
- 1994-95
चार मई 1994 को इसराइल और फ़लस्तीनी लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (पीएलओ) के बीच 1993 की घोषणा को शुरुआती तौर पर लागू करने के लिए काहिरा में सहमति हुई। इस दस्तावेज़ में ग़ज़ा पट्टी के ज़्यादातर इलाक़े से इसराइली सैनिकों की वापसी का ज़िक्र था लेकिन यहूदी बस्तियों और इसके आसपास के इलाक़ों को छोड़कर. साथ में पश्चिमी तट के जेरिको शहर से भी इसराइली सैनिकों की वापसी तय हुई थी. इस मुद्दे पर बातचीत बहुत कठिन था और एक बार तो ऐसा लगा कि बातचीत पटरी से ही उतर जाएगी. 25 फरवरी को एक यहूदी ने हेब्रॉन शहर में नमाज़ अदा कर रहे मुस्लिमों पर गोलियाँ चलाई जिसमें 29 लोग मारे गए. फिर भी चार मई को समझौता हुआ. लेकिन इस समझौते में कई मुश्किलें थीं. समझौते में यह भी तय हुआ था कि अगले पाँच साल के दौरान भी चरणबद्ध वापसी होगी. इसके साथ भी और भी कई जटिल मुद्दों पर बातचीत होगी. इनमें शामिल था- फ़लस्तीनी राष्ट्र का गठन, यरुशलम की स्थिति, क़ब्ज़े वाले इलाक़ों से वापसी और लाखों फ़लस्तीनी शरणार्थियों का मसला. इस शांति प्रक्रिया के कई आलोचक थे. लेकिन उन्हें उस समय ख़ामोश होना पड़ा जब एक जुलाई को यासिर अराफ़ात ग़ज़ा में लौटे और उनका ज़बरदस्त स्वागत हुआ. इसराइली सैनिक जिन इलाक़ों से हटे थे, वहाँ फ़लस्तीनी लिबरेशन आर्मी के सैनिक तैनात किए गए और अराफ़ात फ़लस्तीनी राष्ट्रीय प्राधिकरण के नए प्रमुख बने. जनवरी 1996 में वे इस प्राधिकरण के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए. 1995 ग़ज़ा और जेरिको में स्वशासन के पहले साल फ़लस्तीनियों को काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. फ़लस्तीनी चरमपंथियों के बम हमले में कई इसराइली मारे गए. जबकि इसराइल ने फ़लस्तीनी स्वायत्त शासन वाले इलाक़ों की घेराबंदी करके चरमपंथियों को मारा. फ़लस्तीनी प्रशासन बड़े पैमाने पर होने वाली गिरफ़्तारियों से जूझ रहा था. इसराइल में शांति प्रक्रिया का विरोध करने वालों के पर निकल आए थे. इनमें शामिल थे दक्षिणपंथी और धार्मिक नेता. इस पृष्ठभूमि में शांति प्रक्रिया में देरी स्वभाविक थी और जो समयसीमा तय हुई थी, उसमें बहुत कुछ नहीं हो पाया. लेकिन सितंबर में एक बार फिर आशा की किरण नज़र आई और ओस्लो-2 समझौता हुआ. मिस्र के ताबा शहर में इस समझौते पर सहमति हुई. इस समझौते के तहत पश्चिमी तट को तीन हिस्सों में बाँटा गया- ज़ोन-ए में फ़लस्तीनी शहर हेब्रॉन और पूर्वी येरूशलम को छोड़कर सात फ़ीसदी हिस्सा था. तय हुआ कि यह हिस्सा पूर्ण रूप से फ़लस्तीनियों के नियंत्रण में चला जाएगा. ज़ोन-बी में बात हुई इसराइल और फ़लस्तीन के साझा नियंत्रण की और ये हिस्सा पूरे इलाक़े का 21 फ़ीसदी था. ज़ोन-सी में वे इलाक़े थे, जो पूरी तरह इसराइल के नियंत्रण में रहते. इसराइल ने फ़लस्तीनी क़ैदियों को छोड़ने पर रज़ामंदी दे दी. ओस्लो-2 समझौते का फ़लस्तीनियों ने कम ही स्वागत किया. दूसरी ओर इसराइल के दक्षिणपंथी नेता इस बात से नाराज़ थे कि इसराइली ज़मीन को फ़लस्तीनियों को क्यों दिया जा रहा है. तत्कालीन इसराइली प्रधानमंत्री इत्ज़ाक राबिन के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त अभियान चल रहा था और इसी अभियान के दौरान एक यहूदी कट्टरपंथी ने चार नवंबर को उनकी हत्या कर दी. इसराइली प्रधानमंत्री की हत्या से दुनिया स्तब्ध थी. राबिन की हत्या के बाद कमान मिली उदारवादी नेता शिमॉन पेरेज़ को.
