दो जान पहचान मिलकर भ्रमण को निकले और चले-चले नदी के तीर पर पहुँचे। तब एक ने दूसरे से कहा कि भाई! तुम यहाँ खड़े रहो तो मैं शीघ्र एक डुबकी मार लूँ. इसने कहा,‘बहुत अच्छा’. यह सुनकर वह 20 रूपए उसे सौंप कर कपड़े तीर पर रख जो पानी में बैठा तो उसने चतुराई से वे रुपए किसी के हाथ अपने घर भेज दिए. उसने निकल, कपड़े पहन रूपए माँगे. यह बोला,‘लेखा सुन लो’.
उसने कहा,‘अभी देते अबेर भी नहीं हुई, लेखा कैसा?’
निदान दोनों से विवाद होने लगा और सौ पचास लोग घिर आए. उनमें से एक ने रूपए वाले से कहा, ‘अजी क्यों झगड़ते हो?, लेखा किस लिए नहीं सुन लेते’? हार मान उसने कहा, ‘अच्छा कह.' वह बोला, ‘‘जिस काल आपने डुबकी मारी, मैंने जाना डूब गए. पाँच रूपए दे तुम्हारे घर संदेशा भेजा और जब निकले तब भी और पांच रुपए आनंद के दान में दिए. रहे दस तो मैंने अपने घर भेजे हैं उनकी कुछ चिंता हो तो मुझसे टीप लिखवा लो’’.
यह धांधलपने की बात सुनकर वह बिचारा बोला भला भाई! भर पाए।
साभार
असगर वजाहत
Wednesday, 27 June 2007
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