिखा था कि ददरिया के अंतरे को आप किसी भी ददरिया मुखडे के साथ उपयोग कर सकते है बस आपको गाने की लय थोडी बदलनी पड़ेगी और कभी कभी एक दो शब्द जैसे " ग, य, ओ , का-ग, का-य " जोड़कर इसे आसानी के साथ दूसरे ददरिया के साथ उपयोग कर सकते है ।
ये जो शब्द है वो छतीसगढ़ी के बहुत सुंदर और प्यार भरे शब्द है । "ग " को किसी पुरूष को संबोधित करने के लिये उपयोग करते है , और "ओ" या " य" को किसी महिला को संबोधित करने के लिये उपयोग करते है । " ओ" को बडों के लिये और "य " का प्रयोग छोटे, हमसाथी के लिये होता है ।
अब सवाल ये आता है कि ये कैसे संभव होता है कि किसी भी अंतरे को किसी भी ददरिया के साथा गाया जा सके । तो गजल मे एक और नियम होता है जिसे ‘बेहर’ कहते हैँ, जिसका मतलब ‘मीटर’ या शेर कि लंबाई से होता है ।
ददरिया के अंतरे के बोल का "स्केल " और " मीटर" लगभग एक सा होता है या आसपास होता है । या गजल कि भाषा मे कहें तो बेहर मे ज्यादा अंतर नही होता है । और यही वजह है कि एक ददरिया के अंतरे को दूसरी ददरिया के साथ उपयोग कर सकते है ।
ददरिया का एक अंतरा है " चाँदी के मुंदरी, किनारी करले , मे रथों मुजगहन , चिन्हारी करले । " जिसे अपना परिचय देने के लिये उपयोग करते है, मैने इसको सभी ददरिया के साथ गा कर देखा है , और मैने पाया कि किसी भी ददरिया की शुरूवात इसके साथ कर सकते है ।
जैसा कि मैने पहले लिखा है कि समान ‘बेहर’ के नियम को पूरा करने के लिये कभी-कभी बोल मे थोड़ा बहुत फेरबदल करना पड़ सकता है । ददरिया को आप किसी भी परिस्थिति मे गा सकते है , चाहे वो खुशी हो या गम हो । इसे आप प्यार मे, विरह मे , छेड़छाड़ मे , तकरार मे, हँसी- मजाक मे, दोस्ती मे , दुशमनी मे कही पर भी उपयोग कर सकते है ।
उपर जिस ददरिया का उदाहरण दिया गया है उसे अधिकतर कव्वाली की तरह सवाल जवाब यानी कि तकरार के लिए गाया जाता है । ये कोई जरूरी नही लेकिन अधिकतर मैने इसे इसी रूप मे सुना है । सवाल जवाब की इस शैली का सबसे ज्यादा उपयोग शादी के समय "मड़वा नाच " के लिये होता है, हालांकि "मड़वा नाच" एक अलग शैली है लेकिन वो ददरिया से मिलती जुलती है ।
मढ़वा नाच मे गाने के एक ही लाईन पर दो-तीन घंटे तक नाचा जा सकते है । मढ़वा नाच मे दो पक्ष होते है और दोनो के बीच गाने के अंतरे के माध्यम से सवाल जवाब चलता है लेकिन गाने का मुखड़ा एक ही होता है ।
मड़वा नाच मे जो अंतरा होता है वो ददरिया का ही अंतरा होता है , इसलिये मैने इसका यहाँ उल्लेख किया है । आप अगर छतीसगढ़ी गाने सुनते है तो आप ने ममता चंद्राकर का एक प्रसिद्ध गाना सुना होगा जिसके बोल है "तोर मन कईसे लागे राजा, महल भीतरी म तोर मन कइसे लागे " , ये गाना वास्तव मे गाना नही ददरिया है ।
मैं आखिर में अपने पसंद का एक ददरिया लिख रहा हूं । ये ददरिया इसलिये, क्योंकि पहली बार मुझे ददरिया और गाने मे अंतर पता चल तो मेरे संगीत प्रेमी मित्र छोटू राम साहू ने इसी ददरिया का उदाहरण दिया था । ये ददरिया मुझे इसलिये भी पसंद है, क्योंकि ये मेरे पसंदीदा गायक स्व. केदार यादव जी के द्वारा गाया गया है जिनकी आवाज मे मुझे एक जादू नज़र आता है।
बागे बगीचा दिखे ले हरियर ।
दिल्ली वाली नई दिखे , बधे हो नरियर, मोर झुल तरी ।
मोर झुल तरी गेंदा , इंजन गाढ़ी सेमर फुलगे ,
सेमर फुलगे अगासमानी , चिटको घड़ी नरवा म ,
नरवा म अगोर लेबे ओ, नरवा म अगोर लेबे य, नरवा म अगोर लेबे ग,
चाँदी के मुंदरी, उलाव कईसे य ।
ठाढ़े अंगना म संगी , बलाव कईसे य, मोर झुल तरी ।
मोर झुल तरी गेँदा , इँजन गाढ़ी सेमर फुलगे ,
सेमर फुलगे अगासमानी , चिटको घड़ी नरवा म ,
नरवा म अगोर लेबे ओ, नरवा म अगोर लेबे य, नरवा म अगोर लेबे ग,
आमा के पाना डोलत नईये।
का होगे टुरी ह बोलत नईये, मोर झुल तरी ॥
मोर झुल तरी गेँदा , इँजन गाढ़ी सेमर फुलगे ,
सेमर फुलगे अगासमानी , चिटको घड़ी नरवा म ,
नरवा म अगोर लेबे ओ, नरवा म अगोर लेबे य, नरवा म अगोर लेबे ग,
गाय चराये, हियाव करले ।
दोस्ती मे मजा नईये, बिहाव करले , मोर झुल तरी ।
मोर झुल तरी गेंदा , इंजन गाढ़ी सेमर फुलगे ,
सेमर फुलगे अगासमानी , चिटको घड़ी नरवा म ,
नरवा म अगोर लेबे ओ, नरवा म अगोर लेबे य, नरवा म अगोर लेबे ग,
पाँच के लगैया, पचीस लग जाय ।
बिना लेगे नई छोड़व, पुलिस लग जाय, मोर झुल तरी ।
मोर झुल तरी गेँदा , इँजन गाढ़ी सेमर फुलगे ,
सेमर फुलगे अगासमानी , चिटको घड़ी नरवा म ,
नरवा म अगोर लेबे ओ, नरवा म अगोर लेबे य, नरवा म अगोर लेबे
ददरिया को कुछ इस तरह से परिभाषित किया जा सकता है । ददरिया छत्तीसगढ़ी गाने की एक शैली/विधा है जिसमे गाने का मुखड़ा और अंतरा भावात्मक रूप से संबंध मुक्त होता है । या दूसरे शब्दो में कहें तो गाने के मुखड़े और अंतरे के मायने या अर्थ मे कोई विशेष संबंध नही होता । और यही वजह है कि किसी एक ददरिया के अंतरे को किसी दूसरे ददरिया के साथ आसानी से उपयोग किया जा सकता है ।
जैसा कि गाने मे होता है कि अंतरे का उपयोग, मुखड़े के भाव को पूरा करने के लिये किया जाता है वैसा ददरिया मे नही होता । ददरिया की तुलना हम गजल से कर सकते है । यद्दपि ददरिया और गजल की गायन शैली पूरी तरह से अलग है लेकिन दोनो की रचना मे काफी समानता है । गजल अलग-अलग शेर का संग्रह होता है और गजल मे भी मुखड़े का अंतरे (शेर) से भावात्मक रूप से संबंध नही होता है अगर कुछ अपवाद जैसे “ चुपके-चुपके रात दिन ...” को छोड़ दे तो ।
लेकिन गजल में समान “रदिफ” और “काफिया” के नियम होने की वजह से हमें ऐसा आभास होता है कि सारे शेर एक दुसरे से जुड़े है । गजल से जो परिचित नही है उन्हे बता दूं कि किसी गजल के हर शेर की दूसरी लाइन मे समान शब्द को ‘रदिफ’ और रदिफ के तुरंत पहले उपयोग होने वाले शब्द को ‘काफिया’ कहते है। समान रदिफ का मतलब तो समान शब्द होता है लेकिन समान काफिया का मतलब केवल लय के रूप मे समानता होती है न कि शब्दो के रूप मे ।
ये शैली अक्सर कव्वाली मे भी देखी जाती है जिसमे बीच मे कव्वाल जो अंतरा गाता है उसका मुखड़े से कोई संबंध नही होता । अधिकतर ददरिया के मुखड़े मे एक अवधारणा होती है जो कि लगभग अपने आप मे पूरी कहानी, सारांश मे बता देती है । उसके बाद आप अंतरे को किसी भी परिस्थिति के साथ जोड़कर और ददरिया के मुखड़े के लय के साथ मिलाकर पूरा ददरिया गा सकते है । मै ददरिया का एक उदाहरण यहाँ पर प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
पाँच के लगैया, पचीस लग जाय ।
बिना लेगे नई तो छोड़व, पुलिस लग जाय, हाय पुलिस लग जाय
बेल तरी बेलन, बेलन तरी ढोल ।
वहू ड़ोंगरी म सजन भाई मोर,
देख पाही तोला ले जाही का ग मोला , राउत भैया मोर ।
इस ददरिया में "बेल तरी बेलन" मुखड़ा है और " पाँच के लगैया " अंतरा है । यहाँ पर एक बात और बता दूँ कि अधिकतर ददरिया की शुरूवात अंतरे से होती है न कि मुखड़े से, और वही इस ददरिया मे भी है। यहाँ पर मुखड़े का हिन्दी मे अनुवाद करना कठिन है क्योकि इस मुखड़े मे एक अवधारणा है जिसका हिन्दी मे अनुवाद करने पर पूरा अर्थ चला जायेगा । ददरिया का अंतरा गजल के शेर की तरह दो लाईन का होता है, लेकिन ददरिया में अंतरे के दोनो लाईन के अर्थ या भाव मे संबंध होना आवश्यक नही होता । दोनो लाईनो के बीच मे केवल एक तुकबंदी होती है ।
यहाँ पर अगर फिर से ददरिया के अंतरे कि तुलना ग़जल के शेर से करें तो जैसा गजल के दो शेरो के बीच मे समान रदिफ और काफिया का नियम लागू होता है वही नियम ददरिया के अंतरे की दोनो लाईनो के बीच मे होता है । लेकिन दो अंतरों के बीच मे रदिफ और काफिया का नियम लागू नही होता । उपर के उदाहरण मे “लग जाय” को रदिफ कहा जा सकता है । ‘पचीस’ और ‘पुलिस’ को काफिया कहा जा सकता है ।
कभी–कभी समान रदिफ के नियम को शिथिल करके केवल समान काफिया के नियम से भी काम चलाया जा सकता है । वैसे मैने अभी उपर जो उदाहरण दिया है उसके अंतरे की दोनो लाईन के अर्थ मे कुछ संबंध नज़र आता है लेकिन अधिकतर ददरिया मे ऐसा नही होता । इस अंतरे के पहले लाईन मे ये कहा गया है कि मैं पाँच रूपये के बदले पच्चीस रूपया खरचने के लिये तैयार हूँ और दूसरे लाईन का मतलब है कि चाहे पुलिस का चक्कर लागाना पडे या जेल की हवा खाना पडे लेकिन मैं तुम्हे, तुम्हारे घर से भगा कर ले जाउँगा और शादी जरूर करुँगा । अंतरे का एक दूसरा उदाहरण देखिये ,
आमा के पाना, डोलत नईये।
का होगे टुरी ह, बोलत नईये।
इसमे पहली लाईन का मतलब है कि आम के पेड़ की पत्तियाँ हिल नही रही है और दूसरा लाइन का मतलब है कि पता नही क्यों लड़की मेरे साथ बात नही कर रही है । इस अंतरे को अगर देखे तो इसमे दोनो लाईन के बीच मे ऐसा कोई अर्थपूर्ण संबंध नजर नही आता । और ऐसा अधिकतर ददरिया के अंतरे मे होता है ।
जैसा कि मैने पहले लिखा था कि ददरिया के अंतरे को आप किसी भी ददरिया मुखडे के साथ उपयोग कर सकते है बस आपको गाने की लय थोडी बदलनी पड़ेगी और कभी कभी एक दो शब्द जैसे " ग, य, ओ , का-ग, का-य " जोड़कर इसे आसानी के साथ दूसरे ददरिया के साथ उपयोग कर सकते है ।
ये जो शब्द है वो छतीसगढ़ी के बहुत सुंदर और प्यार भरे शब्द है । "ग " को किसी पुरूष को संबोधित करने के लिये उपयोग करते है , और "ओ" या " य" को किसी महिला को संबोधित करने के लिये उपयोग करते है । " ओ" को बडों के लिये और "य " का प्रयोग छोटे, हमसाथी के लिये होता है ।
अब सवाल ये आता है कि ये कैसे संभव होता है कि किसी भी अंतरे को किसी भी ददरिया के साथा गाया जा सके । तो गजल मे एक और नियम होता है जिसे ‘बेहर’ कहते हैँ, जिसका मतलब ‘मीटर’ या शेर कि लंबाई से होता है ।
ददरिया के अंतरे के बोल का "स्केल " और " मीटर" लगभग एक सा होता है या आसपास होता है । या गजल कि भाषा मे कहें तो बेहर मे ज्यादा अंतर नही होता है । और यही वजह है कि एक ददरिया के अंतरे को दूसरी ददरिया के साथ उपयोग कर सकते है ।
ददरिया का एक अंतरा है " चाँदी के मुंदरी, किनारी करले , मे रथों मुजगहन , चिन्हारी करले । " जिसे अपना परिचय देने के लिये उपयोग करते है, मैने इसको सभी ददरिया के साथ गा कर देखा है , और मैने पाया कि किसी भी ददरिया की शुरूवात इसके साथ कर सकते है ।
जैसा कि मैने पहले लिखा है कि समान ‘बेहर’ के नियम को पूरा करने के लिये कभी-कभी बोल मे थोड़ा बहुत फेरबदल करना पड़ सकता है । ददरिया को आप किसी भी परिस्थिति मे गा सकते है , चाहे वो खुशी हो या गम हो । इसे आप प्यार मे, विरह मे , छेड़छाड़ मे , तकरार मे, हँसी- मजाक मे, दोस्ती मे , दुशमनी मे कही पर भी उपयोग कर सकते है ।
उपर जिस ददरिया का उदाहरण दिया गया है उसे अधिकतर कव्वाली की तरह सवाल जवाब यानी कि तकरार के लिए गाया जाता है । ये कोई जरूरी नही लेकिन अधिकतर मैने इसे इसी रूप मे सुना है । सवाल जवाब की इस शैली का सबसे ज्यादा उपयोग शादी के समय "मड़वा नाच " के लिये होता है, हालांकि "मड़वा नाच" एक अलग शैली है लेकिन वो ददरिया से मिलती जुलती है ।
मढ़वा नाच मे गाने के एक ही लाईन पर दो-तीन घंटे तक नाचा जा सकते है । मढ़वा नाच मे दो पक्ष होते है और दोनो के बीच गाने के अंतरे के माध्यम से सवाल जवाब चलता है लेकिन गाने का मुखड़ा एक ही होता है ।
मड़वा नाच मे जो अंतरा होता है वो ददरिया का ही अंतरा होता है , इसलिये मैने इसका यहाँ उल्लेख किया है । आप अगर छतीसगढ़ी गाने सुनते है तो आप ने ममता चंद्राकर का एक प्रसिद्ध गाना सुना होगा जिसके बोल है "तोर मन कईसे लागे राजा, महल भीतरी म तोर मन कइसे लागे " , ये गाना वास्तव मे गाना नही ददरिया है ।
मैं आखिर में अपने पसंद का एक ददरिया लिख रहा हूं । ये ददरिया इसलिये, क्योंकि पहली बार मुझे ददरिया और गाने मे अंतर पता चल तो मेरे संगीत प्रेमी मित्र छोटू राम साहू ने इसी ददरिया का उदाहरण दिया था । ये ददरिया मुझे इसलिये भी पसंद है, क्योंकि ये मेरे पसंदीदा गायक स्व. केदार यादव जी के द्वारा गाया गया है जिनकी आवाज मे मुझे एक जादू नज़र आता है।
बागे बगीचा दिखे ले हरियर ।
दिल्ली वाली नई दिखे , बधे हो नरियर, मोर झुल तरी ।
मोर झुल तरी गेंदा , इंजन गाढ़ी सेमर फुलगे ,
सेमर फुलगे अगासमानी , चिटको घड़ी नरवा म ,
नरवा म अगोर लेबे ओ, नरवा म अगोर लेबे य, नरवा म अगोर लेबे ग,
चाँदी के मुंदरी, उलाव कईसे य ।
ठाढ़े अंगना म संगी , बलाव कईसे य, मोर झुल तरी ।
मोर झुल तरी गेँदा , इँजन गाढ़ी सेमर फुलगे ,
सेमर फुलगे अगासमानी , चिटको घड़ी नरवा म ,
नरवा म अगोर लेबे ओ, नरवा म अगोर लेबे य, नरवा म अगोर लेबे ग,
आमा के पाना डोलत नईये।
का होगे टुरी ह बोलत नईये, मोर झुल तरी ॥
मोर झुल तरी गेँदा , इँजन गाढ़ी सेमर फुलगे ,
सेमर फुलगे अगासमानी , चिटको घड़ी नरवा म ,
नरवा म अगोर लेबे ओ, नरवा म अगोर लेबे य, नरवा म अगोर लेबे ग,
गाय चराये, हियाव करले ।
दोस्ती मे मजा नईये, बिहाव करले , मोर झुल तरी ।
मोर झुल तरी गेंदा , इंजन गाढ़ी सेमर फुलगे ,
सेमर फुलगे अगासमानी , चिटको घड़ी नरवा म ,
नरवा म अगोर लेबे ओ, नरवा म अगोर लेबे य, नरवा म अगोर लेबे ग,
पाँच के लगैया, पचीस लग जाय ।
बिना लेगे नई छोड़व, पुलिस लग जाय, मोर झुल तरी ।
मोर झुल तरी गेँदा , इँजन गाढ़ी सेमर फुलगे ,
सेमर फुलगे अगासमानी , चिटको घड़ी नरवा म ,
नरवा म अगोर लेबे ओ, नरवा म अगोर लेबे य, नरवा म अगोर लेबे
Wednesday, 1 August 2007
कलम को सलाम

आज जब आदमी कि पहचान उस के जेब मे पडे पैसे से कि जा रही हो, ऐसे मे कथित तौर पर भूमंडलीकरण कि आंधी मे आई अमीरी ? के बीच गरीब और गरीबी कि सही तस्वीर पेश करने वाले पत्रकार "Palagummi sainath " को प्रतिष्ठित " Ramon Magsaysay Award " से नवाज़ा गया है।
- ये पुरस्कार आज के दौर मे उस ठण्डी हवा कि तरह है, जब पत्रकारो को भूतो और पिशाचो कि कहानिया लाने का दवाब झुलसाता रहा है।
- विकास कि अंधी दौर मे जब हर तरफ पैसे कि झूठी शान बघारी जा रही हो। भारत से गरीबी के "बिला" जाने का दावा किया जा रहा हो, ऐसे मे sainath कि कलम समाज को आइना दिखाने का काम कर रही है।
- इस कलम को सलाम --------
Monday, 30 July 2007
ये नही मानेंगे
" चालकों को निर्देश दिया जाता है कि गेयर बदलने के लिये कलच का प्रयोग करे। गाडी बंद करने के बाद चाभी निकाल ले। " ये वाक्य करीब करीब हर डीटीसी बस मे चालक के नजदीक लिखी रहती है। बावजूद इसके मैंने कभी चालकों को कलच का प्रयोग करते हुए नही देखा। कल बस से सफ़र के दौरान चालक कि इस "तेजी" पर ध्यान गया। बिना कलच दबाये वो ऐसे गेयर बदल रहा था , जैसे गोवा मे सरकार बदलती है। शायद यही ग़ैर जिम्मेदाराना रवैया है कि बहुत कम वक्त मे DTC कि बसें खटारा हो जाती है। चालक, बसो को सरकारी सम्पति मान कर ऐसे ही रगड़ते रहते है। यही सब वजहे है कि दिल्ली परिवहन को हर दिन करोडो का घाटा होता है।
- निजी बस मालिक साल दो साल मे अपनी बसो को २ से ४ कर लेते है वही, सरकारी परिवहन व्यवस्था हमेशा घाटे का सौदा साबित होती है।
- निजी बस मालिक साल दो साल मे अपनी बसो को २ से ४ कर लेते है वही, सरकारी परिवहन व्यवस्था हमेशा घाटे का सौदा साबित होती है।
Saturday, 28 July 2007
जो कहते है दर्द के मारे वो मत लिखो
9 जुलाई को chhattisgarh के errabore मे पुलिस के गश्ती दल पर हमला हुआ था। CRPF के १६ जवानों सहित जिला पुलिस के जवान और SPO भी इस नक्सली हमले मे खेत रहे। मुझे अपने stringer और Bureau Head से मुझे जो खबर मिली उसके अनुसार ८०० कि तादाद मे नक्सलियों ने तलाशी अभियान से लौट रही पुलिस पार्टी पर हमला किया था। अपने हफ्तावार प्रोग्राम के लिए मैंने स्टोरी बनायीं जिसमे घटना का विवरण और राज्य मे बढती हिंसा पर जोर था। अपनी स्टोरी मे मैंने नक्सल समस्या के हल के लिए बंदूक के इस्तेमाल को ग़ैर जरुरी बताया, इसके साथ साथ विकास योजनाओ मे जनता कि सीधी भागीदारी और भूमि के समान वितरण को नक्सल समस्या के समूल खात्मे के लिये जरुरी बताया था। जाहिर सी बात है छत्तीसगढ़ मे हिंसा बढ रही है, इसका मतलब है कि वो जरुरी काम नही हो रहे है जो शासन को करने चाहिऐ थे। स्टोरी एडिट होकर तैयार थी के इसे अपने सिनिअर्स को दिखाने का हुक्म मिला ।
- स्टोरी preview करने के बाद मुझसे कहा गया कि" पहले नक्सलियों के साथ थे क्या। " मेरे जवाब मिलने से पहले ही हुक्म मिला के " स्टोरी सरकार और पुलिस के पक्ष मे करो।
- क्या करता, अगले आधे घंटे मे वो स्टोरी बदल चुकी थी।
-ऑफिस से लौटते वक्त मेरी जुबान पर ये शेर था.........