चार मई 1994 को इसराइल और फ़लस्तीनी लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (पीएलओ) के बीच 1993 की घोषणा को शुरुआती तौर पर लागू करने के लिए काहिरा में सहमति हुई। इस दस्तावेज़ में ग़ज़ा पट्टी के ज़्यादातर इलाक़े से इसराइली सैनिकों की वापसी का ज़िक्र था लेकिन यहूदी बस्तियों और इसके आसपास के इलाक़ों को छोड़कर. साथ में पश्चिमी तट के जेरिको शहर से भी इसराइली सैनिकों की वापसी तय हुई थी. इस मुद्दे पर बातचीत बहुत कठिन था और एक बार तो ऐसा लगा कि बातचीत पटरी से ही उतर जाएगी. 25 फरवरी को एक यहूदी ने हेब्रॉन शहर में नमाज़ अदा कर रहे मुस्लिमों पर गोलियाँ चलाई जिसमें 29 लोग मारे गए. फिर भी चार मई को समझौता हुआ. लेकिन इस समझौते में कई मुश्किलें थीं. समझौते में यह भी तय हुआ था कि अगले पाँच साल के दौरान भी चरणबद्ध वापसी होगी. इसके साथ भी और भी कई जटिल मुद्दों पर बातचीत होगी. इनमें शामिल था- फ़लस्तीनी राष्ट्र का गठन, यरुशलम की स्थिति, क़ब्ज़े वाले इलाक़ों से वापसी और लाखों फ़लस्तीनी शरणार्थियों का मसला. इस शांति प्रक्रिया के कई आलोचक थे. लेकिन उन्हें उस समय ख़ामोश होना पड़ा जब एक जुलाई को यासिर अराफ़ात ग़ज़ा में लौटे और उनका ज़बरदस्त स्वागत हुआ. इसराइली सैनिक जिन इलाक़ों से हटे थे, वहाँ फ़लस्तीनी लिबरेशन आर्मी के सैनिक तैनात किए गए और अराफ़ात फ़लस्तीनी राष्ट्रीय प्राधिकरण के नए प्रमुख बने. जनवरी 1996 में वे इस प्राधिकरण के अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए. 1995 ग़ज़ा और जेरिको में स्वशासन के पहले साल फ़लस्तीनियों को काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. फ़लस्तीनी चरमपंथियों के बम हमले में कई इसराइली मारे गए. जबकि इसराइल ने फ़लस्तीनी स्वायत्त शासन वाले इलाक़ों की घेराबंदी करके चरमपंथियों को मारा. फ़लस्तीनी प्रशासन बड़े पैमाने पर होने वाली गिरफ़्तारियों से जूझ रहा था. इसराइल में शांति प्रक्रिया का विरोध करने वालों के पर निकल आए थे. इनमें शामिल थे दक्षिणपंथी और धार्मिक नेता. इस पृष्ठभूमि में शांति प्रक्रिया में देरी स्वभाविक थी और जो समयसीमा तय हुई थी, उसमें बहुत कुछ नहीं हो पाया. लेकिन सितंबर में एक बार फिर आशा की किरण नज़र आई और ओस्लो-2 समझौता हुआ. मिस्र के ताबा शहर में इस समझौते पर सहमति हुई. इस समझौते के तहत पश्चिमी तट को तीन हिस्सों में बाँटा गया- ज़ोन-ए में फ़लस्तीनी शहर हेब्रॉन और पूर्वी येरूशलम को छोड़कर सात फ़ीसदी हिस्सा था. तय हुआ कि यह हिस्सा पूर्ण रूप से फ़लस्तीनियों के नियंत्रण में चला जाएगा. ज़ोन-बी में बात हुई इसराइल और फ़लस्तीन के साझा नियंत्रण की और ये हिस्सा पूरे इलाक़े का 21 फ़ीसदी था. ज़ोन-सी में वे इलाक़े थे, जो पूरी तरह इसराइल के नियंत्रण में रहते. इसराइल ने फ़लस्तीनी क़ैदियों को छोड़ने पर रज़ामंदी दे दी. ओस्लो-2 समझौते का फ़लस्तीनियों ने कम ही स्वागत किया. दूसरी ओर इसराइल के दक्षिणपंथी नेता इस बात से नाराज़ थे कि इसराइली ज़मीन को फ़लस्तीनियों को क्यों दिया जा रहा है. तत्कालीन इसराइली प्रधानमंत्री इत्ज़ाक राबिन के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त अभियान चल रहा था और इसी अभियान के दौरान एक यहूदी कट्टरपंथी ने चार नवंबर को उनकी हत्या कर दी. इसराइली प्रधानमंत्री की हत्या से दुनिया स्तब्ध थी. राबिन की हत्या के बाद कमान मिली उदारवादी नेता शिमॉन पेरेज़ को.
