इन सारी बातो का आखिरी सच यही है कि अगर तमाम परियोजनाओ को अमलीजामा पहनाया जाएगा तो राज्य कि ६० फीसदी कृषी योग्य जमीन किसानो के हाथ से निकल जायेगी। यानी स्पेशल इकनॉमिक जोन (सेज) के बगैर ही ५० हजार एकड़ भूमि पर विदेशी कम्पनियो का कब्जा हो जाएगा। करीब १० लाख आदिवासी और किसान अपनी जमीन गवा कर मजदूर बन जायेंगे या यु कहा जाये कि इन कम्पनियो पर निर्भर हो जायेंगे। नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियो, पुलिस अधिकारियो मुख्य सचिव और केंद्र सरकार के अधिकारियो कि बस्तर मे ३ बैठके आयोजित हुई है। इनमे इस बात पर जोर दिया गया कि नक्सल प्रभावित सभी राज्य, विकास कि गति को तेज करेंगे। इसके लिये कोई समझौता नही किया जाएगा।
- पता नही क्यो आज विकास कि बात करते वक्त बड़ी कम्पनियों को पूंजी निवेश करने के लिये आमंत्रित करना ही आख़िरी उपाये क्यो समझा जता है। इन कम्पनियों मे क्या ये गरीब आदिवासी CEO बन कर हिस्सेदारी करेंगे क्या?
- खुद केंद्र सरकार ने अपनी रिपोर्ट मे यह माना है कि, नक्सल प्रभावित इलाको मे आदिवासियो समेत करीब २००० लोग मारे गए है। नक्सल हिंसा से प्रभावित इन्ही इलाको मे २ लाख करोड़ रुपये से ज्यादा कि परियोजनाओ के सहमतीपत्र पर हस्ताक्षर हुए है। यानी एक मौत के एवज मे १०० करोड़ रुपये लगाए जा रहे है। तो यह सौदा किस सरकार को मंजूर नही होगा?
2 comments:
सही!!
उपाय और भी हैं। अगर मैं केवल पश्चिम बंगाल की बात करें तो इतने कारखाने बंद हैं कि उनकी बेकार पड़ी ज़मीन पर भी नए कारखाने खोले जा सकते हैं। लेकिन सरकार को चाहिए नन्दीग्राम और सिंगूर ही। पुरानी liability से सब बचना चाहते हैं।
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