- स्टोरी preview करने के बाद मुझसे कहा गया कि" पहले नक्सलियों के साथ थे क्या। " मेरे जवाब मिलने से पहले ही हुक्म मिला के " स्टोरी सरकार और पुलिस के पक्ष मे करो।
- क्या करता, अगले आधे घंटे मे वो स्टोरी बदल चुकी थी।
-ऑफिस से लौटते वक्त मेरी जुबान पर ये शेर था.........
हाकिम कि तलवार मुक़द्दस होती है,
हाकिम कि तलवार के बारे मे मत लिखो।
वो लिखो बस जो भी अमीरे- शहर कहे,
जो कहते है दर्द के मारे मत लिखो।
Tuesday, 24 July 2007
'बस' के सफ़र से बस तौबा

दिल्ली मे आज कल बस मे सफ़र करना सिर्फ सफ़र नही बल्कि " suffer" करना है। दिल्ली सरकार ने अपने तुगलकी फैसले मे एकाएक सारी निजी बसो को बंद करवा दिया है। बहाना है इनकी रफ़्तार पर रोक लगाने का, जिसके बारे मे लाल बत्ती मे घूमने वालो का कहना है कि ये जानलेवा है। हालांकि आकडे बताते है कि निजी बसो जिस तरह सड़को को रौंदती है, आम लोगो को कुचलती है, DTC उससे पिछे नही है। डीटीसी का स्टाफ वैसा ही रुखा और बेहूदा होता है जैसा ब्लू लाईन का।
- आज हालत ये है कि आप घंटो स्टाप पर खडे है और सडक से बस नदारद है। दिल्ली कि करीब ६७ फीसद जनता निजी परिवहन का उपयोग करती है। सरकार के एकाएक तुगलकी फैसले ने सफ़र करना मुश्किल बना दिया है।
- इस हो हल्ले मे सबसे ज्यादा पीसी जा रही है वो कामकाजी महिलाये जो हर दिन इन बसो का इस्तेमाल करती है। ये जानकर भी कि इस बस मे जाने का मतलब है, अपनी बेइज्जती करवाना, ये मेहनतकश महिलाये सफ़र करने को मजबूर है।
Friday, 20 July 2007
मीडिया पर दोष
आज के नवभारत टाइम्स मे " शरद यादव " का एक कॉलम आया है। इसमे उन्होने दिल्ली के हालिया सार्वजनिक बस के विवाद मे मीडिया कि भागीदारी पर अपने सुविचार रखे है। शरद यादव ने इस कॉलम मे कहा है कि दिल्ली सरकार द्वारा बेलगाम बसो पर कि गई कारवाई, सरकारी कदम न होकर मीडिया द्वारा डाले गय दबाव का नतीजा है।
- शरद यादव ने आगाह किया है कि " नालायक मीडिया " फालतू के मुद्दे उठा कर माहौल बनता है और ऐसे मे इन्हें देख कर कि गई कारवाई बेजा है।
- मान भी लेते है कि मीडिया द्वारा किसी मुद्दे का दिखाया जाना, मीडिया कि जरूरत होती है, ना कि उसकी सामाजिक जिम्मेदारी। ऐसे मे अगर मीडिया अब जन सरोकार के मुद्दे गंभीरता से ले रहा है तो उन्हें परेशानी क्यो कर हो रही है। दिल्ली कि बसो मे जिन हालातो मे आम आदमी सफ़र करता उसका अंदाजा इन नेता लोगो को नही है। अगर होता तो आज हालात इतने खराब नही होते।
- कौन नही जानता कि दिल्ली के सारे निजी बस इन्ही नेताओ के है। इन बेलगाम दौड़ती बसो से आम आदमी को बचाना, या यु कहे इनकी सच्चाई बयां करना मीडिया का काम है, और वो ये बखूबी कर रहा है।
- शरद यादव ने आगाह किया है कि " नालायक मीडिया " फालतू के मुद्दे उठा कर माहौल बनता है और ऐसे मे इन्हें देख कर कि गई कारवाई बेजा है।
- मान भी लेते है कि मीडिया द्वारा किसी मुद्दे का दिखाया जाना, मीडिया कि जरूरत होती है, ना कि उसकी सामाजिक जिम्मेदारी। ऐसे मे अगर मीडिया अब जन सरोकार के मुद्दे गंभीरता से ले रहा है तो उन्हें परेशानी क्यो कर हो रही है। दिल्ली कि बसो मे जिन हालातो मे आम आदमी सफ़र करता उसका अंदाजा इन नेता लोगो को नही है। अगर होता तो आज हालात इतने खराब नही होते।
- कौन नही जानता कि दिल्ली के सारे निजी बस इन्ही नेताओ के है। इन बेलगाम दौड़ती बसो से आम आदमी को बचाना, या यु कहे इनकी सच्चाई बयां करना मीडिया का काम है, और वो ये बखूबी कर रहा है।
Wednesday, 18 July 2007
आओ खेले मांगली मांगली
सुना था "रेखा " मांगलिक थी, इस लिए जिसने भी उससे शादी कि वो धरती पर रेखा कि सेवा नही कर सका। खैर रेखा कि बात बाद मे। अभी हाल मे एय्श कि शादी हुई। उसकी भी शादी मे मंगल का दोष था, इस लिये ना जाने " angry young ? man " ने किस किस से उसकी शादी करायी, फिर अपने सुपुत्र अभिषेक के साथ उसका " पाणी ग्रहण" संस्कार करवाया।
- आज हमारे न्यूज़ रूम मे भी यही बहस का विषय बना था। लड़को को तो कोई भी भली लडकी मिल जाये तो वो " तर " जाये, इसलिये न्यूज़ रूम के चन्द कुवारे ( गौर करे ये बहुत कोशिशो से बचे है) लड़को को इसमे कोई दिलचस्पी नही थी। लडकिया अपने जन्मपत्री को लेकर ऐसे बांच रही थी जैसे बनारस का कोई पंडा अपने श्री मुख से पाठ कर रहा हो। कोई बोल रही थी लड़का लड़की दोनो का मांगलिक होना बहुत शुभ होता है। तो कोई लड़को का मांगलिक होना शुभ बता रही थी।
- पता नही क्यो पढे लिखे लोग भी इस तरह के अंधविशवास को ढोते है। ये ठीक वैसे ही है जैसे बहुत से लोग नयी गाडी लेकर पहले मंदिर जाते और उसे कई तरह के निशानों से पोत लेते है। मोटे सेठ अपने यहाँ काम करने वाले मजदूरों को वाजिब पगार नही देता लेकिन , " जय माता दी" के नाम पर लाखो का दान दे देता है।
- साथ काम करने वाली इन लड़कियों कि हालत रेत मे फसे उस आदमी कि तरह है जिसे हमेशा कुछ दुरी पर पानी का नख्लिस्तान नजर आता है।
- हालांकि सभी बडे बडे अदारो से पढ़ कर आयी है। वो भी दिल्ली के कालेजो से जहा सबो का दाखिला भी नही होता। लेकिन लगता है ये सिर्फ डिग्री के एतेबार से भारी है, दिमागी एतेबार से ये ना सिर्फ ये हलकी है बल्कि खाली भी है।
- आज हमारे न्यूज़ रूम मे भी यही बहस का विषय बना था। लड़को को तो कोई भी भली लडकी मिल जाये तो वो " तर " जाये, इसलिये न्यूज़ रूम के चन्द कुवारे ( गौर करे ये बहुत कोशिशो से बचे है) लड़को को इसमे कोई दिलचस्पी नही थी। लडकिया अपने जन्मपत्री को लेकर ऐसे बांच रही थी जैसे बनारस का कोई पंडा अपने श्री मुख से पाठ कर रहा हो। कोई बोल रही थी लड़का लड़की दोनो का मांगलिक होना बहुत शुभ होता है। तो कोई लड़को का मांगलिक होना शुभ बता रही थी।
- पता नही क्यो पढे लिखे लोग भी इस तरह के अंधविशवास को ढोते है। ये ठीक वैसे ही है जैसे बहुत से लोग नयी गाडी लेकर पहले मंदिर जाते और उसे कई तरह के निशानों से पोत लेते है। मोटे सेठ अपने यहाँ काम करने वाले मजदूरों को वाजिब पगार नही देता लेकिन , " जय माता दी" के नाम पर लाखो का दान दे देता है।
- साथ काम करने वाली इन लड़कियों कि हालत रेत मे फसे उस आदमी कि तरह है जिसे हमेशा कुछ दुरी पर पानी का नख्लिस्तान नजर आता है।
- हालांकि सभी बडे बडे अदारो से पढ़ कर आयी है। वो भी दिल्ली के कालेजो से जहा सबो का दाखिला भी नही होता। लेकिन लगता है ये सिर्फ डिग्री के एतेबार से भारी है, दिमागी एतेबार से ये ना सिर्फ ये हलकी है बल्कि खाली भी है।
Tuesday, 10 July 2007
ये सुधरने वाले नही है।
बस पूरी रफ़्तार से भागी जा रही थी। जून कि गर्म दोपहर मे बस का ड्राइवर जल्दी से जल्दी डिपो पहुचना चाह रहा था। बहुत से बस स्टैंड को उसने बिना रुके पार कर लिया। हालांकि वो यहाँ भी नही रुका लेकिन हॉस्पिटल होने कि वजह से यहाँ भीड़ थी, और ना चाहते हुए भी उसे बस कि रफ़्तार धीमी करनी पडी। नकाब ओढ़े एक औरत बस मे चढ़ी। उसके हाथ मे एक बच्चा था, जो सोया था या बेहोश था कहा नही जा सकता। धीमे कदमो से आगे बढते हुए उस औरत ने एक सीट पर अपना गन्दा सा झोला रखा और बगल वाली सीट पर बैठ गई। बस का कंडक्टर किसी जल्दीबाजी मे नही था। उसने एक हल्की से नजर उस औरत पर डाली और अपने सीट पर धंसा रहा। बस मे उस औरत को मिला कर ६ जने थे। ड्राइवर और कंडक्टर, वो औरत, एक थुलथुल सेठ, किसी सरकारी ऑफिस का नाकारा बाबु, और FM सुनता एक विद्यार्थी।
- बस अब फिर अपनी रफ़्तार पकड़ चुकी थी। मंजिल ज्यादा दूर नही थी लेकिन एक नामुराद "लाल बत्ती " कि वजह से बस मे ब्रेक लगाना पड़ा। वो तो ड्राइवर बत्ती क्रॉस कर जाता, लेकिन एक सिपाही किनारे खड़ा था, इसलिये रुकना पड़ा।
- सिग्नल अभी लाल ही था इतने मे एक खुबसुरत बाला ने बस के फर्श पर अपना नाजुक कदम रखा। बस जोदार ढंग से हिली' लगा उस खुबसुरत बाला के कदमो ने भूचाल ला दिया। लेकिन सामने नजर डाली तो पता चला कि गौ माता सड़क पर विराजमान थी इसलिये ड्राइवर ने ब्रेक लगाया है।
- लेकिन उस लडकी के मिनी स्कर्ट और झिलमिले शर्ट मे कुछ नही, बल्कि बहुत कुछ ऐसा था जो देखने लायक था। बस मे जैसे ठण्डी हवा का झोंका आ गया था। कंडक्टर खड़ा हो कर मुस्तैद हो गया था। ड्राइवर बस को ऐसे चलाने लगा जैसे मक्खन पर छुरी चला रहा हो। मोटा सेठ साँस रोके अपने पेट को अन्दर करने कि जुगाड़ करने लगा था। चिरकुट बाबु अपने आप को मुस्तैद दिखने कि कोशिश मे लगा था। विद्या कि अर्थी उठाने वाला विद्यार्थी इस कि संजीदगी ओढ़ने कि कोशिश मे लगा था कि जैसे अभी IAS का साक्षात्कार देने जा रह हो। एक बात इन सारे मर्दो मे बराबर थी वो ये कि सबो का दिल जोर से धड़क रहा था, और सब किसी तरह कनखियों से उस लाल छड़ी को निहार रहे थे।
- मुझे दो स्टैंड आगे उतरना है, कहकर उस लाल छड़ी ने कंडक्टर कि तरफ निगाहे उठाई, कंडक्टर गिरते गिरते बचा। वो लपक कर उस लाल शरारा के पास पहुंचना चाह रह था।
- " मुझे भी २ स्टैंड आगे जाना है। उस नकाबपोश औरत ने कहा। कंडक्टर ने उसकी बात को अनसुना करते हुए आगे कदम बढ़ा लिये। लाल पटाखा के पास पहुंच कर उसने कहा, " ३ कि टिकट लगेगी"। उस लडकी ने अपना पर्स टटोला, वो उसमे खुदरा पैसे खोज रही थी। हालांकि उसके पर्स मे क्या क्या है, ये उस लडकी से ज्यादा उन लोगो को ज्यादा जानना जरुरी था जो, दीदे फाड़ कर लडकी और उसके पर्स को घूरे जा रहे थे।
- कंडक्टर कि नजर उस लडकी के शर्ट पर थी जिसके ऊपर के दो बटन खुले थे और उनमे वो नजर आ रहा था जिसे छुपाने के लिये लडकी के वो कपड़ा पहना था ?