- 1996-99
1996 के शुरू में एक बार फिर हिंसा की लहर उठी. इसराइल में कई आत्मघाती धमाके हुए और इसके पीछे था फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास. साथ में इसराइल की बदले की कार्रवाई, जिसके तहत उसने लेबनान में तीन हफ़्ते तक बमबारी की. 29 मई को उदारवादी शिमॉन पेरेज़ चुनाव हार गए हालाँकि अंतर कम था. इस बार कमान मिली दक्षिणीपंथी बेन्यामिन नेतन्याहू. नेतन्याहू ने चुनाव प्रचार में ओस्लो शांति समझौते का विरोध किया था और शांति समझौते के साथ-साथ सुरक्षा पर ज़ोर दिया था. नेतन्याहू के एक फ़ैसले ने अरब जगत को नाराज़ कर दिया और माहौल तनावपूर्ण हो गया. नेतन्याहू ने क़ब्ज़े वाले इलाक़ों में निर्माण पर लगी पाबंदी हटा ली. साथ ही येरूशलम के अल अक़्सा मस्जिद परिसर के नीचे से गुजरने वाली एक पुरातात्त्विक सुरंग को भी खोल दिया. लेकिन शांति प्रक्रिया पर विरोध के बावजूद जनवरी 1997 में नेतन्याहू को अमरीकी दबाव में हेब्रॉन का 80 फ़ीसदी हिस्सा छोड़ना पड़ा. 23 नवंबर 1998 को वाई नदी सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए. जिसमें पश्चिमी तट के कई इलाक़ों से वापसी की बात कही गई थी. लेकिन वाई समझौते को लागू करने को लेकर नेतन्याहू की दक्षिणपंथी सरकार जनवरी, 1999 में गिर गई. एक बार फिर सत्ता लेबर पार्टी के हाथ गई, जिसकी अगुआई इस बार कर रहे थे एहुद बराक. उन्होंने वादा किया था कि वे अरबों के साथ 100 वर्षों से चल रहे संघर्ष को एक साल में ख़त्म कर देंगे. आस्लो समझौते के तहत आख़िरी प्रस्ताव के लिए पाँच साल की जो अंतरिम अवधि तय की गई थी, वह चार मई 1999 को ख़त्म हो गई. लेकिन यासिर अराफ़ात को इस बात पर मना लिया गया कि वे फ़लस्तीनी राष्ट्र की एकतरफ़ा घोषणा को टाल दें ताकि नए प्रशासन से बातचीत का रास्ता खुले.
