Sunday, 24 June 2007

साहित्य, दलित और समाज

आज हमारा साहित्य, सिर्फ साहित्य नही कहलाता है। ये अब दलित साहित्य, स्वर्ण साहित्य मे विभाजित हो चूका है। आख़िर इसकी क्या वजह है? खुद को अच्छा समझने वाले स्वर्ण कभी दलितो का लिखा नही समझ पाये, उसे नकारते रहे, उसे बेकार कहा गया। कुछ तो उसे साहित्य मानते ही नही। इसे अश्लील कहा गया। बावजूद इसके दलित साहित्य तरक्की करता गया। किसी ने आगे बढ कर इनकी मदद नही कि। इनके हाथो को नही थमा। थामते भी कैसे उनके छू जाने से धर्म का नाश होता है । स्वर्ग का रास्ता बंद होता है।

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