- लडकी को जल्द ही २ का सिक्का मिल गया। और कंडक्टर के अरमान मिटटी मे मिल गए। " मेरे पास बस यही है, या ५०० का छुट्टा कर दो।" कंडक्टर तो उस मधुबाला को मुफ़्त मे ही घर ले जाने के मूड मे था। लेकिन फिर खयालो से निकल्म कर उसने कहा, " टिकट तो ३ का है"।
- क्यो भाई क्या हो गया, मैडम के पास खुल्ले नही है तो क्या हुआ मुझसे ले लो । थुल थुल सेठ ने कहा।
- हां भाई, पैसे कम है तो क्या हुआ, जाने भी दो। विद्या कि अर्थी निकालने वाले उस लड़के ने कहा। लड़का मन ही मन सोच रहा था कि, साला मोटा ज्यादा ही नजदीकी दिखा रह है।
- अच्छा आप लोग कह रहे है तो कोई बात नही। लडकी ये सुनकर निश्चिंत हुई, और अपनी टांगो को एक के ऊपर एक चढा कर बैठ गई। उसके गोरे पैरो को देख कर सब मर्दो का दिल डोल गया।
- कंडक्टर उस नकाब वाली औरत के पास आया, "कहा जाना है"।
- टिकट ले लो"
-" दो स्टैंड आगे जाऊंगी।" औरत ने कहा।
- ३ का टिकट है।
- औरत ने नकाब के अन्दर से अपने " पल्लू " को निकाल कर एक गांठ खोली, उसमे से कुछ सिक्के निकाले , मेरे पास ढाई रूपये है।
- इतने से नही चलेगा, पुरे पैसे दो , वरना उतर जाओ। कंडक्टर ने रुखाई से कहा।
- देखिए मेरा बच्चा बीमार है, इससे पैदल नही चला जाएगा। और इस वक्त कोई दुसरी बस भी नही मिलेगी।
- नही , या तो पैसे दो या उतर जाओ।
- बस मे बैठे किसी मर्द (?) ने उस औरत कि आवाज पर ध्यान नही दिया। सब उस लाल पटाखा को घूरे जा रहे थे।
- आप लोग मेरी मदद कीजिये। --उस औरत ने कहा।
- पैसे नही है तो घूमने क्यो निकलती हो? "चिरकुट" बाबु ने कहा।
- कंडक्टर ने बस रुकवाई और उस औरत को धकियाते हुए निचे उतार दिया।
- कहा कहा से चले आते है। कंडक्टर ने कहा और एक निगाह लाल पटाखा के गदराये जिस्म पर डाल कर अपनी सीट पर धंस गया।
- मोटे सेठ ने उस नकाबपोश औरत को देखते हुए पान का एक बीड़ा मुँह मे डाला और कहा," ये सुधरने वाले नही है।"
- बस अब फिर अपनी रफ़्तार पकड़ चुकी थी। मंजिल ज्यादा दूर नही थी लेकिन एक नामुराद "लाल बत्ती " कि वजह से बस मे ब्रेक लगाना पड़ा। वो तो ड्राइवर बत्ती क्रॉस कर जाता, लेकिन एक सिपाही किनारे खड़ा था, इसलिये रुकना पड़ा।
- सिग्नल अभी लाल ही था इतने मे एक खुबसुरत बाला ने बस के फर्श पर अपना नाजुक कदम रखा। बस जोदार ढंग से हिली' लगा उस खुबसुरत बाला के कदमो ने भूचाल ला दिया। लेकिन सामने नजर डाली तो पता चला कि गौ माता सड़क पर विराजमान थी इसलिये ड्राइवर ने ब्रेक लगाया है।
- लेकिन उस लडकी के मिनी स्कर्ट और झिलमिले शर्ट मे कुछ नही, बल्कि बहुत कुछ ऐसा था जो देखने लायक था। बस मे जैसे ठण्डी हवा का झोंका आ गया था। कंडक्टर खड़ा हो कर मुस्तैद हो गया था। ड्राइवर बस को ऐसे चलाने लगा जैसे मक्खन पर छुरी चला रहा हो। मोटा सेठ साँस रोके अपने पेट को अन्दर करने कि जुगाड़ करने लगा था। चिरकुट बाबु अपने आप को मुस्तैद दिखने कि कोशिश मे लगा था। विद्या कि अर्थी उठाने वाला विद्यार्थी इस कि संजीदगी ओढ़ने कि कोशिश मे लगा था कि जैसे अभी IAS का साक्षात्कार देने जा रह हो। एक बात इन सारे मर्दो मे बराबर थी वो ये कि सबो का दिल जोर से धड़क रहा था, और सब किसी तरह कनखियों से उस लाल छड़ी को निहार रहे थे।
- मुझे दो स्टैंड आगे उतरना है, कहकर उस लाल छड़ी ने कंडक्टर कि तरफ निगाहे उठाई, कंडक्टर गिरते गिरते बचा। वो लपक कर उस लाल शरारा के पास पहुंचना चाह रह था।
- " मुझे भी २ स्टैंड आगे जाना है। उस नकाबपोश औरत ने कहा। कंडक्टर ने उसकी बात को अनसुना करते हुए आगे कदम बढ़ा लिये। लाल पटाखा के पास पहुंच कर उसने कहा, " ३ कि टिकट लगेगी"। उस लडकी ने अपना पर्स टटोला, वो उसमे खुदरा पैसे खोज रही थी। हालांकि उसके पर्स मे क्या क्या है, ये उस लडकी से ज्यादा उन लोगो को ज्यादा जानना जरुरी था जो, दीदे फाड़ कर लडकी और उसके पर्स को घूरे जा रहे थे।
- कंडक्टर कि नजर उस लडकी के शर्ट पर थी जिसके ऊपर के दो बटन खुले थे और उनमे वो नजर आ रहा था जिसे छुपाने के लिये लडकी के वो कपड़ा पहना था ?
- लडकी को जल्द ही २ का सिक्का मिल गया। और कंडक्टर के अरमान मिटटी मे मिल गए। " मेरे पास बस यही है, या ५०० का छुट्टा कर दो।" कंडक्टर तो उस मधुबाला को मुफ़्त मे ही घर ले जाने के मूड मे था। लेकिन फिर खयालो से निकल्म कर उसने कहा, " टिकट तो ३ का है"।
- क्यो भाई क्या हो गया, मैडम के पास खुल्ले नही है तो क्या हुआ मुझसे ले लो । थुल थुल सेठ ने कहा।
- हां भाई, पैसे कम है तो क्या हुआ, जाने भी दो। विद्या कि अर्थी निकालने वाले उस लड़के ने कहा। लड़का मन ही मन सोच रहा था कि, साला मोटा ज्यादा ही नजदीकी दिखा रह है।
- अच्छा आप लोग कह रहे है तो कोई बात नही। लडकी ये सुनकर निश्चिंत हुई, और अपनी टांगो को एक के ऊपर एक चढा कर बैठ गई। उसके गोरे पैरो को देख कर सब मर्दो का दिल डोल गया।
- कंडक्टर उस नकाब वाली औरत के पास आया, "कहा जाना है"।
- टिकट ले लो"
-" दो स्टैंड आगे जाऊंगी।" औरत ने कहा।
- ३ का टिकट है।
- औरत ने नकाब के अन्दर से अपने " पल्लू " को निकाल कर एक गांठ खोली, उसमे से कुछ सिक्के निकाले , मेरे पास ढाई रूपये है।
- इतने से नही चलेगा, पुरे पैसे दो , वरना उतर जाओ। कंडक्टर ने रुखाई से कहा।
- देखिए मेरा बच्चा बीमार है, इससे पैदल नही चला जाएगा। और इस वक्त कोई दुसरी बस भी नही मिलेगी।
- नही , या तो पैसे दो या उतर जाओ।
- बस मे बैठे किसी मर्द (?) ने उस औरत कि आवाज पर ध्यान नही दिया। सब उस लाल पटाखा को घूरे जा रहे थे।
- आप लोग मेरी मदद कीजिये। --उस औरत ने कहा।
- पैसे नही है तो घूमने क्यो निकलती हो? "चिरकुट" बाबु ने कहा।
- कंडक्टर ने बस रुकवाई और उस औरत को धकियाते हुए निचे उतार दिया।
- कहा कहा से चले आते है। कंडक्टर ने कहा और एक निगाह लाल पटाखा के गदराये जिस्म पर डाल कर अपनी सीट पर धंस गया।
- मोटे सेठ ने उस नकाबपोश औरत को देखते हुए पान का एक बीड़ा मुँह मे डाला और कहा," ये सुधरने वाले नही है।"
Monday, 9 July 2007
शनि देव
शनिवार को ऑफिस आते हुए , करीब करीब हर चौराहे पर डब्बे मे तुडे मुड़े टिन के एक ढांचे को रखे , जो कडुआ तेल ( mustard oil) मे डूबा रहता, छोटे बच्चे खडे मिलते है। ये बच्चे शनि देव के नाम पर भीख मांगते है। भीख मे पैसे मिलते होंगे तभी करीब २ साल से इन्हें देख रहा हू। हर बार बच्चो कि भीड़ ज्यादा नजर आती है। शायद दिल्ली वाले ज्यादा धार्मिक है, या वो अंधविश्वाशी है। कुछ ऐसा ही नजारा आपको भी देखने को मिला होगा। रेल से आते हुए आप को सामने कि दीवारो पर " बाबा भूरे बंगाली " बाबा असलम बंगाली " के विज्ञापन मिलेंगे। इनमे आपकी सारी समस्या के हल का दावा किया जाता है। इन सब चीजों को देख कर लगता है कि आर्थिक विकास कि दौड़ मे शामिल इस इलाके के लोगो ने अपनी जड़ता और अंध विश्वास को नही छोड़ा है। कही ना कही ये सब इस बात का प्रमाण है कि हम लोग विज्ञानं सिर्फ पढ़ते है , उसे समझते नही और ना ही उससे कोई सीख लेते है। धार्मिक होना निपट निजी मामला है, इसमे किसी को कोई शक नही होगा। लेकिन जब धर्म कि आड़ मे व्यापार होने लगे और इस व्यापार मे मठाधिश हिस्सा लेने लगे तो ये स्वस्थ समाज के लक्षण नही होते।
Friday, 6 July 2007
गोंड आदिवासी कला

गोंड जनजाति के कलाकार भले ही विदेशी भाषा नहीं जानते हो पर इनकी चित्रकला जर्मनी, इटली, फ्रांस और ब्रिटेन में पहुँच रही है और सराही जा रही है। जी हां, अब इन गोंड जनजाति को विदेशो मे पहचान मिल रही है।
- मिसाल के तौर पर, मध्य प्रदेश के मंडला जिले के सुनपुरी गाँव में जन्मी दुर्गाबाई की बनाई हुई तस्वीरें एक फ्रांसीसी किताब में छापी गई हैं जिसे अनुष्का रविशंकर और श्रीरीष राव ने लिखा है।
- अँगरेज़ी में बेगम रुकैया सख़ावत हुसैन के कहानी संग्रह 'सुल्तान ड्रीम' में भी दुर्गाबाई के चित्रों को देखा जा सकता है।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित एक अन्य गोंड कलाकार हैं भज्जू श्याम, भज्जू की तस्वीरों का एक संकलन 'द लंदन जंगलबुक′ के नाम से इटैलियन डच, फ्रेंच और अँगरेज़ी में प्रकाशित की जा चुकी है। इसकी अब तक तीस हज़ार से भी ज्यादा प्रतियां बेची जा चुकी हैं. इस किताब के लिए भज्जू को 'इंडिपेंडेंट पब्लिशर अवार्ड' भी मिल चुका है।
- कल तक मजदूरी कर किसी तरह जीवनयापन करने वाले ये गोंड अब अपने नैसर्गिक हुनर के जरिये कम से कम भूखे तो नही सो रहे है। हालांकि अभी आदिवासी क्षेत्रो मे इन्लोगो के जीवन मे अभी और विकास कि सम्भावना है। जरुरत है तो बस एक ईमानदार कोशिश कि, जिससे ये भोले लोग अपना भोलापन और सादगी बचा कर रख सके।
Thursday, 5 July 2007
कट्टरपंथ

इस्लामाबाद कि लाल मस्जिद वहा पढने वाले तलबा के खून से लाल हो रही है। पिछले दो दिनों से चल रहा संकट अभी तक बरकरार है। ये होना भी था। पकिस्तान सरकार या यु कहा जाये फ़ौज ने अपने फाएदे के लिये जिन लोगो को पला पोसा वो खुद उन्ही के लिये भस्मासुर बन गए है। जनरल जिया के वक्त से कठ मुल्ला लोगो को सर चढाने का नतीजा हालांकि कई बार खुद पकिस्तान को झेलना पड़ा है लेकिन इसबार जो हुआ वो अपने आप मे खास है।
- सरकार कि नाक के निचे लाल मस्जिद के लड़के गुंडागर्दी करते रहे लेकिन सरकार ने उन्हें रोकने कि बजाये परोक्ष रुप से उनका समर्थन किया। वो तो चाइना के ८ लोगो को हिरासत मे लेने के बाद इन गुंडों कि दादागिरी international level पर लोगो के नजर मे आयी। चूकि इसमे मे चीन शामिल हो गया था इस वजह से पाक सरकार को कारवाई करने पडी।
- अब जरा लाल मस्जिद के बारे मे -----
- लाल मस्जिद इस्लामाबाद के अमीर रिहायशी इलाक़े में स्थित है और पाकिस्तानी ख़ुफिया एजेंसी आईएसआई का मुख्यालय इससे कुछ ही क़दमों की दूरी पर है.
इस मस्जिद में पाकिस्तान की बड़ी-बड़ी हस्तियों की आमद रहती है जिनमें शीर्ष नौकरशाहों के अलावा आईएसआई के आला अधिकारी भी शामिल हैं। इस समय मस्जिद के सरपरस्त अब्दुल अज़ीज़ और अब्दुल राशिद नाम के दो भाई हैं.
दक्षिण पंजाब प्रांत से नाता रखने वाले इन दोनों भाइयों से पहले मस्जिद का संचालन उनके पिता मौलाना अब्दुल्ला करते थे।
इस मस्जिद में पाकिस्तान की बड़ी-बड़ी हस्तियों की आमद रहती है जिनमें शीर्ष नौकरशाहों के अलावा आईएसआई के आला अधिकारी भी शामिल हैं। इस समय मस्जिद के सरपरस्त अब्दुल अज़ीज़ और अब्दुल राशिद नाम के दो भाई हैं.
दक्षिण पंजाब प्रांत से नाता रखने वाले इन दोनों भाइयों से पहले मस्जिद का संचालन उनके पिता मौलाना अब्दुल्ला करते थे।
Monday, 2 July 2007
बंगाल कि जादुगरनी

बचपन मे सुना था कि बंगाल कि जादुगरनिया आदमी को जानवर बना क़ैद कर लेती है। लोक कवि भिखारी ठाकुर ने भी अपने गीतो मे पूर्वांचल कि उन औरतो के दर्द को उकेरा है जिनमे उनके पति उस समय बंगाल कमाने जाते थे और फिर लंबे समय तक वापस नही आते थे। भिखारी ठाकुर के गीतो मे विरह वेदना मे तड़पती उन औरतो का दर्द है, जो गीतो के माध्यम से बंगाली जादुगार्नियो पर उनके शौहरो को बरगलाने का जिम्मेदार मानती थी। उस वक्त तो ये सुनी सुनायी बाते थी। लेकिन अब तो एक सचमुच कि जादूगरनी आ गई है।
- पीसी सरकार (जूनियर) की 27 साल वर्षीय बेटी मानेका सरकार हाल में कोलकाता के स्टार थिएटर में आयोजित अपने पहले एकल शो के बाद देश की पहली पेशेवर महिला जादूगर बन गईं। आठ पीढ़ियों तक पुरुष ही इस खानदानी विरासत को आगे बढ़ाते रहे। लेकिन अब सरकार खानदान की नौवीं पीढ़ी की संतान मानेका ने इस जादुई विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया है।
- जादूगर P C सरकार हिंदुस्तान के जाने माने अय्येयार है। इनके पूर्वज बादशाह "जहाँगीर " के दरबार मे अपने फन का मुजाहेरा करते थे। बादशाह ने खुश होकर उस समय उन्हें "ढाका " के पास एक जमींदारी दी थी। तब से पुरा खानदान जादूगरी को ही पेशा बना कर अपने फन से लोगो का मनोरंजन कर रहा था। अब इस नौवी पीढी मे सिर्फ लडकिया थी, और ये आशंका जतायी जा रही थी कि क्या अब इस कला को आगे बढ़ाने वाला कोई नही होगा। जादूगर पी सी सरकार ने इन सब आशंकाओ को गलत साबित करते हुए अपनी विरासत अपनी बेटी को सौप दी। उम्मीद करनी चाहिए कि ये महिला जादूगर अपनी विरासत को बेहतरीन ढंग से आगे बढ़ाते हुए नए कीर्तिमान बनाएगी।
Friday, 29 June 2007
रामलीला मंडळी मे जूतम पैजार

BJP यानी रामलीला मंडळी मे एक बार फिर जूतम पैजार शुरू हो गई है। कार्यकारिणी कि बैठक मे जंग लगे लौह पुरुष ने संघ शरणागत राजनाथ सिंह के राज करने के तरीके पर उंगली उठा दी है। जाहिर सी बात है कि अभी आडवानी को मौका मिला है कि संघ ने उनकी जो बेइज्जती कि थी उसका बदला लिया जाये। आडवानी को पाकिस्तान कि यात्रा के दौरान दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ था कि " जिन्नाह सेकुलर थे "। उनके इस ज्ञान को प्रवचन कर सबको दीक्षित करने का खामियाजा आख़िर उन्ही को मिलना था सो मिला।
- आडवानी को UP और गोवा कि हार से संघ और राजनाथ मंडळी पर हमला करने का अच्छा बहाना मिल गया। दरअसल दोनो राज्यों मे हुए चुनाव मे पार्टी ने आडवानी खेमे को नजरअंदाज कर, संघ के निर्देशो के अनुसार काम किया था। हर जिले मे संघ के दर्जन भर पदाधिकारी BJP का प्रचार करने मे लगे थे। CD काण्ड इसी का नमूना था।
- इनसब के बाद भी अगर BJP का इन राज्यों मे कोई नामलेवा नही बचा तो जाहिर सी बात है कि आडवानी मौका देख कर चौका मारे। राष्ट्रपति चुनाव मे भैरो सिंह शेखावत का खड़ा होना और शिव सेना का इस मुद्दे पर अपने को एनडीए से अलग कर लेना इस बात को दिखाता है कि , लगातार होती हार से भगवा टीम मे अफरा तफरी मची है। अब देखना ये है कि सत्ता कि चाशनी मे लिपटा " राम लीला मंडली का गठबंधन कितनी जल्दी तार तार होता है। क्योकि देश हित मे इस नफरत फ़ैलाने वाली पार्टी का बर्बाद होना ही देश को आबाद रखेगा।
- आडवानी को UP और गोवा कि हार से संघ और राजनाथ मंडळी पर हमला करने का अच्छा बहाना मिल गया। दरअसल दोनो राज्यों मे हुए चुनाव मे पार्टी ने आडवानी खेमे को नजरअंदाज कर, संघ के निर्देशो के अनुसार काम किया था। हर जिले मे संघ के दर्जन भर पदाधिकारी BJP का प्रचार करने मे लगे थे। CD काण्ड इसी का नमूना था।
- इनसब के बाद भी अगर BJP का इन राज्यों मे कोई नामलेवा नही बचा तो जाहिर सी बात है कि आडवानी मौका देख कर चौका मारे। राष्ट्रपति चुनाव मे भैरो सिंह शेखावत का खड़ा होना और शिव सेना का इस मुद्दे पर अपने को एनडीए से अलग कर लेना इस बात को दिखाता है कि , लगातार होती हार से भगवा टीम मे अफरा तफरी मची है। अब देखना ये है कि सत्ता कि चाशनी मे लिपटा " राम लीला मंडली का गठबंधन कितनी जल्दी तार तार होता है। क्योकि देश हित मे इस नफरत फ़ैलाने वाली पार्टी का बर्बाद होना ही देश को आबाद रखेगा।
Wednesday, 27 June 2007
हिसाब किताब कर लो
दो जान पहचान मिलकर भ्रमण को निकले और चले-चले नदी के तीर पर पहुँचे। तब एक ने दूसरे से कहा कि भाई! तुम यहाँ खड़े रहो तो मैं शीघ्र एक डुबकी मार लूँ. इसने कहा,‘बहुत अच्छा’. यह सुनकर वह 20 रूपए उसे सौंप कर कपड़े तीर पर रख जो पानी में बैठा तो उसने चतुराई से वे रुपए किसी के हाथ अपने घर भेज दिए. उसने निकल, कपड़े पहन रूपए माँगे. यह बोला,‘लेखा सुन लो’.
उसने कहा,‘अभी देते अबेर भी नहीं हुई, लेखा कैसा?’
निदान दोनों से विवाद होने लगा और सौ पचास लोग घिर आए. उनमें से एक ने रूपए वाले से कहा, ‘अजी क्यों झगड़ते हो?, लेखा किस लिए नहीं सुन लेते’? हार मान उसने कहा, ‘अच्छा कह.' वह बोला, ‘‘जिस काल आपने डुबकी मारी, मैंने जाना डूब गए. पाँच रूपए दे तुम्हारे घर संदेशा भेजा और जब निकले तब भी और पांच रुपए आनंद के दान में दिए. रहे दस तो मैंने अपने घर भेजे हैं उनकी कुछ चिंता हो तो मुझसे टीप लिखवा लो’’.