- 2000-01
एहुद बराक की सरकार के सत्ता संभालने के कारण शांति प्रक्रिया को लेकर काफ़ी आशा बँधी थी लेकिन यह अपेक्षा सही साबित नहीं हो पाई। सितंबर 1999 में एक नयी वाई नदी संधि पर हस्ताक्षर हुआ. लेकिन वापसी पर आख़िरी समझौता नहीं हो पाया. इनके साथ और भी कई मुद्दे विवादित थे, जिनमें शामिल था- येरूशलम, शरणार्थियों का मामला, यहूदी बस्तियाँ और सीमाएँ. प्रधानमंत्री बराक सीरिया के साथ समझौते को लेकर काफ़ी गंभीर थे, लेकिन इस दिशा में भी उन्हें नाकामी ही हाथ लगी. हालाँकि वे इस वादे को पूरा करने में सफल रहे कि इसराइल लेबनान में 21 वर्षों से जारी संघर्ष को ख़त्म करेगा. मई 2000 में इसराइली सेना लेबनान से वापस हट गई. इसके बाद एक बार फिर यासिर अराफ़ात के क़दमों पर सबका ध्यान था. अराफ़ात पर बराक के साथ-साथ अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का भी दबाव था, जो चाहते थे कि अराफ़ात फुटकर में समझौता न करें बल्कि एक पूर्ण समझौता हो. इसी पहल के तहत कैंप डेविड में बातचीत शुरू हुई. दो सप्ताह तक बातचीत चली लेकिन उसका कोई फ़ायदा नहीं हो पाया. इस बातचीत में विवादित मुद्दे थे येरूशलम की स्थिति और फ़लस्तीनी शरणार्थियों का मामला. अस्थिरता के उसी दौर में लिकुड पार्टी की कमान संभाल चुके अरियल शेरॉन ने 28 सितंबर को येरूशलम स्थित अल अक़्सा मस्जिद/टेम्पल माउंट परिसर का दौरा किया. शेरॉन के विरोधियों ने इसे आग में घी डालने वाला क़दम बताया. इसके बाद फ़लस्तीनियों की ओर से विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. जिसे अल अक़्सा इंतिफ़ादा का नाम दिया गया. 2001 2000 के आख़िर तक इसराइली प्रधानमंत्री एहुद बराक की मुश्किलें बढ़ती जा रही थी. इंतिफ़ादा के दौरान ग़ज़ा और पश्चिमी तट में हिंसा की घटनाओं में भी खूब बढ़ोत्तरी हुई. गठबंधन टूटता देख प्रधानमंत्री बराक ने 10 दिसंबर को इस्तीफ़ा दे दिया और संकट के हल के लिए नए चुनावों की घोषणा कर दी. छह फरवरी 2001 को हुए चुनाव में अरियल शेरॉन की लिकुड पार्टी भारी मतों से जीती. सत्ता संभालते ही शेरॉन ने 1990 के दशक के सभी शांति समझौतों के प्रति मुँह मोड़ लिया और फ़लस्तीनी समस्या के प्रति कड़ा रुख़ अपनाया. फ़लस्तीनी चरमपंथियों के ख़िलाफ़ शेरॉन ने कड़ी कार्रवाई की और उनके ठिकानों पर हवाई हमले किए. साथ ही फ़लस्तीनियों के इलाक़े में घुस कर कई कार्रवाई हुई. इसके जवाब में फ़लस्तीनी चरमपंथियों ने भी इसराइली शहरों पर आत्मघाती हमले किए. अमरीका के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस हिंसा के माहौल को ख़त्म करने की कोशिश की. विशेष दूत जॉर्ज मिचेल ने हिंसा की बढ़ती घटनाओं के कारणों की परख की जबकि अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए जॉर्ज टेनेट ने संघर्ष विराम के लिए प्रयास किए. लेकिन इन कोशिशों का भी नतीजा नहीं निकला और हिंसा जारी रही.
1996 के शुरू में एक बार फिर हिंसा की लहर उठी. इसराइल में कई आत्मघाती धमाके हुए और इसके पीछे था फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास. साथ में इसराइल की बदले की कार्रवाई, जिसके तहत उसने लेबनान में तीन हफ़्ते तक बमबारी की. 29 मई को उदारवादी शिमॉन पेरेज़ चुनाव हार गए हालाँकि अंतर कम था. इस बार कमान मिली दक्षिणीपंथी बेन्यामिन नेतन्याहू. नेतन्याहू ने चुनाव प्रचार में ओस्लो शांति समझौते का विरोध किया था और शांति समझौते के साथ-साथ सुरक्षा पर ज़ोर दिया था. नेतन्याहू के एक फ़ैसले ने अरब जगत को नाराज़ कर दिया और माहौल तनावपूर्ण हो गया. नेतन्याहू ने क़ब्ज़े वाले इलाक़ों में निर्माण पर लगी पाबंदी हटा ली. साथ ही येरूशलम के अल अक़्सा मस्जिद परिसर के नीचे से गुजरने वाली एक पुरातात्त्विक सुरंग को भी खोल दिया. लेकिन शांति प्रक्रिया पर विरोध के बावजूद जनवरी 1997 में नेतन्याहू को अमरीकी दबाव में हेब्रॉन का 80 फ़ीसदी हिस्सा छोड़ना पड़ा. 23 नवंबर 1998 को वाई नदी सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हुए. जिसमें पश्चिमी तट के कई इलाक़ों से वापसी की बात कही गई थी. लेकिन वाई समझौते को लागू करने को लेकर नेतन्याहू की दक्षिणपंथी सरकार जनवरी, 1999 में गिर गई. एक बार फिर सत्ता लेबर पार्टी के हाथ गई, जिसकी अगुआई इस बार कर रहे थे एहुद बराक. उन्होंने वादा किया था कि वे अरबों के साथ 100 वर्षों से चल रहे संघर्ष को एक साल में ख़त्म कर देंगे. आस्लो समझौते के तहत आख़िरी प्रस्ताव के लिए पाँच साल की जो अंतरिम अवधि तय की गई थी, वह चार मई 1999 को ख़त्म हो गई. लेकिन यासिर अराफ़ात को इस बात पर मना लिया गया कि वे फ़लस्तीनी राष्ट्र की एकतरफ़ा घोषणा को टाल दें ताकि नए प्रशासन से बातचीत का रास्ता खुले.
