छत्तीसगढ़ मे विकास के नाम पर जो घोटाला हो रह है उस पर ध्यान देने कि जरुरत है। यहा जो चल रहा है उसमे सरकारी अधिकारी " सेल्स मैंन " कि भूमिका मे है। करोडो के वारे न्यारे कैसे होते है, वह भी भुखमरी मे डूबे आदिवासियो के इलाके मे यह देसी विदेशी कम्पनियो कि परियोजनाओ के खाके को देख कर समझा जा सकता है। अमरीकी कम्पनी " टेक्सास पॉवर जेनरेशन " द्वारा राज्य मे १ हजार मेगावाट बिजली उत्पादन का संयंत्र खोलने के सहमती पत्र पर हस्ताक्षर हुए। यानी २० लाख डालर राज्य मे आयेगे। अमरीका कि ही "वन इन्कोर्पोरेट कंपनी " ने ५० करोड़ कि लागत से दवा फैक्ट्री लगाने पर समझौता किया।
- इसके अलावा एक दर्जन विदेशी कम्पनिया खनिज संसाधनों से भरपूर जमीन का दोहन कर ५० हजार करोड़ रुपये इस इलाके मे लगना चाहती है। इसमे पहले कागज को तैयार करने मे ही सत्ताधारियों कि जेब मे ५०० करोड़ पहुंच चुके है। कौडियो के मोल किस तरह समझौता होता है, इसका नजारा " बैलाडिला " मे मिलता है। बैलाडिला खदानों से जो लोहा निकलता है उसे जापान को १६० रुपये प्रति टन ( १६ पैसे प्रति किलोग्राम ) बेचा जता है। वही लोहा मुम्बई के लोहा व्यापरियो और उद्धोगो को ४५० रुपये प्रति टन और छत्तीसगढ़ के व्यापरियो को १६०० रुपये प्रति टन के हिसाब से बेचा जाता है ।
Monday, 25 June 2007
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2 comments:
ठीक कह रहे है परन्तु सारे देश का एक सा हाल है...हर जगह घोटाला ही घोटाला है...कोई तो इलाज़ हो इसका... बहुत से सरकारी मुलाजिम सरकारी संपति को अपनी धरोहर समझते है जैसे की वो सरकार के जवांई है बेहद शर्म की बात है
सुनीता(शानू)
सहमत हूं
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