यह धांधलपने की बात सुनकर वह बिचारा बोला भला भाई! भर पाए।
साभार
असगर वजाहत
उसने कहा,‘अभी देते अबेर भी नहीं हुई, लेखा कैसा?’
निदान दोनों से विवाद होने लगा और सौ पचास लोग घिर आए. उनमें से एक ने रूपए वाले से कहा, ‘अजी क्यों झगड़ते हो?, लेखा किस लिए नहीं सुन लेते’? हार मान उसने कहा, ‘अच्छा कह.' वह बोला, ‘‘जिस काल आपने डुबकी मारी, मैंने जाना डूब गए. पाँच रूपए दे तुम्हारे घर संदेशा भेजा और जब निकले तब भी और पांच रुपए आनंद के दान में दिए. रहे दस तो मैंने अपने घर भेजे हैं उनकी कुछ चिंता हो तो मुझसे टीप लिखवा लो’’.
यह धांधलपने की बात सुनकर वह बिचारा बोला भला भाई! भर पाए।
साभार
असगर वजाहत
अपना गुण मत भुलिये
एक क्रोधी अंधा कहीं चला जाता था कि एक अंधे कुएं में गिर परा और लगा पुकारने के, चलियो दौड़ियो लोगों. मैं कुएं में गिर पड़ा. लोग तरस खा दौड़ कर वहां गए और कुएं के पनघटे पर खड़े होके उसके निकालने का उपाय करने लगे.
कुछ बेर जो हुई तो वह भीतर से रिसाय के बोला कि शीघ्र निकालते हो तो निकालो नहीं तो मैं किधर ही को चला जाता हूँ, मुझे फिर न पाओगे।
कुछ बेर जो हुई तो वह भीतर से रिसाय के बोला कि शीघ्र निकालते हो तो निकालो नहीं तो मैं किधर ही को चला जाता हूँ, मुझे फिर न पाओगे।
सिक्को का नया मोल
भाई लोग कभी सिक्को से दाढ़ी बनाईं है। " हां...हां ...बनाईं है भाई, तुम भी तो बनाते होगे। नाई के यहा सिक्के दे कर ही तो बनती है दाढ़ी।" बेशक बनती है पर तेजी से बदलती इस दुनिया मे जहा " Recycle" का जमाना है, कुछ भाई लोग गंदगी साफ कर रहे है........गंदगी नही साफ कर रहे है बल्कि सिक्के साफ कर रहे है।
----बंगलादेश सीमा पर सिक्को कि तस्करी हो रही है। बांग्लादेश में इन सिक्कों से रेज़र ब्लेड बनाए जा रहे हैं। इस तस्करी के कारण भारत के कई हिस्सों में सिक्कों की कमी हो गई है. हाल मे कोलकाता पुलिस द्वारा पकडे गए एक तस्कर ने इस बात का खुलासा किया है कि हमारे एक रुपए के सिक्के की कीमत दरअसल 35 रुपए जितनी है क्योंकि सिक्के से पाँच से लेकर सात ब्लेड बनाते हैं।
- इन इलाको मे सिक्के कि किल्लत से एक नई मुद्रा चलन मे आ गई है। सिक्कों की कमी से निपटने के लिए असम प्रदेश में चाय-बागान वाले अपने कर्मचारियों को कार्डबोर्ड या गत्ते से बनी सिक्कों की पर्चियाँ दे रहे हैं। इन पर्चियाँ पर लिखा रहता है कि ये पचास पैसे का सिक्का है,एक रुपए का या उससे ज़्यादा का। बागान के भीतर चीज़ें खरीदने या बेचने के लिए इन पर्चियों का इस्तेमाल किया जाता है।
- तो भाई बचा कर रखे अपने पास खुदरा पैसा। ये चिल्लर नही, बहुत काम कि चीज है। और अपने पास ज्यादा खुदरा पैसे नही रखे , वर्ना कल अखबारो मे ये शब्द मिलेंगे " पुलिस ने एक तस्कर को रंगे हाथो पकडा है। जिसके पास अठन्नी और चवन्नी मिली है।"
----बंगलादेश सीमा पर सिक्को कि तस्करी हो रही है। बांग्लादेश में इन सिक्कों से रेज़र ब्लेड बनाए जा रहे हैं। इस तस्करी के कारण भारत के कई हिस्सों में सिक्कों की कमी हो गई है. हाल मे कोलकाता पुलिस द्वारा पकडे गए एक तस्कर ने इस बात का खुलासा किया है कि हमारे एक रुपए के सिक्के की कीमत दरअसल 35 रुपए जितनी है क्योंकि सिक्के से पाँच से लेकर सात ब्लेड बनाते हैं।
- इन इलाको मे सिक्के कि किल्लत से एक नई मुद्रा चलन मे आ गई है। सिक्कों की कमी से निपटने के लिए असम प्रदेश में चाय-बागान वाले अपने कर्मचारियों को कार्डबोर्ड या गत्ते से बनी सिक्कों की पर्चियाँ दे रहे हैं। इन पर्चियाँ पर लिखा रहता है कि ये पचास पैसे का सिक्का है,एक रुपए का या उससे ज़्यादा का। बागान के भीतर चीज़ें खरीदने या बेचने के लिए इन पर्चियों का इस्तेमाल किया जाता है।
- तो भाई बचा कर रखे अपने पास खुदरा पैसा। ये चिल्लर नही, बहुत काम कि चीज है। और अपने पास ज्यादा खुदरा पैसे नही रखे , वर्ना कल अखबारो मे ये शब्द मिलेंगे " पुलिस ने एक तस्कर को रंगे हाथो पकडा है। जिसके पास अठन्नी और चवन्नी मिली है।"
Tuesday, 26 June 2007
मराठी मानुष कि जय
महाराष्ट्र के स्वयम्भू ठेकेदार बाल ठाकरे ने घोषणा कि है कि, राष्ट्रपति चुनाव मे उनकी जेबी पार्टी UPA उम्मीदवार प्रतिभा पाटिल का समर्थन करेगी। हालांकि ये राजनीती राज्य मे अपनी पार्टी को मजबूती देने के रणनीति के तहत कि गई है, लेकिन इससे ये बात तो साबित हो ही गई है कि शिवसेना कितनी संकुचित सोच वाली पार्टी है। इससे जहा एक तरफ UPA कि रणनीति सही साबित हुई है, वही BJP को मुँह कि खानी पडी है। एक कहावत है कि " चौबे जी, छब्बे जी बंनने गए और दुबे बन कर आ गए।" यही हुआ है NDA के साथ। भगवा दल तो दुसरे दलो को तोड़ने कि बात कर रहा था। " अंतरात्मा " कि आवाज से वोट करने कि बात कर रह था। अब बचाए अपनी पार्टी और अपने गठबंधन को।
Monday, 25 June 2007
विकास का हाशिया- २
इन सारी बातो का आखिरी सच यही है कि अगर तमाम परियोजनाओ को अमलीजामा पहनाया जाएगा तो राज्य कि ६० फीसदी कृषी योग्य जमीन किसानो के हाथ से निकल जायेगी। यानी स्पेशल इकनॉमिक जोन (सेज) के बगैर ही ५० हजार एकड़ भूमि पर विदेशी कम्पनियो का कब्जा हो जाएगा। करीब १० लाख आदिवासी और किसान अपनी जमीन गवा कर मजदूर बन जायेंगे या यु कहा जाये कि इन कम्पनियो पर निर्भर हो जायेंगे। नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियो, पुलिस अधिकारियो मुख्य सचिव और केंद्र सरकार के अधिकारियो कि बस्तर मे ३ बैठके आयोजित हुई है। इनमे इस बात पर जोर दिया गया कि नक्सल प्रभावित सभी राज्य, विकास कि गति को तेज करेंगे। इसके लिये कोई समझौता नही किया जाएगा।
- पता नही क्यो आज विकास कि बात करते वक्त बड़ी कम्पनियों को पूंजी निवेश करने के लिये आमंत्रित करना ही आख़िरी उपाये क्यो समझा जता है। इन कम्पनियों मे क्या ये गरीब आदिवासी CEO बन कर हिस्सेदारी करेंगे क्या?
- खुद केंद्र सरकार ने अपनी रिपोर्ट मे यह माना है कि, नक्सल प्रभावित इलाको मे आदिवासियो समेत करीब २००० लोग मारे गए है। नक्सल हिंसा से प्रभावित इन्ही इलाको मे २ लाख करोड़ रुपये से ज्यादा कि परियोजनाओ के सहमतीपत्र पर हस्ताक्षर हुए है। यानी एक मौत के एवज मे १०० करोड़ रुपये लगाए जा रहे है। तो यह सौदा किस सरकार को मंजूर नही होगा?
विकास का हाशिया
छत्तीसगढ़ मे विकास के नाम पर जो घोटाला हो रह है उस पर ध्यान देने कि जरुरत है। यहा जो चल रहा है उसमे सरकारी अधिकारी " सेल्स मैंन " कि भूमिका मे है। करोडो के वारे न्यारे कैसे होते है, वह भी भुखमरी मे डूबे आदिवासियो के इलाके मे यह देसी विदेशी कम्पनियो कि परियोजनाओ के खाके को देख कर समझा जा सकता है। अमरीकी कम्पनी " टेक्सास पॉवर जेनरेशन " द्वारा राज्य मे १ हजार मेगावाट बिजली उत्पादन का संयंत्र खोलने के सहमती पत्र पर हस्ताक्षर हुए। यानी २० लाख डालर राज्य मे आयेगे। अमरीका कि ही "वन इन्कोर्पोरेट कंपनी " ने ५० करोड़ कि लागत से दवा फैक्ट्री लगाने पर समझौता किया।
- इसके अलावा एक दर्जन विदेशी कम्पनिया खनिज संसाधनों से भरपूर जमीन का दोहन कर ५० हजार करोड़ रुपये इस इलाके मे लगना चाहती है। इसमे पहले कागज को तैयार करने मे ही सत्ताधारियों कि जेब मे ५०० करोड़ पहुंच चुके है। कौडियो के मोल किस तरह समझौता होता है, इसका नजारा " बैलाडिला " मे मिलता है। बैलाडिला खदानों से जो लोहा निकलता है उसे जापान को १६० रुपये प्रति टन ( १६ पैसे प्रति किलोग्राम ) बेचा जता है। वही लोहा मुम्बई के लोहा व्यापरियो और उद्धोगो को ४५० रुपये प्रति टन और छत्तीसगढ़ के व्यापरियो को १६०० रुपये प्रति टन के हिसाब से बेचा जाता है ।
- इसके अलावा एक दर्जन विदेशी कम्पनिया खनिज संसाधनों से भरपूर जमीन का दोहन कर ५० हजार करोड़ रुपये इस इलाके मे लगना चाहती है। इसमे पहले कागज को तैयार करने मे ही सत्ताधारियों कि जेब मे ५०० करोड़ पहुंच चुके है। कौडियो के मोल किस तरह समझौता होता है, इसका नजारा " बैलाडिला " मे मिलता है। बैलाडिला खदानों से जो लोहा निकलता है उसे जापान को १६० रुपये प्रति टन ( १६ पैसे प्रति किलोग्राम ) बेचा जता है। वही लोहा मुम्बई के लोहा व्यापरियो और उद्धोगो को ४५० रुपये प्रति टन और छत्तीसगढ़ के व्यापरियो को १६०० रुपये प्रति टन के हिसाब से बेचा जाता है ।
Sunday, 24 June 2007
विकास कि बन्दरबाँट
छत्तीसगढ़ कुछ दिन पहले तक आदिवासी गीतो से गूंजता था। आज ये जगह बंदुको कि आवाज से थर्रा रही है। यहा कि हवा मे ढोल और मांदर कि थाप कि जगह विस्फोट गूंज रहा है। औरतो कि अस्मत लूटी जा रही है। भाई के खून का प्यासा उसका ही भाई बना हुआ है। सरकार हिंसा खत्म करने कि जगह हथियार बाट रही है। पुरा छत्तीसगढ़ खाकी के बूटों तले रौंदा जा रह है। राज्य कि पुलिस के अलावा ६ दुसरे राज्यों कि पुलिस भी यहा तैनात है। सरकार के मुताबिक ये इलाका कश्मीर और नागालैंड के अलावा तीसरा सबसे अशांत इलाका है। इसलिये सुरक्षा के बंदोबस्त जरूरी है। लेकिन पुलिस वह क्या कर रही है इसका नमूना देखिए --------
- नागा पुलिस कि गोली से १२ साल का " कुर्ती कम्मल " मारा गया।
- मिज़ो पुलिस के दर्जनों जवानों ( वहशी ) ने अप्रील महिने मे एक आदिवासी युवती के साथ सामुहिक बलात्कार किया।
- ५- १०- २००६ को पुलिस कि गोली से एक नक्सल मारा गया। इसमे कुछ भी नया नही था --बस उस नक्सल कि उम्र २ साल थी।
- लापता लोगो को तो गिनना वक्त कि बर्बादी है।
- सरकारी योजनाये देखिए तो इन लापता लोगो के नाम आज भी कल्याणकारी योजनाओ मे शामिल है। और तुर्रा ये कि ये लोग आज भी सरकारी योजनाओ का फायेदा भी उठा रहे है। रजिस्टर पर आज भी इनके दस्तखत हो रहे है।
- देश के कुछ सबसे गरीब राज्यों मे से एक इस राज्य मे सुरक्षा बलों पर हर दिन होने वाला खर्चा १० करोड़ है।
- ------- अब नजर डालते है उस सामान पर जिसकी लूट मची हुई है------------------
- खनिज सम्पदा के मामले मे छत्तीसगढ़ सबसे समृद्ध राज्य है। देश का ९० फीसदी टिन अयस्क यही से मिलता है। मुल्क का १६ फीसदी कोयला, १९ फीसदी लोहा, ५० फीसदी हीरा यही मिलता है। पुरे २८ कीमती खनिज यही मौजूद है। यही नही ये इलाका पानी और हरियाली से भी भरा हुआ है। फिर भी आदिवासी विकास के नाम पर कुछ नही हो रहा है। दरअसल यहा विकास के नाम पर लगने वाला पुरा पैसा " रुपया" ना होकर " डालर " है।
- सामाजिक सरोकार जब एक संस्थान का दुसरे संस्थान या सुरक्षाकर्मियों का इस राज्य मे न होकर अपने घर और दुसरे राज्य मे होगी तब तक सम्पूर्ण विकास कि बात करना फ़ालतू है।
साहित्य, दलित और समाज - २
वर्ण आधारित समाज ने हमेशा से कमजोर तबके को और दबाया है। साहित्य मे हमेशा से दलितो को तिरस्कार और अपमान मिला है। एक उदहारण देखिए ---------पुरी रामकथा मे राम जी विरोध करने वाले लोगो को दैत्य कहा गया। पुरी रामचरित मानस मे " मलिक और सेवक " के संबंध को इस तरह से दिखाया गया है जैसे यही मोक्ष प्राप्त करने का आख़िरी जरिया है। एक क्यो और कैसे हुआ इसका सीधा संबंध वर्णवादी सोच से है। कमजोर तबके को " tadan के अधिकारी बताया " गया है। और उस पर तुर्रा ये कि वो जिन्हे जलील किया गया वो भी इसे झूम झूम कर पढ़ते है। मर्यादा पुरोशोत्तम जिन्हे कहा गया वो " शम्बुक " को संस्कृत पढने पर मौत कि सजा देते है।
- ये धर्मशास्त्र है या सत्ता वर्ग का स्तुति गान ?
साभार :
रमणिका गुप्ता
- ये धर्मशास्त्र है या सत्ता वर्ग का स्तुति गान ?
साभार :
रमणिका गुप्ता
साहित्य, दलित और समाज
आज हमारा साहित्य, सिर्फ साहित्य नही कहलाता है। ये अब दलित साहित्य, स्वर्ण साहित्य मे विभाजित हो चूका है। आख़िर इसकी क्या वजह है? खुद को अच्छा समझने वाले स्वर्ण कभी दलितो का लिखा नही समझ पाये, उसे नकारते रहे, उसे बेकार कहा गया। कुछ तो उसे साहित्य मानते ही नही। इसे अश्लील कहा गया। बावजूद इसके दलित साहित्य तरक्की करता गया। किसी ने आगे बढ कर इनकी मदद नही कि। इनके हाथो को नही थमा। थामते भी कैसे उनके छू जाने से धर्म का नाश होता है । स्वर्ग का रास्ता बंद होता है।
Saturday, 23 June 2007
वोट दो भाई वोट दो
हां तो आप वोट दीजिए। आप का वोट हिंदुस्तान कि शान बचाने के लिये, उसकी लाज बचाने के लिये जरुरी है। आप का वोट ना मिले तो दुनिया के सामने हिंदुस्तान का गौरव कम हो जाएगा।
- अरे आप अभी तक नही समझे, आप का वोट प्रतिभा पाटिल के लिये नही माँगा जा रहा है बल्कि ये तो ताज महल के लिये माँगा जा रहा है। अगर आप ताजमहल के लिये वोट नही करेंगे तो वो अजुबो कि लिस्ट मे नही आ पायेगा।
- यानी आप का वोट ताज को ताज बनाएगा नही तो वो आगरा कि कोई मामूली ईमारत भर रह जाएगा। ये नया चुतिआपा कि है एक विदेशी कंपनी ने। अच्छा अगर ये मान लिया जाये कि ताज को जरुरी वोट नही मिले, तो क्या उसे देखने लोग नही आयेगे।
- ये सब लोगो को बेवकूफ बनाने का नया तरीका है। अपनी मार्केटिंग के लिये ये कम्पनिया कल को इस बात पर भी वोटिंग करवा सकती है कि भगवान् राम है या रावण? और अगर कही गलती से श्रीलंका वालो ने जम कर वोटिंग कर दी तो कम से कम हिंदुस्तान मे उन मोटे पंडो का क्या होगा जो बहती गंगा मे हाथ धो कर नही बल्कि नहा कर लोगो को चुतिया बनाते है?
- भाई लोग ये सब भूल जाइये और वोट कीजिये, नही तो ताज नंबर १ नही रहेगा और फिरंगी हिंदुस्तान आकर हमे कृतार्थ नही कर पाएंगे।
Thursday, 21 June 2007
आप तीन मे है या तेरह मे
एक नगर सेठ थे. अपनी पदवी के अनुरुप वे अथाह दौलत के स्वामी थे. घर, बंगला, नौकर-चाकर थे. एक चतुर मुनीम भी थे जो सारा कारोबार संभाले रहते थे.
किसी समारोह में नगर सेठ की मुलाक़ात नगर-वधु से हो गई. नगर-वधु यानी शहर की सबसे ख़ूबसूरत वेश्या. अपने पेश की ज़रुरत के मुताबिक़ नगर-वधु ने मालदार व्यक्ति जानकर नगर सेठ के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया. फिर उन्हें अपने घर पर भी आमंत्रित किया.