- 2000-01
एहुद बराक की सरकार के सत्ता संभालने के कारण शांति प्रक्रिया को लेकर काफ़ी आशा बँधी थी लेकिन यह अपेक्षा सही साबित नहीं हो पाई। सितंबर 1999 में एक नयी वाई नदी संधि पर हस्ताक्षर हुआ. लेकिन वापसी पर आख़िरी समझौता नहीं हो पाया. इनके साथ और भी कई मुद्दे विवादित थे, जिनमें शामिल था- येरूशलम, शरणार्थियों का मामला, यहूदी बस्तियाँ और सीमाएँ. प्रधानमंत्री बराक सीरिया के साथ समझौते को लेकर काफ़ी गंभीर थे, लेकिन इस दिशा में भी उन्हें नाकामी ही हाथ लगी. हालाँकि वे इस वादे को पूरा करने में सफल रहे कि इसराइल लेबनान में 21 वर्षों से जारी संघर्ष को ख़त्म करेगा. मई 2000 में इसराइली सेना लेबनान से वापस हट गई. इसके बाद एक बार फिर यासिर अराफ़ात के क़दमों पर सबका ध्यान था. अराफ़ात पर बराक के साथ-साथ अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का भी दबाव था, जो चाहते थे कि अराफ़ात फुटकर में समझौता न करें बल्कि एक पूर्ण समझौता हो. इसी पहल के तहत कैंप डेविड में बातचीत शुरू हुई. दो सप्ताह तक बातचीत चली लेकिन उसका कोई फ़ायदा नहीं हो पाया. इस बातचीत में विवादित मुद्दे थे येरूशलम की स्थिति और फ़लस्तीनी शरणार्थियों का मामला. अस्थिरता के उसी दौर में लिकुड पार्टी की कमान संभाल चुके अरियल शेरॉन ने 28 सितंबर को येरूशलम स्थित अल अक़्सा मस्जिद/टेम्पल माउंट परिसर का दौरा किया. शेरॉन के विरोधियों ने इसे आग में घी डालने वाला क़दम बताया. इसके बाद फ़लस्तीनियों की ओर से विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. जिसे अल अक़्सा इंतिफ़ादा का नाम दिया गया. 2001 2000 के आख़िर तक इसराइली प्रधानमंत्री एहुद बराक की मुश्किलें बढ़ती जा रही थी. इंतिफ़ादा के दौरान ग़ज़ा और पश्चिमी तट में हिंसा की घटनाओं में भी खूब बढ़ोत्तरी हुई. गठबंधन टूटता देख प्रधानमंत्री बराक ने 10 दिसंबर को इस्तीफ़ा दे दिया और संकट के हल के लिए नए चुनावों की घोषणा कर दी. छह फरवरी 2001 को हुए चुनाव में अरियल शेरॉन की लिकुड पार्टी भारी मतों से जीती. सत्ता संभालते ही शेरॉन ने 1990 के दशक के सभी शांति समझौतों के प्रति मुँह मोड़ लिया और फ़लस्तीनी समस्या के प्रति कड़ा रुख़ अपनाया. फ़लस्तीनी चरमपंथियों के ख़िलाफ़ शेरॉन ने कड़ी कार्रवाई की और उनके ठिकानों पर हवाई हमले किए. साथ ही फ़लस्तीनियों के इलाक़े में घुस कर कई कार्रवाई हुई. इसके जवाब में फ़लस्तीनी चरमपंथियों ने भी इसराइली शहरों पर आत्मघाती हमले किए. अमरीका के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस हिंसा के माहौल को ख़त्म करने की कोशिश की. विशेष दूत जॉर्ज मिचेल ने हिंसा की बढ़ती घटनाओं के कारणों की परख की जबकि अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए जॉर्ज टेनेट ने संघर्ष विराम के लिए प्रयास किए. लेकिन इन कोशिशों का भी नतीजा नहीं निकला और हिंसा जारी रही.
