वर्ण आधारित समाज ने हमेशा से कमजोर तबके को और दबाया है। साहित्य मे हमेशा से दलितो को तिरस्कार और अपमान मिला है। एक उदहारण देखिए ---------पुरी रामकथा मे राम जी विरोध करने वाले लोगो को दैत्य कहा गया। पुरी रामचरित मानस मे " मलिक और सेवक " के संबंध को इस तरह से दिखाया गया है जैसे यही मोक्ष प्राप्त करने का आख़िरी जरिया है। एक क्यो और कैसे हुआ इसका सीधा संबंध वर्णवादी सोच से है। कमजोर तबके को " tadan के अधिकारी बताया " गया है। और उस पर तुर्रा ये कि वो जिन्हे जलील किया गया वो भी इसे झूम झूम कर पढ़ते है। मर्यादा पुरोशोत्तम जिन्हे कहा गया वो " शम्बुक " को संस्कृत पढने पर मौत कि सजा देते है।
- ये धर्मशास्त्र है या सत्ता वर्ग का स्तुति गान ?
साभार :
रमणिका गुप्ता
Sunday, 24 June 2007
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