सम्मान से अभिभूत सेठ, दूसरे-तीसरे दिन नगर-वधु के घर जा पहुँचे. नगर-वधु ने आतिथ्य में कोई कमी नहीं छोड़ी. खूब आवभगत की और यक़ीन दिला दिया कि वह सेठ से बेइंतहा प्रेम करती है.
अब नगर-सेठ जब तब नगर-वधु के ठौर पर नज़र आने लगे. शामें अक्सर वहीं गुज़रने लगीं. नगर भर में ख़बर फैल गई. काम-धंधे पर असर होने लगा. मुनीम की नज़रे इस पर टेढ़ी होने लगीं.
एक दिन सेठ को बुखार आ गया. तबियत कुछ ज़्यादा बिगड़ गई. कई दिनों तक बिस्तर से नहीं उठ सके. इसी बीच नगर-वधु का जन्मदिन आया. सेठ ने मुनीम को बुलाया और आदेश दिए कि एक हीरों जड़ा नौलखा हार ख़रीदा जाए और नगर-वधु को उनकी ओर से भिजवा दिया जाए. निर्देश हुए कि मुनीम ख़ुद उपहार लेकर जाएँ.
मुनीम तो मुनीम था. ख़ानदानी मुनीम. उसकी निष्ठा सेठ के प्रति भर नहीं थी. उसके पूरे परिवार और काम धंधे के प्रति भी थी. उसने सेठ को समझाया कि वे भूल कर रहे हैं. बताने की कोशिश की, वेश्या किसी व्यक्ति से प्रेम नहीं करती, पैसों से करती है. मुनीम ने उदाहरण देकर समझाया कि नगर-सेठ जैसे कई लोग प्रेम के भ्रम में वहाँ मंडराते रहते हैं. लेकिन सेठ को न समझ में आना था, न आया. उनको सख़्ती से कहा कि मुनीम नगर-वधु के पास तोहफ़ा पहुँचा आएँ.
मुनीम क्या करते। एक हीरों जड़ा नौलखा हार ख़रीदा और नगर-वधु के घर की ओर चल पड़े. लेकिन रास्ते भर वे इस समस्या को निपटाने का उपाय सोचते रहे.
किसी समारोह में नगर सेठ की मुलाक़ात नगर-वधु से हो गई. नगर-वधु यानी शहर की सबसे ख़ूबसूरत वेश्या. अपने पेश की ज़रुरत के मुताबिक़ नगर-वधु ने मालदार व्यक्ति जानकर नगर सेठ के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया. फिर उन्हें अपने घर पर भी आमंत्रित किया.
सम्मान से अभिभूत सेठ, दूसरे-तीसरे दिन नगर-वधु के घर जा पहुँचे. नगर-वधु ने आतिथ्य में कोई कमी नहीं छोड़ी. खूब आवभगत की और यक़ीन दिला दिया कि वह सेठ से बेइंतहा प्रेम करती है.
अब नगर-सेठ जब तब नगर-वधु के ठौर पर नज़र आने लगे. शामें अक्सर वहीं गुज़रने लगीं. नगर भर में ख़बर फैल गई. काम-धंधे पर असर होने लगा. मुनीम की नज़रे इस पर टेढ़ी होने लगीं.
एक दिन सेठ को बुखार आ गया. तबियत कुछ ज़्यादा बिगड़ गई. कई दिनों तक बिस्तर से नहीं उठ सके. इसी बीच नगर-वधु का जन्मदिन आया. सेठ ने मुनीम को बुलाया और आदेश दिए कि एक हीरों जड़ा नौलखा हार ख़रीदा जाए और नगर-वधु को उनकी ओर से भिजवा दिया जाए. निर्देश हुए कि मुनीम ख़ुद उपहार लेकर जाएँ.
मुनीम तो मुनीम था. ख़ानदानी मुनीम. उसकी निष्ठा सेठ के प्रति भर नहीं थी. उसके पूरे परिवार और काम धंधे के प्रति भी थी. उसने सेठ को समझाया कि वे भूल कर रहे हैं. बताने की कोशिश की, वेश्या किसी व्यक्ति से प्रेम नहीं करती, पैसों से करती है. मुनीम ने उदाहरण देकर समझाया कि नगर-सेठ जैसे कई लोग प्रेम के भ्रम में वहाँ मंडराते रहते हैं. लेकिन सेठ को न समझ में आना था, न आया. उनको सख़्ती से कहा कि मुनीम नगर-वधु के पास तोहफ़ा पहुँचा आएँ.
मुनीम क्या करते। एक हीरों जड़ा नौलखा हार ख़रीदा और नगर-वधु के घर की ओर चल पड़े. लेकिन रास्ते भर वे इस समस्या को निपटाने का उपाय सोचते रहे.
नगर-वधु के घर पहुँचे तो नौलखा हार का डब्बा खोलते हुए कहा, “यह तोहफ़ा उसकी ओर से जिससे तुम सबसे अधिक प्रेम करती हो.”
नगर-वधु ने फटाफट तीन नाम गिना दिए। मुनीम को आश्चर्य नहीं हुआ कि उन तीन नामों में सेठ का नाम नहीं था. निर्विकार भाव से उन्होंने कहा, “देवी, इन तीन में तो उन महानुभाव का नाम नहीं है जिन्होंने यह उपहार भिजवाया है.”
नगर-वधु की मुस्कान ग़ायब हो गई. सामने चमचमाता नौलखा हार था और उससे भारी भूल हो गई थी. उसे उपहार हाथ से जाता हुआ दिखा. उसने फ़ौरन तेरह नाम गिनवा दिए.नगर-वधु ने फटाफट तीन नाम गिना दिए। मुनीम को आश्चर्य नहीं हुआ कि उन तीन नामों में सेठ का नाम नहीं था. निर्विकार भाव से उन्होंने कहा, “देवी, इन तीन में तो उन महानुभाव का नाम नहीं है जिन्होंने यह उपहार भिजवाया है.”
तेरह नाम में भी सेठ का नाम नहीं था. लेकिन इस बार मुनीम का चेहरा तमतमा गया. ग़ुस्से से उन्होंने नौलखा हार का डब्बा उठाया और खट से उसे बंद करके उठ गए. नगर-वधु गिड़गिड़ाने लगी. उसने कहा कि उससे भूल हो गई है. लेकिन मुनीम चल पड़े.
बीमार सेठ सिरहाने से टिके मुनीम के आने की प्रतीक्षा ही कर रहे थे. नगर-वधु के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे.
मुनीम पहुचे और हार का डब्बा सेठ के सामने पटकते हुए कहा, “लो, अपना नौलखा हार, न तुम तीन में न तेरह में. यूँ ही प्रेम का भ्रम पाले बैठे हो.”
सेठ की आँखें खुल गई थीं. इसके बाद वे कभी नगर-वधु के दर पर नहीं दिखाई पड़े.
भूमंडलीकरण और आरक्षण- २
- नयी नीतियों के लागु करने के बाद नए सरकारी उपक्रम तो नही ही लगे बल्कि पुराने धीरे धीरे बंद किये जाने लगे। सरकारी उपक्रमो का निजीकरण शुरू हो गया। VRS लागु किया गया और बडे पैमाने पर लोगो कि रोजगार से वंचित किया गया। भारत सरकार कि " आर्थिक समीक्षा २००६- २००७" के अनुसार कुल सरकारी नौकरिया ( राज्य एवम केंद्र ) १९९४ मे १ करोड़ ९४ लाख ४५ हजार थी। जो २००० मे १ करोड़ ९३ लाख १४ हजार और २००४ मे १ करोड़ ८१ लाख ९७ हजार हो गई। इससे पता लगना कठिन नही है कि भूमंडलीकरण के रोड रोलर ने "मंडल कमीशन " कि सिफारिशो को मटियामेट कर दिया।
- हालांकि १९९६ से २००४ तक कई वैचारिक रंगो कि सरकार आयी मगर किसी ने भी " वाशिंग्टन आम राय " पर विचार करने कि जहमत नही उठाई। ये किसी ने भी नही सोचा कि इसका गरीबो, आदिवासियो, दलितो और कमजोर वर्गों पर क्या असर हो रहा है।
- अब सरकार विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत मे अपनी शाखा या यु कहे कि अपनी दुकान खोलने कि अनुमति प्रदान कर रही है। इसका क्या असर होगा? इसबारे मे कोई भी सरकारी प्रयास न होने थे न हुए। ये कोशिश भी गरीब गुर्बो को शिक्षा से वंचित करने का ही प्रयास है। क्योकि इन विदेशी विश्वविद्यालयों कि फी इतनी होगी जो गरीबो कि अंटी मे होनी नही है। दुसरा यहा सिर्फ उन्ही का आरक्षण होगा जो अमीर होंगे। एक बात और हमारे यहा विदेशी चिजो कि जो माँग है उस हिसाब से देखे तो देशी विश्वविद्यालयों कि डिग्री को कोई पूछेगा ही नही।
- हमारे विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर विदेशी विश्वविद्यालयों मे मोटी रकम पर काम नही करे ऐसा कोई कानून सरकार नही बना सकती। फिर प्रतिभा पलायन कैसे रुकेगा?
भूमंडलीकरण और आरक्षण
नौकरियो और कालेज कि सीटों पर दाखिले के मामले पर हमने एक बवाल हाल मे देखा। दाखिले पर हुए बवाल के पिछे केंद्र सरकार का वो अधिनियम था जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम फैसला दिया है। कोर्ट ने केद्रिये शैक्षिक संस्थान ( प्रवेश मे आरक्षण ) अधिनियम- २००६ के लागु करने पर रोक लगा दी है।
- आरक्षण के पक्ष और विपक्ष मे जो भी दलील दी जा रही हो लेकिन इसके समर्थन और विरोध मे मे जो भी है क्या उन्होने इस नजरिये पर ध्यान दिया है कि, भूमंडलीकरण कि वजह से आरक्षण का क्या रूप बचेगा?
-भूमंडलीकरण के इस दौर मे आरक्षण किस तरह सफल हो सकता है? अभी तो सब भूमंडलीकरण कि वास्त्विक्ताओ पर कम और मनोगत भावनाओ और पुर्वाग्रहो ज्यादा हो हल्ला कर रहे है। आईये थोडा पिछे जाकर आरक्षण कि वास्तविकता पर नजर डालते है।
- आजादी के बाद संविधान ने " सामाजिक स्तर पर कमजोर वर्गों विशेषकर दलितो और आदिवासियो के लिये प्रतिबद्धता व्यक्त कि थी। संविधान मे इसके लिये विशेष प्रावधान किये गए। इसके बाद मंडल कमीशन के माध्यम से ओबीसी को आरक्षण दिया गया। १९९० के दशक मे आरक्षण कि जो राजनीती शुरू हुई उसने देश कि दशा और दिशा दोनो बदल दी। लेकिन इसे वक्त एअक और परिवर्तन हुआ जिसकी आहट सब लोगो के कान तक नही पहुची।
- यही वो दौर था जब नरसिम्हा राव सरकार ने " वॉशिंग्टन आम राय " पर आधारित भूमंडलीकरण को अपनाया। गौर करने कि बात ये है कि किसी भी दल ने इसका विरोध नही किया। " वॉशिंग्टन आम राय " के दस सूत्री कार्यक्रम के आलोक मे मनमोहन सिंह ने आर्थिक सुधार शुरू किया। इन सुधारो का बहुत प्रभाव पड़ा। सरकारी क्षेत्र मे उपलब्ध नौकरियों कि संख्या मे कमी आयी।
Tuesday, 19 June 2007
पिछड़ रहा है ताज

मोहब्बत का प्रतीक ताजमहल लगता है विश्व के सात महान आश्चर्यों में शामिल होने से पिछड़ जाएगा। जनता और सरकार में उदासीनता कि वजह से शायद मुहब्बत का ये अनमोल निशाँ अपनी मकबूलियत खो बैठेगा। एक निजी स्विस संगठन द्वारा दुनिया के सात नए महान आश्चर्यों के लिए विश्व स्तर पर चलाए गए मोबाइल एसएमएस और ऑनलाइन अभियान के परिणाम सात जुलाई को पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में घोषित किए जाएंगे।
- भारत सरकार ने अभी तक इस संबंध मे कोई कदम नही उठाया है। लेकिन वहीं ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डिसिल्वा ने राजधानी रियो द जेनेरियो के 'स्टेचू ऑफ क्राईस्ट' के लिए रेडियो पर संदेश प्रसारित कर नागरिकों से बढ़चढ़ कर वोट करने का अपील की है.
तो दूसरी ओर पेरू सरकार ने अपने प्राचीन शहर मचू पिचू के पक्ष में मतदान के लिए जगह जगह पर इंटरनेट कनेक्शन के साथ कंप्यूटर लगवाए हैं।
तो दूसरी ओर पेरू सरकार ने अपने प्राचीन शहर मचू पिचू के पक्ष में मतदान के लिए जगह जगह पर इंटरनेट कनेक्शन के साथ कंप्यूटर लगवाए हैं।
- हालांकि सरकार इस बारे मे जागरूकता फैलाये तो बात बन सकती है। भारत में इस समय 17 करोड़ मोबाइल धारक हैं और 50 में से एक व्यक्ति इंटरनेट इस्तेमाल करता है. लेकिन लोगों में ताज के लिए मतदान को लेकर उतना उत्साह नज़र नहीं आ रहा कि जो इसे टॉप सेवन में जगह दिला सके. हालांकि हाल में मतों का प्रतिशत 0.7 से बढ़कर 5 हुआ है जिसकी बदौलत यह अंतिम दस में जगह बना सका.
- जागरूकता का अभाव ही इसके पिछड़ने का कारण माना जा सकता है।
Saturday, 16 June 2007
जनता का राष्ट्रपति

तो भाई प्रतिभा पाटिल, UPA कि उम्मीदवार बनी है , राष्ट्रपति पद के लिये। अगर अपने आप को सबसे तेज कहने वाले आज के ज़्यादातर न्यूज़ चैनेल्स कि माने तो, मोहतरमा प्रतिभा , जनता कि उम्मीदवार नही है। आप बोलेंगे कि तो कौन है जनता का उम्मीदवार?