- 2002-03
2002 के शुरू में हिंसा की नयी लहर आई। मार्च और जून में इसराइल ने लगभग पूरे पश्चिमी तट पर क़ब्ज़ा कर लिया. उस साल फ़लस्तीनी शहरों पर लगातार हमले होते रहे. कई बार उनका संपर्क बाक़ी के शहरों से टूट गया, तो कई बार वहाँ कर्फ़्यू जैसा माहौल रहा. अप्रैल में इसराइली सैनिकों ने पश्चिमी तट के शहर जेनिन के शरणार्थी शिविर पर क़ब्ज़ा कर लिया. फ़लस्तीनियों ने दावा किया कि उनका जनसंहार किया जा रहा है. बड़ी संख्या में इसराइली सैनिक भी मारे गए. इसराइली सैनिकों ने दावा किया कि उन्हें कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा. इसराइल का कहना था कि इस कार्रवाई में सिर्फ़ 52 फ़लस्तीनी मारे गए. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में दोनों पक्षों की आलोचना की गई. लेकिन रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि जनसंहार जैसी कोई बात नहीं थी. हालाँकि मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी रिपोर्ट में इसका ज़िक्र किया कि इसराइली सैनिकों ने जेनिन और नबलुस में कार्रवाई के दौरान युद्ध अपराध किया है. मई में बेथलेहम के चर्च ऑफ़ नेटिविटी में छह हफ़्ते तक चली घेराबंदी उस समय ख़त्म हुई जब 13 फ़लस्तीनी चरपंथियों को देशनिकाला दे दिया गया. इस शहर में जैसे ही इसराइली सैनिक घुसे, बड़ी संख्या में फ़लस्तीनियों ने इस चर्च में पनाह ले ली. इसराइली अधिकारियों ने कहा कि वर्ष 2002 के दौरान हुई कार्रवाई का मकसद था फ़लस्तीनी इलाक़ों से चरमपंथियों के ठिकानों को ख़त्म करना. सालों भर आत्मघाती हमले तो हुए लेकिन कम संख्या में. अगले साल भी शांति प्रक्रिया ठंडे बस्ते में ही पड़ी रही. अमरीका, रूस, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने इसे दोबारा शुरू करने की कोशिश की. इस बार इसका नाम दिया गया- रोडमैप. 2002 में इस दस्तावेज़ के अंशों पर विवाद के कारण इसे जारी करने में देरी हुई. इस बीच इराक़ युद्ध के कारण इस प्रक्रिया में भी रुकावट आ गई. लेकिन अप्रैल 2003 में रोडमैप नाम का यह दस्तावेज़ प्रकाशित हुआ. जून में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने मध्य-पूर्व पर लंबा-चौड़ा भाषण दिया. उन्होंने फ़लस्तीनियों से अपील की कि वे नए नेता का चयन करें, जो आतंकवाद से समझौता न करे.