- कुछ दिनों पहले करीब करीब सारे न्यूज़ चैनलो ने कलाम साहब को जनता कि पसंद बताया था। कलाम साहब को दुसरा मौका मिले, ये जनता चाहती है, ऐसा कहना था इन सबसे तेज चैनलो का। और ये बात बंधु लोग पुरी तैयारी के साथ बता रहे थे। इनका कहना था कि इन्हें " आम जनता" ने SMS और online के जरिये ये बात कही है। जनता कि आवाज ये कह रही है कि, अबकी बारी फिर कलाम।
- लेकिन ऐसा कहने वाले क्या जनता कि सही आवाज है। कितने के पास आज मोबाइल और इन्टरनेट है? और जिनके पास ये दोनो है, उनमे से कितने SMS भेजते है। आम मध्य वर्ग मे भी ऐसे भी लोग जो इन सब चीजो का इस तरह इस्तेमाल नही करते। क्या इन सारे SMS को आम जनता कि आवाज मान लिया जाए। दरअसल ये एसएमएस करने वाले छोटे से मध्य वर्ग के भी छोटे से हिस्से है, और ये इन लोगो का शगल है। दुर्भाग्य से ऐसा सबकुछ मीडिया लोकतंत्र के नाम पर हमे और आपको परोस रहा है। और ये सब पहली बार नही हो रहा है। मीडिया आम लोगो को बार बार धोखा दे रहा है। शायद आप को याद होगा कि कुछ दिन पहले आरक्षण के विरोध के नाम पर जो कुछ दिल्ली कि सड़को पर हुआ उसे आरक्षण के विरूद्व आम जनता का ग़ुस्सा बताया गया। इसमे उच्च शिक्षा पा रहे सैकड़ो विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया था।
- पिछले १५ सालो मे आर्थिक नीतियों ने हमारे महानगरो मे विकास कि जो चकाचौध पैदा कि है, विरोध कर रहे विद्यार्थी उसी को विकास मान कर ये सब कर रहे थे। खैर ये बच्चे तो नादान है, या इन्हें सही जानकारी नही होगी। लेकिन उन अर्थशास्त्रियों का क्या जो देश कि एक फीसदी आबादी कि चकाचौंध को, उनकी समृधी को देश कि समृधी मानते है। इन अर्थशास्त्रियों को देश कि ८० फीसदी फटेहाल जनता से कोई मतलब नही है। ये लोग आज भी उसी तंगहाली मे जी रहे है, जैसे आर्थिक सुधार लागु होने के वक़्त जी रहे थे। iim, iit और मेडिकल का कोर्स करने वाले विद्यार्थी नही जानते कि इस देश कि असलियत क्या है। पिछले १५ सालो मे हुई तरक्की ही इनके लिये विकास है। और इस खुशफहमी को सबसे तेज मीडिया बनाए रखना चाहता है।
- एसएमएस भेजने वाले उसे मध्यवर्ग के लोग है जो पिछले १५ सालो मे चर्बिया गए है , और अब इस देश को चलाना चाहते है। ये आम चुनाओ के दिन , छुट्टी मनाते है , और एसएमएस भेज कर प्रत्याशी को जिताते है।
Friday, 15 June 2007
अभिव्यक्ति की आज़ादी और भावनाओं को ठेस

लालकृष्ण आडवाणी का कहना है कि कलाकार की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने की आज़ादी नहीं हो सकती। अख़बार कहते हैं कि ऐसा उनने अपने सांसदों से कहा। भाजपा को यह बात मीडिया में उजागर करनी पड़ी, क्योंकि कुछ अख़बारों ने मेनका गांधी की उस चिट्ठी की ख़बर छापी थी, जो उनन जंग लगे भूतपूर्व लौह पुरुष को वडोदरा में भाजपाई-विहिपाई कार्यकर्ताओं द्वारा कला प्रदर्शनी में जबरन घुस कर तोड़-फोड़ करने के खिलाफ निंदा में लिखी थी। भाजपा दुनिया को बताना चाहती है कि वडोदरा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय के कला संकाय में उनके कार्यकर्ताओं ने देवी-देवताओं के 'अश्लील और अशोभनीय' चित्रों के खिलाफ जो कुछ किया, पार्टी उसको बुरा नहीं मानती है। इस बेशर्मी को सिद्धांतकार लालकृष्ण आडवाणी के उद्धरण से अलंकृत किया गया है कि कोई कलाकार अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी के बहाने हमारी धार्मिक भावनाओं को चोट नहीं पहुंचा सकता। तथाकथित धार्मिक भावनाओं के बहाने इस देश के नागरिकों को मिली बुनियादी आज़ादियों के खिलाफ संघ संप्रदायिओं की यह फासिस्ट मुहिम है। कैसे? एक उदाहरण लीजिए-कुछ साल पहले कथाकार कमलेश्वर और मुझे उज्जैन बुलाया गया था। वह कार्यक्रम शायद कालिदास अकादमी ने आयोजित किया था। साहित्य में सांप्रदायिक समरसता से निकला कोई विषय रहा होगा। कमलेश्वर ने बोलना शुरू किया और जैसे ही उनने बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने का ज़िक्र किया, श्रोताओं में से कुछ लोग उठे और उत्तेजित होकर चिल्लाने लगे। उनके एतराज़ को सुनने-समझने की कोशिश की गयी, तो बात निकल कर यह आयी कि उन्हें 'बाबरी मस्जिद के ध्वंस' से आपत्ति है। वे मानते हैं कि वह 'विवादित ढांचा' था, जो ढह गया। उसे 'बाबरी मस्जिद' क्यों कहा जा रहा है। वे यह नहीं सुनेंगे क्योंकि इससे उनकी भावनाओं को चोट पहुंचती है। और कमलेश्वर को इसका कोई अधिकार नहीं है कि वे लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचाएं। कार्यक्रम में उपद्रव करने वाले लोगों का यह कहना मंच पर बैठे लोगों को मंज़ूर नहीं था। उनमें महेश बुच भी थे, जो कभी उज्जैन के कलेक्टर/कमिश्नर भी रह चुके थे। हमने उपद्रव करने वालों की यह मांग भी नहीं मानी कि कमलेश्वर न बोलें। बाकी के लोग बोलें तो कार्यक्रम चलने दिया जाएगा। मैंने कहा कि जिस सभा में कमलेश्वर को बोलने नहीं दिया जाएगा, उसमें मैं तो नहीं बोलूंगा। कोई आधे घंटे तक तनाव बना रहा।कार्यक्रम के आयोजको, बाकी के श्रोताओं और उपद्रव करने आये उन लोगों के बीच बातचीत होती रही। हल्ला और हंगामा भी होता रहा। कई प्रतिष्ठित नागरिक हमें घेर कर बैठे रहे और हमें मनाते रहे कि विवाद और उपद्रव ख़त्म हो, तो कार्यक्रम फिर शुरू किया जा सके। आख़िर हमें सूचित किया गया कि कमलेश्वर अपना भाषण पूरा करेंगे। इसके बाद उपद्रव करने वालों में से कोई एक व्यक्ति आकर जो कुछ उसे बोलता है, बोलेगा और फिर मुझे भाषण देना है। फिर अध्यक्ष को जो कुछ कहना होगा, कहेंगे। मुझे लगा कि उपद्रव से कमलेश्वर का उत्साह और बोलने की सहज इच्छा काफी कम हो गयी थी। वे बोले और वही सब कुछ बोले, जो उन्हें बोलना था। बाबरी मस्जिद के ध्वंस को उनने बाबरी मस्जिद को तोड़ना ही कहा। फिर उपद्रवियों में से एक सज्जन आये और ज़ोर-ज़ोर से भाषण देने की कला के अपने प्रशिक्षण के अनुसार बोले और उनके साथ आये लोग तालियां पीटते रहे। फिर मैं कोई घंटे भर बोला। अपने धर्म और पुराणों की समझ में ये संघ परिवारी बेचारे बिल्कुल एकांगी हैं। भारतीय समाज की इनकी समझ भी मुसलमान काल से पीछे नहीं जाती। अपने समाज की विविधता, बहुलता और सर्वग्राहिता इनकी पकड़ में नहीं आती। शाखाओं में जो एकांगी और जड़ ज्ञान दिया जाता है, उसी को दोहराते रहते हैं। मेरा अनुभव है कि धर्म और भारतीय समाज पर इन्हें लेकर इनसे बड़ी आसानी से निपटा जा सकता है। उस दिन मैंने कहा कि आपके विवादित ढांचा कहने से बाबरी मस्जिद सिर्फ एक विवाद का ढांचा नहीं हो जाएगी।
दुनिया जानती है कि 22/23 दिसंबर, सन 1949 की रात उसमें लाकर रामलला और दूसरी दो मूर्तियां रखी गयीं। ज़िला मजिस्ट्रेट नायर ने उन्हें मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत के आदेश के बावजूद हटाया नहीं। हिंदू महासभा वालों ने अखंड पाठ चला कर जनता में रामलला के प्रकट होने की बात फैलायी। हज़ारों लोग इकट्ठा हुए। तबसे बाबरी मस्जिद में नमाज नहीं हुई। क्योंकि जहां मूर्तियां रखी हों, वहां नमाज नहीं पढ़ी जा सकती। सन 1528 में बनी बाबरी मस्जिद 1992 में आपके कहने से विवादित ढांचा नहीं हो जाएगी।
- यह किस्सा इसलिए सुनाया कि बाबरी मस्जिद को विवादित ढांचा कहने को कमलेश्वर जैसे लेखक को मजबूर करने और उसके लिए 'हमारी भावनाओं को चोट पहुंचाने का' मामला सिर्फ कलाकार चंद्रमोहन और हुसैन से नहीं बनता। 'हमारी भावनाओं को चोट पहुंचाने का हल्ला' इसलिए मचाया जाता है कि जो हम मानते और करते हैं, आप भी वही मानिए, नहीं तो आपकी खैर नहीं है। यह मामला सिर्फ नैतिक पुलिसगिरी का भी नहीं है। यह उस जीवन पद्धति और सिर्फ उन मूल्यों पर हमला है, जो इस देश के लोगों ने सदियों के जीवनानुभव से विकसित किये हैं। यह हमारी सभी बुनियादी आज़ादियों पर हमला है। इसलिए महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय के उस जगप्रसिद्ध ललित कला संकाय के अंतिम वर्ष के छात्र चंद्रमोहन की नियति को मात्र एक बेचारे कलाकार का दुर्भाग्य मत मानिए।
कल आप भी अपने ढंग से जीने और अभिव्यक्त होने के अपने मौलिक अधिकार और स्थान के लिए छह रात जेल में काटने को मजबूर किये जा सकते हैं।आंध्र से वडोदरा के इस प्रख्यात कला संकाय में चित्रकारी सीखने आये चंद्रमोहन की माली हालत नाज़ुक है, लेकिन वह प्रतिभाशाली है, इसलिए उसे दो छात्रवृत्तियां मिली हुई है, जिनने उसे यहां पहुंचाया। गये साल उसे ललित कला अकादमी का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला है। इस साल परीक्षा के लिए उसने कुछ चित्र बनाये। ये चित्र कला संकाय के शिक्षकों और छात्रों के लिए थे, जो इन्हें देख कर और इनका आकलन करके चंद्रमोहन को नंबर और ग्रेड देते। उसका यह काम अपनी संकाय परीक्षा के लिए किया गया था और संकाय के शिक्षकों के लिए ही था। जैसे कोई छात्र अपनी परीक्षा के लिए उत्तर पुस्तिका लिखता है, वैसे ही और उसी के लिए चंद्रमोहन ने ये चित्र बनाये थे। संकाय में उनकी प्रदर्शनी भी परीक्षा और आकलन के लिए लगी थी। यह आम जनता क्या संकाय के बाहर विश्वविद्यालय के लिए भी आम प्रदर्शनी नहीं थी। क्या अंतिम वर्ष की परीक्षा और आकलन के लिए किये गये काम को आप सार्वजनिक स्थल पर आम लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचाने वाला काम कह सकते हैं?फिर विश्व हिंदू परिषद के नीरज जैन अपने साथियों को लेकर उस हॉल में उपद्रव करने और कला संकाय के छात्रों और शिक्षकों से गाली गलौज और मारपीट करने कैसे पहुंच गये? उन्हें न सिर्फ वहां जाने और विश्वविद्यालय के कला संकाय के परीक्षा कार्य में कोई हस्तक्षेप करने का अधिकार था, न वे वहां रखे गये चित्रों पर कोई फैसला दे सकते थे। उन्हें वहां किसी ने बुलाया नहीं था। वह जगह आम जनता के लिए खुली नहीं थी। फिर नीरज जैन और उनके साथी वहां पहुंचे कैसे और चंद्रमोहन के चित्रों पर एतराज़ करके उन्हें हटाने की मांग क्यों करने लगे। इसलिए कि वे विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता हैं और गुजरात में भाजपाई नरेंद्र मोदी की सरकार है? और भी मज़ा देखिए कि न सिर्फ नीरज जैन और उनके साथी वहां पहुंच गये, वहां पुलिस भी आ गयी। जैसे विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने विश्वविद्यालय से इजाज़त नहीं ली थी, वैसे ही पुलिस भी बिना बुलाये, बिना पूछे आयी थी। किसी भी विश्वविद्यालय में यह नहीं हो सकता।लेकिन गुजरात की पुलिस ने कला संकाय में बिना इजाज़त ज़बर्दस्ती घुस आये और परीक्षा के लिए बनाये गये चित्रों पर एतराज़ करने और उपद्रव मचाने वाले विश्व हिंदू परिषद कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। वह पकड़ कर ले गयी बेचारे उस चंद्रमोहन को, जिसके बनाये गये चित्रों पर इन धार्मिक और नैतिक भावनओं वाले कार्यकर्ताओं को एतराज़ था। उस पर भारतीय दंड विधान की धारा 153 ए और 295 के तहत आरोप लगाये गये। अब न तो यह एक आम जनता के लिए खुली सार्वजनिक प्रदर्शनी थी, न चंद्रमोहन ने ये चित्र सबके देखने के लिए बनाये थे। इनसे सार्वजनिक शांति और समरसता और लोगों की भावनाओं के आहत होने का सवाल कहां पैदा होता है? इनसे किसी को एतराज़ हो सकता था, तो कला संकाय के शिक्षकों और छात्रों को होना चाहिए था। लेकिन होता तो क्या ये लोग प्रदर्शनी में उन्हें रखने देते? और पुलिस के चंद्रमोहन को पकड़ कर ले जाने और प्रदर्शनी हटाने और उसके लिए जनता से माफी मांगने के कुलपति के आदेश का ऐसा विरोध करते? प्रोफेसर शिवजी पणिक्कर को कुलपति ने इसलिए निलंबित किया कि वे डीन थे और कुलपति के कहने पर उनने प्रदर्शनी बंद नहीं की, न उन चित्रों के लिए माफी मांगने को तैयार हुए। पणिक्कर अपने देश के विख्यात कला इतिहासकार और कला मर्मज्ञ हैं। वे और कला संकाय के छात्र चंद्रमोहन के साथ आज भी खड़े हैं।लेकिन गुजरात पुलिस ही उपद्रवियों को पकड़ने के बजाय चंद्रमोहन को पकड़ कर नहीं ले गयी, बल्कि विश्वविद्यालय के कुलपति मनोज सोनी भी इस सारे मामले में अपने छात्रों और शिक्षकों का साथ देने के बजाय विश्व हिंदू परिषद के उपद्रवियों के साथ हो गये। उनने कला संकाय में जबरन घुस आये और परीक्षा के काम में दखल देने वाले कार्यकर्ताओं के खिलाफ पुलिस में रपट तक नहीं लिखवायी। बल्कि वे संकाय को प्रदर्शनी बंद करने और डीन पणिक्कर से चंद्रमोहन के चित्रों के लिए सार्वजनिक माफी मांगने के आदेश दे आये। और जब पणिक्कर ने आदेश नहीं माने तो उन्हें निलंबित कर दिया। चंद्रमोहन के खिलाफ पुलिस कार्रवाई में अदालत में विश्वविद्यालय ने अपने छात्र का बचाव तक नहीं किया। पांच रात चंद्रमोहन जेल में बिता कर ज़मानत पर छूटा। पहली बार संघ परिवारियों ने अदालत में चंद्रमोहन की ज़मानत पर सुनवाई तक नहीं होने दी। चंद्रमोहन के पक्ष में प्रदर्शन करने आये देश भर के कलाकारों को विश्वविद्यालय ने अंदर आने तक नहीं दिया।आप साफ देख सकते हैं कि वडोदरा की पुलिस और महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय के कुलपति विश्व हिंदू परिषद के नीरज जैन जैसे कार्यकर्ताओं के साथ खड़े हैं। और लालकृष्ण आडवाणी जैसे जंग लगे लौहपुरुष कह रहे हैं कि चंद्रमोहन जैसे कलाकार 'अश्लील और अशोभनीय' चित्र बना कर हमारी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं। एक विश्वविद्यालय के कला संकाय के छात्र ने अपनी डिग्री के लिए जो चित्र शिक्षकों के आकलन के लिए बनाये, उनसे नीरज जैन जैसे निठल्लों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं और उनने इसे राष्ट्रीय मामला बना दिया। कला के एक छात्र और शिक्षकों के बीच के परीक्षा कार्य में विश्व हिंदू परिषद, भाजपा और गुजरात सरकार का क्या दखल होना चाहिए? सिवाय इसके कि इनकी इच्छा है कि सिद्ध कलाकार ही नहीं, छात्र भी ऐसे चित्र बनाएं, जो हमारे तय किये ढांचें में फिट होते हों। जी, यही फासिस्ट इच्छा है और पता न हो तो जर्मनी और इटली के लोगों से पूछ लो।अब संघ संप्रदायी, वकील और पैरोकार कहते हैं कि यह सवाल कलाकार की सृजन स्वतंत्रता का नहीं, किसी के भी ईश्वर निंदा/धर्म निंदा करने का अपराध का है। चंद्रमोहन ने तो वे चित्र सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए नहीं बनाये थे, लेकिन मंदिर बनाने वालों ने खजुराहो, कोणार्क और भुवनेश्वर के मंदिर सबके और धर्म के लिए बनाये। चंद्रमोहन का एक भी चित्र इन मंदिरों की कई मूर्तियों के सामने नहीं टिकेगा। और छोड़िए इन मंदिरों को, और हमारे पौराणिक साहित्य को- कभी सोचा है अरुण जेटली, कि महादेव का ज्योतिर्लिंग किसका प्रतीक है और जिस पिंडी पर यह लिंग स्थापित किया जाता है, वह किसकी प्रतीक है। क्या हिंदुओं के धर्म और देवी-देवताओं को सामी और संगठित इस्लाम या ईसाइयत समझ रखा है, जिसमें किसी पैगंबर की मूरत बनाना वर्जित हो। थोड़ा अपना धर्म और जीवन परंपरा को समझो। यूरोप और अरब की नकल मत करो।