2002 के शुरू में हिंसा की नयी लहर आई। मार्च और जून में इसराइल ने लगभग पूरे पश्चिमी तट पर क़ब्ज़ा कर लिया. उस साल फ़लस्तीनी शहरों पर लगातार हमले होते रहे. कई बार उनका संपर्क बाक़ी के शहरों से टूट गया, तो कई बार वहाँ कर्फ़्यू जैसा माहौल रहा. अप्रैल में इसराइली सैनिकों ने पश्चिमी तट के शहर जेनिन के शरणार्थी शिविर पर क़ब्ज़ा कर लिया. फ़लस्तीनियों ने दावा किया कि उनका जनसंहार किया जा रहा है. बड़ी संख्या में इसराइली सैनिक भी मारे गए. इसराइली सैनिकों ने दावा किया कि उन्हें कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा. इसराइल का कहना था कि इस कार्रवाई में सिर्फ़ 52 फ़लस्तीनी मारे गए. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में दोनों पक्षों की आलोचना की गई. लेकिन रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि जनसंहार जैसी कोई बात नहीं थी. हालाँकि मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अपनी रिपोर्ट में इसका ज़िक्र किया कि इसराइली सैनिकों ने जेनिन और नबलुस में कार्रवाई के दौरान युद्ध अपराध किया है. मई में बेथलेहम के चर्च ऑफ़ नेटिविटी में छह हफ़्ते तक चली घेराबंदी उस समय ख़त्म हुई जब 13 फ़लस्तीनी चरपंथियों को देशनिकाला दे दिया गया. इस शहर में जैसे ही इसराइली सैनिक घुसे, बड़ी संख्या में फ़लस्तीनियों ने इस चर्च में पनाह ले ली. इसराइली अधिकारियों ने कहा कि वर्ष 2002 के दौरान हुई कार्रवाई का मकसद था फ़लस्तीनी इलाक़ों से चरमपंथियों के ठिकानों को ख़त्म करना. सालों भर आत्मघाती हमले तो हुए लेकिन कम संख्या में. अगले साल भी शांति प्रक्रिया ठंडे बस्ते में ही पड़ी रही. अमरीका, रूस, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ ने इसे दोबारा शुरू करने की कोशिश की. इस बार इसका नाम दिया गया- रोडमैप. 2002 में इस दस्तावेज़ के अंशों पर विवाद के कारण इसे जारी करने में देरी हुई. इस बीच इराक़ युद्ध के कारण इस प्रक्रिया में भी रुकावट आ गई. लेकिन अप्रैल 2003 में रोडमैप नाम का यह दस्तावेज़ प्रकाशित हुआ. जून में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने मध्य-पूर्व पर लंबा-चौड़ा भाषण दिया. उन्होंने फ़लस्तीनियों से अपील की कि वे नए नेता का चयन करें, जो आतंकवाद से समझौता न करे.
- 2003-06
नवंबर 2004 में फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात का पेरिस के अस्पताल में निधन हो गया जहाँ उन्हें 29 अक्तूबर को भर्ती किया गया था. यासिर अराफ़ात को पश्चिमी तट के शहर रामल्ला में मार्बल और पत्थर से बनी एक क़ब्र में दफ़नाया गया. अराफ़ात की क़ब्र में यरूशलम की अल अक़्सा मस्जिद की मिट्टी भी मिलाई गई. उनका शव एक ऐसे ताबूत में रखकर दफ़नाया गया जिसे ज़रूरत पड़ने पर सुरक्षित निकाला जा सके. फ़लस्तीनियों का कहना है कि उनको उम्मीद है कि कभी भविष्य में उनके ताबूत को यरूशलम ले जाने की इजाज़त मिली तो वे अराफ़ात का शव निकालकर उन्हें यरूशलम में दफ़न कर सकेंगे. अराफ़ात के निधन के बाद वर्ष 2005 के शुरू में फ़लस्तीनी राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हुए जिसमें महमूद अब्बास को बड़े अंतर से जीत मिली. फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास ने चुनाव का बहिष्कार किया था. महमूद अब्बास को आधिकारिक नतीजों के अनुसार करीब 62.3 प्रतिशत वोट मिल थे जबकि अब्बास के मुख्य प्रतिद्वंद्वी मुस्तफ़ा बरग़ूती को सिर्फ़ 19.8 फ़ीसदी मत मिले. जीतने के बाद महमूद अब्बास ने इसराइल के साथ शांति वार्ता बहाल करने की अपील की. लेकिन चुनाव के बाद फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठनों की गतिविधियाँ तेज़ हो गईं. लेकिन फ़रवरी में महमूद अब्बास, हमास और इस्लामिक जेहाद को अस्थायी संघर्षविराम पर राज़ी करवाने में कामयाब हो गए. मिस्र में हुए एक सम्मेलन में अरियल शेरॉन और महमूद अब्बास ने संघर्षविराम की घोषणा कर दी लेकिन चरपपंथी संगठनों ने आधिकारिक तौर पर संघर्षविराम की बात नहीं की. इसके बाद ग़ज़ा से यहूद बस्तियाँ हटाने के फ़ैसले के बाद शांति प्रकिया में अहम मोड़ आया. इसराइली सेना ने अगस्त में गज़ा पट्टी की सभी 21 यहूदी बस्तियों को हटाने का काम शुरू लिया. बस्तियों में रहने वाले यहूदी लोगों ने बस्तियाँ खाली करवाने की योजना का पुरज़ोर विरोध किया और कई जगह भावुक दृश्य देखने को मिले. अरियल शेरॉन ने ग़ज़ा में सैनिकों के काम की तारीफ़ की और कहा कि ये एक दर्दनाक स्थिति है. नवंबर 2005 में अरियल शेरॉन ने सत्ताधारी लिकुड पार्टी छोड़ने की घोषणा की और राष्ट्रपति से मिलकर संसद भंग करके जल्द चुनाव कराने की सिफ़ारिश कर दी. शेरॉन ने कदिमा नाम की अपनी नई पार्टी बना ली. वहीं जनवरी 2006 में फ़लस्तीनी संसदीय चुनाव के लिए भी तैयारी शुरू हो गई. 2006 के शुरू में इसराइल के प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन को दिमाग़ की नस फटने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया. उनकी हालत लगातार गंभीर बनी हुई है और इसराइली नेता एहुद ओलमार्ट उनकी जगह कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर काम कर रहे हैं.