कल आप भी अपने ढंग से जीने और अभिव्यक्त होने के अपने मौलिक अधिकार और स्थान के लिए छह रात जेल में काटने को मजबूर किये जा सकते हैं।आंध्र से वडोदरा के इस प्रख्यात कला संकाय में चित्रकारी सीखने आये चंद्रमोहन की माली हालत नाज़ुक है, लेकिन वह प्रतिभाशाली है, इसलिए उसे दो छात्रवृत्तियां मिली हुई है, जिनने उसे यहां पहुंचाया। गये साल उसे ललित कला अकादमी का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला है। इस साल परीक्षा के लिए उसने कुछ चित्र बनाये। ये चित्र कला संकाय के शिक्षकों और छात्रों के लिए थे, जो इन्हें देख कर और इनका आकलन करके चंद्रमोहन को नंबर और ग्रेड देते। उसका यह काम अपनी संकाय परीक्षा के लिए किया गया था और संकाय के शिक्षकों के लिए ही था। जैसे कोई छात्र अपनी परीक्षा के लिए उत्तर पुस्तिका लिखता है, वैसे ही और उसी के लिए चंद्रमोहन ने ये चित्र बनाये थे। संकाय में उनकी प्रदर्शनी भी परीक्षा और आकलन के लिए लगी थी। यह आम जनता क्या संकाय के बाहर विश्वविद्यालय के लिए भी आम प्रदर्शनी नहीं थी। क्या अंतिम वर्ष की परीक्षा और आकलन के लिए किये गये काम को आप सार्वजनिक स्थल पर आम लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचाने वाला काम कह सकते हैं?फिर विश्व हिंदू परिषद के नीरज जैन अपने साथियों को लेकर उस हॉल में उपद्रव करने और कला संकाय के छात्रों और शिक्षकों से गाली गलौज और मारपीट करने कैसे पहुंच गये? उन्हें न सिर्फ वहां जाने और विश्वविद्यालय के कला संकाय के परीक्षा कार्य में कोई हस्तक्षेप करने का अधिकार था, न वे वहां रखे गये चित्रों पर कोई फैसला दे सकते थे। उन्हें वहां किसी ने बुलाया नहीं था। वह जगह आम जनता के लिए खुली नहीं थी। फिर नीरज जैन और उनके साथी वहां पहुंचे कैसे और चंद्रमोहन के चित्रों पर एतराज़ करके उन्हें हटाने की मांग क्यों करने लगे। इसलिए कि वे विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता हैं और गुजरात में भाजपाई नरेंद्र मोदी की सरकार है? और भी मज़ा देखिए कि न सिर्फ नीरज जैन और उनके साथी वहां पहुंच गये, वहां पुलिस भी आ गयी। जैसे विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने विश्वविद्यालय से इजाज़त नहीं ली थी, वैसे ही पुलिस भी बिना बुलाये, बिना पूछे आयी थी। किसी भी विश्वविद्यालय में यह नहीं हो सकता।लेकिन गुजरात की पुलिस ने कला संकाय में बिना इजाज़त ज़बर्दस्ती घुस आये और परीक्षा के लिए बनाये गये चित्रों पर एतराज़ करने और उपद्रव मचाने वाले विश्व हिंदू परिषद कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। वह पकड़ कर ले गयी बेचारे उस चंद्रमोहन को, जिसके बनाये गये चित्रों पर इन धार्मिक और नैतिक भावनओं वाले कार्यकर्ताओं को एतराज़ था। उस पर भारतीय दंड विधान की धारा 153 ए और 295 के तहत आरोप लगाये गये। अब न तो यह एक आम जनता के लिए खुली सार्वजनिक प्रदर्शनी थी, न चंद्रमोहन ने ये चित्र सबके देखने के लिए बनाये थे। इनसे सार्वजनिक शांति और समरसता और लोगों की भावनाओं के आहत होने का सवाल कहां पैदा होता है? इनसे किसी को एतराज़ हो सकता था, तो कला संकाय के शिक्षकों और छात्रों को होना चाहिए था। लेकिन होता तो क्या ये लोग प्रदर्शनी में उन्हें रखने देते? और पुलिस के चंद्रमोहन को पकड़ कर ले जाने और प्रदर्शनी हटाने और उसके लिए जनता से माफी मांगने के कुलपति के आदेश का ऐसा विरोध करते? प्रोफेसर शिवजी पणिक्कर को कुलपति ने इसलिए निलंबित किया कि वे डीन थे और कुलपति के कहने पर उनने प्रदर्शनी बंद नहीं की, न उन चित्रों के लिए माफी मांगने को तैयार हुए। पणिक्कर अपने देश के विख्यात कला इतिहासकार और कला मर्मज्ञ हैं। वे और कला संकाय के छात्र चंद्रमोहन के साथ आज भी खड़े हैं।लेकिन गुजरात पुलिस ही उपद्रवियों को पकड़ने के बजाय चंद्रमोहन को पकड़ कर नहीं ले गयी, बल्कि विश्वविद्यालय के कुलपति मनोज सोनी भी इस सारे मामले में अपने छात्रों और शिक्षकों का साथ देने के बजाय विश्व हिंदू परिषद के उपद्रवियों के साथ हो गये। उनने कला संकाय में जबरन घुस आये और परीक्षा के काम में दखल देने वाले कार्यकर्ताओं के खिलाफ पुलिस में रपट तक नहीं लिखवायी। बल्कि वे संकाय को प्रदर्शनी बंद करने और डीन पणिक्कर से चंद्रमोहन के चित्रों के लिए सार्वजनिक माफी मांगने के आदेश दे आये। और जब पणिक्कर ने आदेश नहीं माने तो उन्हें निलंबित कर दिया। चंद्रमोहन के खिलाफ पुलिस कार्रवाई में अदालत में विश्वविद्यालय ने अपने छात्र का बचाव तक नहीं किया। पांच रात चंद्रमोहन जेल में बिता कर ज़मानत पर छूटा। पहली बार संघ परिवारियों ने अदालत में चंद्रमोहन की ज़मानत पर सुनवाई तक नहीं होने दी। चंद्रमोहन के पक्ष में प्रदर्शन करने आये देश भर के कलाकारों को विश्वविद्यालय ने अंदर आने तक नहीं दिया।आप साफ देख सकते हैं कि वडोदरा की पुलिस और महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय के कुलपति विश्व हिंदू परिषद के नीरज जैन जैसे कार्यकर्ताओं के साथ खड़े हैं। और लालकृष्ण आडवाणी जैसे जंग लगे लौहपुरुष कह रहे हैं कि चंद्रमोहन जैसे कलाकार 'अश्लील और अशोभनीय' चित्र बना कर हमारी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं। एक विश्वविद्यालय के कला संकाय के छात्र ने अपनी डिग्री के लिए जो चित्र शिक्षकों के आकलन के लिए बनाये, उनसे नीरज जैन जैसे निठल्लों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं और उनने इसे राष्ट्रीय मामला बना दिया। कला के एक छात्र और शिक्षकों के बीच के परीक्षा कार्य में विश्व हिंदू परिषद, भाजपा और गुजरात सरकार का क्या दखल होना चाहिए? सिवाय इसके कि इनकी इच्छा है कि सिद्ध कलाकार ही नहीं, छात्र भी ऐसे चित्र बनाएं, जो हमारे तय किये ढांचें में फिट होते हों। जी, यही फासिस्ट इच्छा है और पता न हो तो जर्मनी और इटली के लोगों से पूछ लो।अब संघ संप्रदायी, वकील और पैरोकार कहते हैं कि यह सवाल कलाकार की सृजन स्वतंत्रता का नहीं, किसी के भी ईश्वर निंदा/धर्म निंदा करने का अपराध का है। चंद्रमोहन ने तो वे चित्र सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए नहीं बनाये थे, लेकिन मंदिर बनाने वालों ने खजुराहो, कोणार्क और भुवनेश्वर के मंदिर सबके और धर्म के लिए बनाये। चंद्रमोहन का एक भी चित्र इन मंदिरों की कई मूर्तियों के सामने नहीं टिकेगा। और छोड़िए इन मंदिरों को, और हमारे पौराणिक साहित्य को- कभी सोचा है अरुण जेटली, कि महादेव का ज्योतिर्लिंग किसका प्रतीक है और जिस पिंडी पर यह लिंग स्थापित किया जाता है, वह किसकी प्रतीक है। क्या हिंदुओं के धर्म और देवी-देवताओं को सामी और संगठित इस्लाम या ईसाइयत समझ रखा है, जिसमें किसी पैगंबर की मूरत बनाना वर्जित हो। थोड़ा अपना धर्म और जीवन परंपरा को समझो। यूरोप और अरब की नकल मत करो।
प्रभाष जोशी
कागद कारे, 20 मई 2007
कागद कारे, 20 मई 2007
समझौता, शांति प्रक्रिया और मुश्किलें-३

- 1994-95
चार मई 1994 को इसराइल और फ़लस्तीनी लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (पीएलओ) के बीच 1993 की घोषणा को शुरुआती तौर पर लागू करने के लिए काहिरा में सहमति हुई। इस दस्तावेज़ में ग़ज़ा पट्टी के ज़्यादातर इलाक़े से इसराइली सैनिकों की वापसी का ज़िक्र था लेकिन यहूदी बस्तियों और इसके आसपास के इलाक़ों को छोड़कर. साथ में पश्चिमी तट के जेरिको शहर से भी इसराइली सैनिकों की वापसी तय हुई थी. इस मुद्दे पर बातचीत बहुत कठिन था और एक बार तो ऐसा लगा कि बातचीत पटरी से ही उतर जाएगी. 25 फरवरी को एक यहूदी ने हेब्रॉन शहर में नमाज़ अदा कर रहे मुस्लिमों पर गोलियाँ चलाई जिसमें 29 लोग मारे गए. फिर भी चार मई को समझौता हुआ. लेकिन इस समझौते में कई मुश्किलें थीं. समझौते में यह भी तय हुआ था कि अगले पाँच साल के दौरान भी चरणबद्ध वापसी होगी. इसके साथ भी और भी कई जटिल मुद्दों पर बातचीत होगी. इनमें शामिल था- फ़लस्तीनी राष्ट्र का गठन, यरुशलम की स्थिति, क़ब्ज़े वाले इलाक़ों से वापसी और लाखों फ़लस्तीनी शरणार्थियों का मसला. इस शांति प्रक्रिया के कई आलोचक थे. लेकिन उन्हें उस समय ख़ामोश होना पड़ा जब एक जुलाई को यासिर अराफ़ात ग़ज़ा में लौटे और उनका ज़बरदस्त स्वागत हुआ. इसराइली सैनिक जिन इलाक़ों से हटे थे, वहाँ फ़लस्तीनी लिबरेशन आर्मी के सैनिक तैनात किए गए और अराफ़ात फ़लस्तीनी राष्ट्रीय प्राधिकरण के नए प्रमुख बने. जनवरी 1996 में वे इस प्राधिकरण के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए. 1995 ग़ज़ा और जेरिको में स्वशासन के पहले साल फ़लस्तीनियों को काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. फ़लस्तीनी चरमपंथियों के बम हमले में कई इसराइली मारे गए. जबकि इसराइल ने फ़लस्तीनी स्वायत्त शासन वाले इलाक़ों की घेराबंदी करके चरमपंथियों को मारा. फ़लस्तीनी प्रशासन बड़े पैमाने पर होने वाली गिरफ़्तारियों से जूझ रहा था. इसराइल में शांति प्रक्रिया का विरोध करने वालों के पर निकल आए थे. इनमें शामिल थे दक्षिणपंथी और धार्मिक नेता. इस पृष्ठभूमि में शांति प्रक्रिया में देरी स्वभाविक थी और जो समयसीमा तय हुई थी, उसमें बहुत कुछ नहीं हो पाया. लेकिन सितंबर में एक बार फिर आशा की किरण नज़र आई और ओस्लो-2 समझौता हुआ. मिस्र के ताबा शहर में इस समझौते पर सहमति हुई. इस समझौते के तहत पश्चिमी तट को तीन हिस्सों में बाँटा गया- ज़ोन-ए में फ़लस्तीनी शहर हेब्रॉन और पूर्वी येरूशलम को छोड़कर सात फ़ीसदी हिस्सा था. तय हुआ कि यह हिस्सा पूर्ण रूप से फ़लस्तीनियों के नियंत्रण में चला जाएगा. ज़ोन-बी में बात हुई इसराइल और फ़लस्तीन के साझा नियंत्रण की और ये हिस्सा पूरे इलाक़े का 21 फ़ीसदी था. ज़ोन-सी में वे इलाक़े थे, जो पूरी तरह इसराइल के नियंत्रण में रहते. इसराइल ने फ़लस्तीनी क़ैदियों को छोड़ने पर रज़ामंदी दे दी. ओस्लो-2 समझौते का फ़लस्तीनियों ने कम ही स्वागत किया. दूसरी ओर इसराइल के दक्षिणपंथी नेता इस बात से नाराज़ थे कि इसराइली ज़मीन को फ़लस्तीनियों को क्यों दिया जा रहा है. तत्कालीन इसराइली प्रधानमंत्री इत्ज़ाक राबिन के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त अभियान चल रहा था और इसी अभियान के दौरान एक यहूदी कट्टरपंथी ने चार नवंबर को उनकी हत्या कर दी. इसराइली प्रधानमंत्री की हत्या से दुनिया स्तब्ध थी. राबिन की हत्या के बाद कमान मिली उदारवादी नेता शिमॉन पेरेज़ को.
चार मई 1994 को इसराइल और फ़लस्तीनी लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (पीएलओ) के बीच 1993 की घोषणा को शुरुआती तौर पर लागू करने के लिए काहिरा में सहमति हुई। इस दस्तावेज़ में ग़ज़ा पट्टी के ज़्यादातर इलाक़े से इसराइली सैनिकों की वापसी का ज़िक्र था लेकिन यहूदी बस्तियों और इसके आसपास के इलाक़ों को छोड़कर. साथ में पश्चिमी तट के जेरिको शहर से भी इसराइली सैनिकों की वापसी तय हुई थी. इस मुद्दे पर बातचीत बहुत कठिन था और एक बार तो ऐसा लगा कि बातचीत पटरी से ही उतर जाएगी. 25 फरवरी को एक यहूदी ने हेब्रॉन शहर में नमाज़ अदा कर रहे मुस्लिमों पर गोलियाँ चलाई जिसमें 29 लोग मारे गए. फिर भी चार मई को समझौता हुआ. लेकिन इस समझौते में कई मुश्किलें थीं. समझौते में यह भी तय हुआ था कि अगले पाँच साल के दौरान भी चरणबद्ध वापसी होगी. इसके साथ भी और भी कई जटिल मुद्दों पर बातचीत होगी. इनमें शामिल था- फ़लस्तीनी राष्ट्र का गठन, यरुशलम की स्थिति, क़ब्ज़े वाले इलाक़ों से वापसी और लाखों फ़लस्तीनी शरणार्थियों का मसला. इस शांति प्रक्रिया के कई आलोचक थे. लेकिन उन्हें उस समय ख़ामोश होना पड़ा जब एक जुलाई को यासिर अराफ़ात ग़ज़ा में लौटे और उनका ज़बरदस्त स्वागत हुआ. इसराइली सैनिक जिन इलाक़ों से हटे थे, वहाँ फ़लस्तीनी लिबरेशन आर्मी के सैनिक तैनात किए गए और अराफ़ात फ़लस्तीनी राष्ट्रीय प्राधिकरण के नए प्रमुख बने. जनवरी 1996 में वे इस प्राधिकरण के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए. 1995 ग़ज़ा और जेरिको में स्वशासन के पहले साल फ़लस्तीनियों को काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. फ़लस्तीनी चरमपंथियों के बम हमले में कई इसराइली मारे गए. जबकि इसराइल ने फ़लस्तीनी स्वायत्त शासन वाले इलाक़ों की घेराबंदी करके चरमपंथियों को मारा. फ़लस्तीनी प्रशासन बड़े पैमाने पर होने वाली गिरफ़्तारियों से जूझ रहा था. इसराइल में शांति प्रक्रिया का विरोध करने वालों के पर निकल आए थे. इनमें शामिल थे दक्षिणपंथी और धार्मिक नेता. इस पृष्ठभूमि में शांति प्रक्रिया में देरी स्वभाविक थी और जो समयसीमा तय हुई थी, उसमें बहुत कुछ नहीं हो पाया. लेकिन सितंबर में एक बार फिर आशा की किरण नज़र आई और ओस्लो-2 समझौता हुआ. मिस्र के ताबा शहर में इस समझौते पर सहमति हुई. इस समझौते के तहत पश्चिमी तट को तीन हिस्सों में बाँटा गया- ज़ोन-ए में फ़लस्तीनी शहर हेब्रॉन और पूर्वी येरूशलम को छोड़कर सात फ़ीसदी हिस्सा था. तय हुआ कि यह हिस्सा पूर्ण रूप से फ़लस्तीनियों के नियंत्रण में चला जाएगा. ज़ोन-बी में बात हुई इसराइल और फ़लस्तीन के साझा नियंत्रण की और ये हिस्सा पूरे इलाक़े का 21 फ़ीसदी था. ज़ोन-सी में वे इलाक़े थे, जो पूरी तरह इसराइल के नियंत्रण में रहते. इसराइल ने फ़लस्तीनी क़ैदियों को छोड़ने पर रज़ामंदी दे दी. ओस्लो-2 समझौते का फ़लस्तीनियों ने कम ही स्वागत किया. दूसरी ओर इसराइल के दक्षिणपंथी नेता इस बात से नाराज़ थे कि इसराइली ज़मीन को फ़लस्तीनियों को क्यों दिया जा रहा है. तत्कालीन इसराइली प्रधानमंत्री इत्ज़ाक राबिन के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त अभियान चल रहा था और इसी अभियान के दौरान एक यहूदी कट्टरपंथी ने चार नवंबर को उनकी हत्या कर दी. इसराइली प्रधानमंत्री की हत्या से दुनिया स्तब्ध थी. राबिन की हत्या के बाद कमान मिली उदारवादी नेता शिमॉन पेरेज़ को.
- 1996-99
1996 के शुरू में एक बार फिर हिंसा की लहर उठी. इसराइल में कई आत्मघाती धमाके हुए और इसके पीछे था फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास. साथ में इसराइल की बदले की कार्रवाई, जिसके तहत उसने लेबनान में तीन हफ़्ते तक बमबारी की. 29 मई को उदारवादी शिमॉन पेरेज़ चुनाव हार गए हालाँकि अंतर कम था. इस बार कमान मिली दक्षिणीपंथी बेन्यामिन नेतन्याहू. नेतन्याहू ने चुनाव प्रचार में ओस्लो शांति समझौते का विरोध किया था और शांति समझौते के साथ-साथ सुरक्षा पर ज़ोर दिया था. नेतन्याहू के एक फ़ैसले ने अरब जगत को नाराज़ कर दिया और माहौल तनावपूर्ण हो गया. नेतन्याहू ने क़ब्ज़े वाले इलाक़ों में निर्माण पर लगी पाबंदी हटा ली. साथ ही येरूशलम के अल अक़्सा मस्जिद परिसर के नीचे से गुजरने वाली एक पुरातात्त्विक सुरंग को भी खोल दिया. लेकिन शांति प्रक्रिया पर विरोध के बावजूद जनवरी 1997 में नेतन्याहू को अमरीकी दबाव में हेब्रॉन का 80 फ़ीसदी हिस्सा छोड़ना पड़ा. 23 नवंबर 1998 को वाई नदी सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए. जिसमें पश्चिमी तट के कई इलाक़ों से वापसी की बात कही गई थी. लेकिन वाई समझौते को लागू करने को लेकर नेतन्याहू की दक्षिणपंथी सरकार जनवरी, 1999 में गिर गई. एक बार फिर सत्ता लेबर पार्टी के हाथ गई, जिसकी अगुआई इस बार कर रहे थे एहुद बराक. उन्होंने वादा किया था कि वे अरबों के साथ 100 वर्षों से चल रहे संघर्ष को एक साल में ख़त्म कर देंगे. आस्लो समझौते के तहत आख़िरी प्रस्ताव के लिए पाँच साल की जो अंतरिम अवधि तय की गई थी, वह चार मई 1999 को ख़त्म हो गई. लेकिन यासिर अराफ़ात को इस बात पर मना लिया गया कि वे फ़लस्तीनी राष्ट्र की एकतरफ़ा घोषणा को टाल दें ताकि नए प्रशासन से बातचीत का रास्ता खुले.
- 2000-01
एहुद बराक की सरकार के सत्ता संभालने के कारण शांति प्रक्रिया को लेकर काफ़ी आशा बँधी थी लेकिन यह अपेक्षा सही साबित नहीं हो पाई। सितंबर 1999 में एक नयी वाई नदी संधि पर हस्ताक्षर हुआ. लेकिन वापसी पर आख़िरी समझौता नहीं हो पाया. इनके साथ और भी कई मुद्दे विवादित थे, जिनमें शामिल था- येरूशलम, शरणार्थियों का मामला, यहूदी बस्तियाँ और सीमाएँ. प्रधानमंत्री बराक सीरिया के साथ समझौते को लेकर काफ़ी गंभीर थे, लेकिन इस दिशा में भी उन्हें नाकामी ही हाथ लगी. हालाँकि वे इस वादे को पूरा करने में सफल रहे कि इसराइल लेबनान में 21 वर्षों से जारी संघर्ष को ख़त्म करेगा. मई 2000 में इसराइली सेना लेबनान से वापस हट गई. इसके बाद एक बार फिर यासिर अराफ़ात के क़दमों पर सबका ध्यान था. अराफ़ात पर बराक के साथ-साथ अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का भी दबाव था, जो चाहते थे कि अराफ़ात फुटकर में समझौता न करें बल्कि एक पूर्ण समझौता हो. इसी पहल के तहत कैंप डेविड में बातचीत शुरू हुई. दो सप्ताह तक बातचीत चली लेकिन उसका कोई फ़ायदा नहीं हो पाया. इस बातचीत में विवादित मुद्दे थे येरूशलम की स्थिति और फ़लस्तीनी शरणार्थियों का मामला. अस्थिरता के उसी दौर में लिकुड पार्टी की कमान संभाल चुके अरियल शेरॉन ने 28 सितंबर को येरूशलम स्थित अल अक़्सा मस्जिद/टेम्पल माउंट परिसर का दौरा किया. शेरॉन के विरोधियों ने इसे आग में घी डालने वाला क़दम बताया. इसके बाद फ़लस्तीनियों की ओर से विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. जिसे अल अक़्सा इंतिफ़ादा का नाम दिया गया. 2001 2000 के आख़िर तक इसराइली प्रधानमंत्री एहुद बराक की मुश्किलें बढ़ती जा रही थी. इंतिफ़ादा के दौरान ग़ज़ा और पश्चिमी तट में हिंसा की घटनाओं में भी खूब बढ़ोत्तरी हुई. गठबंधन टूटता देख प्रधानमंत्री बराक ने 10 दिसंबर को इस्तीफ़ा दे दिया और संकट के हल के लिए नए चुनावों की घोषणा कर दी. छह फरवरी 2001 को हुए चुनाव में अरियल शेरॉन की लिकुड पार्टी भारी मतों से जीती. सत्ता संभालते ही शेरॉन ने 1990 के दशक के सभी शांति समझौतों के प्रति मुँह मोड़ लिया और फ़लस्तीनी समस्या के प्रति कड़ा रुख़ अपनाया. फ़लस्तीनी चरमपंथियों के ख़िलाफ़ शेरॉन ने कड़ी कार्रवाई की और उनके ठिकानों पर हवाई हमले किए. साथ ही फ़लस्तीनियों के इलाक़े में घुस कर कई कार्रवाई हुई. इसके जवाब में फ़लस्तीनी चरमपंथियों ने भी इसराइली शहरों पर आत्मघाती हमले किए. अमरीका के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस हिंसा के माहौल को ख़त्म करने की कोशिश की. विशेष दूत जॉर्ज मिचेल ने हिंसा की बढ़ती घटनाओं के कारणों की परख की जबकि अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए जॉर्ज टेनेट ने संघर्ष विराम के लिए प्रयास किए. लेकिन इन कोशिशों का भी नतीजा नहीं निकला और हिंसा जारी रही.
1996 के शुरू में एक बार फिर हिंसा की लहर उठी. इसराइल में कई आत्मघाती धमाके हुए और इसके पीछे था फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास. साथ में इसराइल की बदले की कार्रवाई, जिसके तहत उसने लेबनान में तीन हफ़्ते तक बमबारी की. 29 मई को उदारवादी शिमॉन पेरेज़ चुनाव हार गए हालाँकि अंतर कम था. इस बार कमान मिली दक्षिणीपंथी बेन्यामिन नेतन्याहू. नेतन्याहू ने चुनाव प्रचार में ओस्लो शांति समझौते का विरोध किया था और शांति समझौते के साथ-साथ सुरक्षा पर ज़ोर दिया था. नेतन्याहू के एक फ़ैसले ने अरब जगत को नाराज़ कर दिया और माहौल तनावपूर्ण हो गया. नेतन्याहू ने क़ब्ज़े वाले इलाक़ों में निर्माण पर लगी पाबंदी हटा ली. साथ ही येरूशलम के अल अक़्सा मस्जिद परिसर के नीचे से गुजरने वाली एक पुरातात्त्विक सुरंग को भी खोल दिया. लेकिन शांति प्रक्रिया पर विरोध के बावजूद जनवरी 1997 में नेतन्याहू को अमरीकी दबाव में हेब्रॉन का 80 फ़ीसदी हिस्सा छोड़ना पड़ा. 23 नवंबर 1998 को वाई नदी सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए. जिसमें पश्चिमी तट के कई इलाक़ों से वापसी की बात कही गई थी. लेकिन वाई समझौते को लागू करने को लेकर नेतन्याहू की दक्षिणपंथी सरकार जनवरी, 1999 में गिर गई. एक बार फिर सत्ता लेबर पार्टी के हाथ गई, जिसकी अगुआई इस बार कर रहे थे एहुद बराक. उन्होंने वादा किया था कि वे अरबों के साथ 100 वर्षों से चल रहे संघर्ष को एक साल में ख़त्म कर देंगे. आस्लो समझौते के तहत आख़िरी प्रस्ताव के लिए पाँच साल की जो अंतरिम अवधि तय की गई थी, वह चार मई 1999 को ख़त्म हो गई. लेकिन यासिर अराफ़ात को इस बात पर मना लिया गया कि वे फ़लस्तीनी राष्ट्र की एकतरफ़ा घोषणा को टाल दें ताकि नए प्रशासन से बातचीत का रास्ता खुले.
- 2000-01
एहुद बराक की सरकार के सत्ता संभालने के कारण शांति प्रक्रिया को लेकर काफ़ी आशा बँधी थी लेकिन यह अपेक्षा सही साबित नहीं हो पाई। सितंबर 1999 में एक नयी वाई नदी संधि पर हस्ताक्षर हुआ. लेकिन वापसी पर आख़िरी समझौता नहीं हो पाया. इनके साथ और भी कई मुद्दे विवादित थे, जिनमें शामिल था- येरूशलम, शरणार्थियों का मामला, यहूदी बस्तियाँ और सीमाएँ. प्रधानमंत्री बराक सीरिया के साथ समझौते को लेकर काफ़ी गंभीर थे, लेकिन इस दिशा में भी उन्हें नाकामी ही हाथ लगी. हालाँकि वे इस वादे को पूरा करने में सफल रहे कि इसराइल लेबनान में 21 वर्षों से जारी संघर्ष को ख़त्म करेगा. मई 2000 में इसराइली सेना लेबनान से वापस हट गई. इसके बाद एक बार फिर यासिर अराफ़ात के क़दमों पर सबका ध्यान था. अराफ़ात पर बराक के साथ-साथ अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का भी दबाव था, जो चाहते थे कि अराफ़ात फुटकर में समझौता न करें बल्कि एक पूर्ण समझौता हो. इसी पहल के तहत कैंप डेविड में बातचीत शुरू हुई. दो सप्ताह तक बातचीत चली लेकिन उसका कोई फ़ायदा नहीं हो पाया. इस बातचीत में विवादित मुद्दे थे येरूशलम की स्थिति और फ़लस्तीनी शरणार्थियों का मामला. अस्थिरता के उसी दौर में लिकुड पार्टी की कमान संभाल चुके अरियल शेरॉन ने 28 सितंबर को येरूशलम स्थित अल अक़्सा मस्जिद/टेम्पल माउंट परिसर का दौरा किया. शेरॉन के विरोधियों ने इसे आग में घी डालने वाला क़दम बताया. इसके बाद फ़लस्तीनियों की ओर से विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. जिसे अल अक़्सा इंतिफ़ादा का नाम दिया गया. 2001 2000 के आख़िर तक इसराइली प्रधानमंत्री एहुद बराक की मुश्किलें बढ़ती जा रही थी. इंतिफ़ादा के दौरान ग़ज़ा और पश्चिमी तट में हिंसा की घटनाओं में भी खूब बढ़ोत्तरी हुई. गठबंधन टूटता देख प्रधानमंत्री बराक ने 10 दिसंबर को इस्तीफ़ा दे दिया और संकट के हल के लिए नए चुनावों की घोषणा कर दी. छह फरवरी 2001 को हुए चुनाव में अरियल शेरॉन की लिकुड पार्टी भारी मतों से जीती. सत्ता संभालते ही शेरॉन ने 1990 के दशक के सभी शांति समझौतों के प्रति मुँह मोड़ लिया और फ़लस्तीनी समस्या के प्रति कड़ा रुख़ अपनाया. फ़लस्तीनी चरमपंथियों के ख़िलाफ़ शेरॉन ने कड़ी कार्रवाई की और उनके ठिकानों पर हवाई हमले किए. साथ ही फ़लस्तीनियों के इलाक़े में घुस कर कई कार्रवाई हुई. इसके जवाब में फ़लस्तीनी चरमपंथियों ने भी इसराइली शहरों पर आत्मघाती हमले किए. अमरीका के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस हिंसा के माहौल को ख़त्म करने की कोशिश की. विशेष दूत जॉर्ज मिचेल ने हिंसा की बढ़ती घटनाओं के कारणों की परख की जबकि अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए जॉर्ज टेनेट ने संघर्ष विराम के लिए प्रयास किए. लेकिन इन कोशिशों का भी नतीजा नहीं निकला और हिंसा जारी रही.
- 2002-03
2002 के शुरू में हिंसा की नयी लहर आई। मार्च और जून में इसराइल ने लगभग पूरे पश्चिमी तट पर क़ब्ज़ा कर लिया. उस साल फ़लस्तीनी शहरों पर लगातार हमले होते रहे. कई बार उनका संपर्क बाक़ी के शहरों से टूट गया, तो कई बार वहाँ कर्फ़्यू जैसा माहौल रहा. अप्रैल में इसराइली सैनिकों ने पश्चिमी तट के शहर जेनिन के शरणार्थी शिविर पर क़ब्ज़ा कर लिया. फ़लस्तीनियों ने दावा किया कि उनका जनसंहार किया जा रहा है. बड़ी संख्या में इसराइली सैनिक भी मारे गए. इसराइली सैनिकों ने दावा किया कि उन्हें कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा. इसराइल का कहना था कि इस कार्रवाई में सिर्फ़ 52 फ़लस्तीनी मारे गए. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में दोनों पक्षों की आलोचना की गई. लेकिन रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि जनसंहार जैसी कोई बात नहीं थी. हालाँकि मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी रिपोर्ट में इसका ज़िक्र किया कि इसराइली सैनिकों ने जेनिन और नबलुस में कार्रवाई के दौरान युद्ध अपराध किया है. मई में बेथलेहम के चर्च ऑफ़ नेटिविटी में छह हफ़्ते तक चली घेराबंदी उस समय ख़त्म हुई जब 13 फ़लस्तीनी चरपंथियों को देशनिकाला दे दिया गया. इस शहर में जैसे ही इसराइली सैनिक घुसे, बड़ी संख्या में फ़लस्तीनियों ने इस चर्च में पनाह ले ली. इसराइली अधिकारियों ने कहा कि वर्ष 2002 के दौरान हुई कार्रवाई का मकसद था फ़लस्तीनी इलाक़ों से चरमपंथियों के ठिकानों को ख़त्म करना. सालों भर आत्मघाती हमले तो हुए लेकिन कम संख्या में. अगले साल भी शांति प्रक्रिया ठंडे बस्ते में ही पड़ी रही. अमरीका, रूस, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने इसे दोबारा शुरू करने की कोशिश की. इस बार इसका नाम दिया गया- रोडमैप. 2002 में इस दस्तावेज़ के अंशों पर विवाद के कारण इसे जारी करने में देरी हुई. इस बीच इराक़ युद्ध के कारण इस प्रक्रिया में भी रुकावट आ गई. लेकिन अप्रैल 2003 में रोडमैप नाम का यह दस्तावेज़ प्रकाशित हुआ. जून में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने मध्य-पूर्व पर लंबा-चौड़ा भाषण दिया. उन्होंने फ़लस्तीनियों से अपील की कि वे नए नेता का चयन करें, जो आतंकवाद से समझौता न करे.
2002 के शुरू में हिंसा की नयी लहर आई। मार्च और जून में इसराइल ने लगभग पूरे पश्चिमी तट पर क़ब्ज़ा कर लिया. उस साल फ़लस्तीनी शहरों पर लगातार हमले होते रहे. कई बार उनका संपर्क बाक़ी के शहरों से टूट गया, तो कई बार वहाँ कर्फ़्यू जैसा माहौल रहा. अप्रैल में इसराइली सैनिकों ने पश्चिमी तट के शहर जेनिन के शरणार्थी शिविर पर क़ब्ज़ा कर लिया. फ़लस्तीनियों ने दावा किया कि उनका जनसंहार किया जा रहा है. बड़ी संख्या में इसराइली सैनिक भी मारे गए. इसराइली सैनिकों ने दावा किया कि उन्हें कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा. इसराइल का कहना था कि इस कार्रवाई में सिर्फ़ 52 फ़लस्तीनी मारे गए. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में दोनों पक्षों की आलोचना की गई. लेकिन रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि जनसंहार जैसी कोई बात नहीं थी. हालाँकि मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी रिपोर्ट में इसका ज़िक्र किया कि इसराइली सैनिकों ने जेनिन और नबलुस में कार्रवाई के दौरान युद्ध अपराध किया है. मई में बेथलेहम के चर्च ऑफ़ नेटिविटी में छह हफ़्ते तक चली घेराबंदी उस समय ख़त्म हुई जब 13 फ़लस्तीनी चरपंथियों को देशनिकाला दे दिया गया. इस शहर में जैसे ही इसराइली सैनिक घुसे, बड़ी संख्या में फ़लस्तीनियों ने इस चर्च में पनाह ले ली. इसराइली अधिकारियों ने कहा कि वर्ष 2002 के दौरान हुई कार्रवाई का मकसद था फ़लस्तीनी इलाक़ों से चरमपंथियों के ठिकानों को ख़त्म करना. सालों भर आत्मघाती हमले तो हुए लेकिन कम संख्या में. अगले साल भी शांति प्रक्रिया ठंडे बस्ते में ही पड़ी रही. अमरीका, रूस, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने इसे दोबारा शुरू करने की कोशिश की. इस बार इसका नाम दिया गया- रोडमैप. 2002 में इस दस्तावेज़ के अंशों पर विवाद के कारण इसे जारी करने में देरी हुई. इस बीच इराक़ युद्ध के कारण इस प्रक्रिया में भी रुकावट आ गई. लेकिन अप्रैल 2003 में रोडमैप नाम का यह दस्तावेज़ प्रकाशित हुआ. जून में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने मध्य-पूर्व पर लंबा-चौड़ा भाषण दिया. उन्होंने फ़लस्तीनियों से अपील की कि वे नए नेता का चयन करें, जो आतंकवाद से समझौता न करे.
- 2003-06
नवंबर 2004 में फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात का पेरिस के अस्पताल में निधन हो गया जहाँ उन्हें 29 अक्तूबर को भर्ती किया गया था. यासिर अराफ़ात को पश्चिमी तट के शहर रामल्ला में मार्बल और पत्थर से बनी एक क़ब्र में दफ़नाया गया. अराफ़ात की क़ब्र में यरूशलम की अल अक़्सा मस्जिद की मिट्टी भी मिलाई गई. उनका शव एक ऐसे ताबूत में रखकर दफ़नाया गया जिसे ज़रूरत पड़ने पर सुरक्षित निकाला जा सके. फ़लस्तीनियों का कहना है कि उनको उम्मीद है कि कभी भविष्य में उनके ताबूत को यरूशलम ले जाने की इजाज़त मिली तो वे अराफ़ात का शव निकालकर उन्हें यरूशलम में दफ़न कर सकेंगे. अराफ़ात के निधन के बाद वर्ष 2005 के शुरू में फ़लस्तीनी राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हुए जिसमें महमूद अब्बास को बड़े अंतर से जीत मिली. फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास ने चुनाव का बहिष्कार किया था. महमूद अब्बास को आधिकारिक नतीजों के अनुसार करीब 62.3 प्रतिशत वोट मिल थे जबकि अब्बास के मुख्य प्रतिद्वंद्वी मुस्तफ़ा बरग़ूती को सिर्फ़ 19.8 फ़ीसदी मत मिले. जीतने के बाद महमूद अब्बास ने इसराइल के साथ शांति वार्ता बहाल करने की अपील की. लेकिन चुनाव के बाद फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठनों की गतिविधियाँ तेज़ हो गईं. लेकिन फ़रवरी में महमूद अब्बास, हमास और इस्लामिक जेहाद को अस्थायी संघर्षविराम पर राज़ी करवाने में कामयाब हो गए. मिस्र में हुए एक सम्मेलन में अरियल शेरॉन और महमूद अब्बास ने संघर्षविराम की घोषणा कर दी लेकिन चरपपंथी संगठनों ने आधिकारिक तौर पर संघर्षविराम की बात नहीं की. इसके बाद ग़ज़ा से यहूद बस्तियाँ हटाने के फ़ैसले के बाद शांति प्रकिया में अहम मोड़ आया. इसराइली सेना ने अगस्त में गज़ा पट्टी की सभी 21 यहूदी बस्तियों को हटाने का काम शुरू लिया. बस्तियों में रहने वाले यहूदी लोगों ने बस्तियाँ खाली करवाने की योजना का पुरज़ोर विरोध किया और कई जगह भावुक दृश्य देखने को मिले. अरियल शेरॉन ने ग़ज़ा में सैनिकों के काम की तारीफ़ की और कहा कि ये एक दर्दनाक स्थिति है. नवंबर 2005 में अरियल शेरॉन ने सत्ताधारी लिकुड पार्टी छोड़ने की घोषणा की और राष्ट्रपति से मिलकर संसद भंग करके जल्द चुनाव कराने की सिफ़ारिश कर दी. शेरॉन ने कदिमा नाम की अपनी नई पार्टी बना ली. वहीं जनवरी 2006 में फ़लस्तीनी संसदीय चुनाव के लिए भी तैयारी शुरू हो गई. 2006 के शुरू में इसराइल के प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन को दिमाग़ की नस फटने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया. उनकी हालत लगातार गंभीर बनी हुई है और इसराइली नेता एहुद ओलमार्ट उनकी जगह कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर काम कर रहे हैं.
नवंबर 2004 में फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात का पेरिस के अस्पताल में निधन हो गया जहाँ उन्हें 29 अक्तूबर को भर्ती किया गया था. यासिर अराफ़ात को पश्चिमी तट के शहर रामल्ला में मार्बल और पत्थर से बनी एक क़ब्र में दफ़नाया गया. अराफ़ात की क़ब्र में यरूशलम की अल अक़्सा मस्जिद की मिट्टी भी मिलाई गई. उनका शव एक ऐसे ताबूत में रखकर दफ़नाया गया जिसे ज़रूरत पड़ने पर सुरक्षित निकाला जा सके. फ़लस्तीनियों का कहना है कि उनको उम्मीद है कि कभी भविष्य में उनके ताबूत को यरूशलम ले जाने की इजाज़त मिली तो वे अराफ़ात का शव निकालकर उन्हें यरूशलम में दफ़न कर सकेंगे. अराफ़ात के निधन के बाद वर्ष 2005 के शुरू में फ़लस्तीनी राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हुए जिसमें महमूद अब्बास को बड़े अंतर से जीत मिली. फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास ने चुनाव का बहिष्कार किया था. महमूद अब्बास को आधिकारिक नतीजों के अनुसार करीब 62.3 प्रतिशत वोट मिल थे जबकि अब्बास के मुख्य प्रतिद्वंद्वी मुस्तफ़ा बरग़ूती को सिर्फ़ 19.8 फ़ीसदी मत मिले. जीतने के बाद महमूद अब्बास ने इसराइल के साथ शांति वार्ता बहाल करने की अपील की. लेकिन चुनाव के बाद फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठनों की गतिविधियाँ तेज़ हो गईं. लेकिन फ़रवरी में महमूद अब्बास, हमास और इस्लामिक जेहाद को अस्थायी संघर्षविराम पर राज़ी करवाने में कामयाब हो गए. मिस्र में हुए एक सम्मेलन में अरियल शेरॉन और महमूद अब्बास ने संघर्षविराम की घोषणा कर दी लेकिन चरपपंथी संगठनों ने आधिकारिक तौर पर संघर्षविराम की बात नहीं की. इसके बाद ग़ज़ा से यहूद बस्तियाँ हटाने के फ़ैसले के बाद शांति प्रकिया में अहम मोड़ आया. इसराइली सेना ने अगस्त में गज़ा पट्टी की सभी 21 यहूदी बस्तियों को हटाने का काम शुरू लिया. बस्तियों में रहने वाले यहूदी लोगों ने बस्तियाँ खाली करवाने की योजना का पुरज़ोर विरोध किया और कई जगह भावुक दृश्य देखने को मिले. अरियल शेरॉन ने ग़ज़ा में सैनिकों के काम की तारीफ़ की और कहा कि ये एक दर्दनाक स्थिति है. नवंबर 2005 में अरियल शेरॉन ने सत्ताधारी लिकुड पार्टी छोड़ने की घोषणा की और राष्ट्रपति से मिलकर संसद भंग करके जल्द चुनाव कराने की सिफ़ारिश कर दी. शेरॉन ने कदिमा नाम की अपनी नई पार्टी बना ली. वहीं जनवरी 2006 में फ़लस्तीनी संसदीय चुनाव के लिए भी तैयारी शुरू हो गई. 2006 के शुरू में इसराइल के प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन को दिमाग़ की नस फटने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया. उनकी हालत लगातार गंभीर बनी हुई है और इसराइली नेता एहुद ओलमार्ट उनकी जगह कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर काम कर रहे हैं.
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