नवंबर 2004 में फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात का पेरिस के अस्पताल में निधन हो गया जहाँ उन्हें 29 अक्तूबर को भर्ती किया गया था. यासिर अराफ़ात को पश्चिमी तट के शहर रामल्ला में मार्बल और पत्थर से बनी एक क़ब्र में दफ़नाया गया. अराफ़ात की क़ब्र में यरूशलम की अल अक़्सा मस्जिद की मिट्टी भी मिलाई गई. उनका शव एक ऐसे ताबूत में रखकर दफ़नाया गया जिसे ज़रूरत पड़ने पर सुरक्षित निकाला जा सके. फ़लस्तीनियों का कहना है कि उनको उम्मीद है कि कभी भविष्य में उनके ताबूत को यरूशलम ले जाने की इजाज़त मिली तो वे अराफ़ात का शव निकालकर उन्हें यरूशलम में दफ़न कर सकेंगे. अराफ़ात के निधन के बाद वर्ष 2005 के शुरू में फ़लस्तीनी राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हुए जिसमें महमूद अब्बास को बड़े अंतर से जीत मिली. फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास ने चुनाव का बहिष्कार किया था. महमूद अब्बास को आधिकारिक नतीजों के अनुसार करीब 62.3 प्रतिशत वोट मिल थे जबकि अब्बास के मुख्य प्रतिद्वंद्वी मुस्तफ़ा बरग़ूती को सिर्फ़ 19.8 फ़ीसदी मत मिले. जीतने के बाद महमूद अब्बास ने इसराइल के साथ शांति वार्ता बहाल करने की अपील की. लेकिन चुनाव के बाद फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठनों की गतिविधियाँ तेज़ हो गईं. लेकिन फ़रवरी में महमूद अब्बास, हमास और इस्लामिक जेहाद को अस्थायी संघर्षविराम पर राज़ी करवाने में कामयाब हो गए. मिस्र में हुए एक सम्मेलन में अरियल शेरॉन और महमूद अब्बास ने संघर्षविराम की घोषणा कर दी लेकिन चरपपंथी संगठनों ने आधिकारिक तौर पर संघर्षविराम की बात नहीं की. इसके बाद ग़ज़ा से यहूद बस्तियाँ हटाने के फ़ैसले के बाद शांति प्रकिया में अहम मोड़ आया. इसराइली सेना ने अगस्त में गज़ा पट्टी की सभी 21 यहूदी बस्तियों को हटाने का काम शुरू लिया. बस्तियों में रहने वाले यहूदी लोगों ने बस्तियाँ खाली करवाने की योजना का पुरज़ोर विरोध किया और कई जगह भावुक दृश्य देखने को मिले. अरियल शेरॉन ने ग़ज़ा में सैनिकों के काम की तारीफ़ की और कहा कि ये एक दर्दनाक स्थिति है. नवंबर 2005 में अरियल शेरॉन ने सत्ताधारी लिकुड पार्टी छोड़ने की घोषणा की और राष्ट्रपति से मिलकर संसद भंग करके जल्द चुनाव कराने की सिफ़ारिश कर दी. शेरॉन ने कदिमा नाम की अपनी नई पार्टी बना ली. वहीं जनवरी 2006 में फ़लस्तीनी संसदीय चुनाव के लिए भी तैयारी शुरू हो गई. 2006 के शुरू में इसराइल के प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन को दिमाग़ की नस फटने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया. उनकी हालत लगातार गंभीर बनी हुई है और इसराइली नेता एहुद ओलमार्ट उनकी जगह कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर काम कर रहे हैं.
No comments:
Post a Comment