
हमारे गूजर भाई लोग अपने को दलित और पस्मान्दा बनाने पर तुले हुए है। ऐसा दुसरे मुल्को मे नही होता। लेकिन हमारे यहा हर कोई अपने को अविकसित बता कर आरक्षण चाहता है। आख़िर क्या वजह है कि आरक्षण कि मलाई हर कोई चाहता है।
- कहीं तो गूजर कहते हैं कि वे राजपूत हैं फिर वे अनूसूचित जनजाति का दर्जा क्यों चाहते हैं?
- जबकि किसी भी समाज के लिए आरक्षण सभी चीजों का समाधान नहीं है।गूजरों को आरक्षण का लाभ पहले से ही ओबीसी कोटे के तहत मिला हुआ है. गूजर संतुष्ट क्यों नहीं हैं, इसके पीछे क्या कारण हैं. बहस इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि गूजरों की आरक्षण की मांग जायज़ है अथवा नजायज़ पर अपनी मांगों हेतु गूजर समुदाय द्वारा जो तरीका अपनाया गया है वह शर्मनाक है. ये कितना ख़राब है कि समाज में ऊपर उठने के बज़ाए लोग पिछड़ा घोषित होने की लड़ाई लड़ रहे हैं.
- आइये जरा नजर डालते है गुजरो के इतिहास पर-----------
- प्राचीन इतिहास के जानकारों के अनुसार गूजर मध्य एशिया के कॉकेशस क्षेत्र ( अभी के आर्मेनिया और जॉर्जिया) से आए थे लेकिन इसी इलाक़े से आए आर्यों से अलग थे.
कुछ इतिहासकार इन्हें हूणों का वंशज भी मानते हैं.
भारत में आने के बाद कई वर्षों तक ये योद्धा रहे और छठी सदी के बाद ये सत्ता पर भी क़ाबिज़ होने लगे. सातवीं से 12 वीं सदी में गूजर कई जगह सत्ता में थे.
गुर्जर-प्रतिहार वंश की सत्ता कन्नौज से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात तक फैली थी.
मिहिरभोज को गुर्जर-प्रतिहार वंश का बड़ा शासक माना जाता है और इनकी लड़ाई बिहार के पाल वंश और महाराष्ट्र के राष्ट्रकूट शासकों से होती रहती थी.
12वीं सदी के बाद प्रतिहार वंश का पतन होना शुरू हुआ और ये कई हिस्सों में बँट गए.
गूजर समुदाय से अलग हुए सोलंकी, प्रतिहार और तोमर जातियाँ प्रभावशाली हो गईं और राजपूतों के साथ मिलने लगीं.
अन्य गूजर कबीलों में बदलने लगे और उन्होंने खेती और पशुपालन का काम अपनाया.
ये गूजर राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों में फैले हुए हैं। भारत में गूजर जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा में भी है.
हिमाचल और जम्मू कश्मीर में जहां गूजरों को अनुसूचित जनजाति का दर्ज़ा दिया गया है वहीं राजस्थान में ये लोग अन्य पिछड़ा वर्ग में आते हैं.
- समाजशास्त्रियों के अनुसार हिंदू वर्ण व्यवस्था में इन्हें क्षत्रिय वर्ग में रखा जा सकता है लेकिन जाति के आधार पर ये राजपूतों से पिछड़े माने जाते हैं.
पाकिस्तान में गुजरावालां, फैसलाबाद और लाहौर के आसपास इनकी अच्छी ख़ासी संख्या है.
भारत और पाकिस्तान में गूजर समुदाय के लोग ऊँचे ओहदे पर भी पहुँच हैं. इनमें पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति फ़ज़ल इलाही चौधरी और कांग्रेस के दिवंगत नेता राजेश पायलट शामिल हैं.
- कहीं तो गूजर कहते हैं कि वे राजपूत हैं फिर वे अनूसूचित जनजाति का दर्जा क्यों चाहते हैं?
- जबकि किसी भी समाज के लिए आरक्षण सभी चीजों का समाधान नहीं है।गूजरों को आरक्षण का लाभ पहले से ही ओबीसी कोटे के तहत मिला हुआ है. गूजर संतुष्ट क्यों नहीं हैं, इसके पीछे क्या कारण हैं. बहस इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि गूजरों की आरक्षण की मांग जायज़ है अथवा नजायज़ पर अपनी मांगों हेतु गूजर समुदाय द्वारा जो तरीका अपनाया गया है वह शर्मनाक है. ये कितना ख़राब है कि समाज में ऊपर उठने के बज़ाए लोग पिछड़ा घोषित होने की लड़ाई लड़ रहे हैं.
- आइये जरा नजर डालते है गुजरो के इतिहास पर-----------
- प्राचीन इतिहास के जानकारों के अनुसार गूजर मध्य एशिया के कॉकेशस क्षेत्र ( अभी के आर्मेनिया और जॉर्जिया) से आए थे लेकिन इसी इलाक़े से आए आर्यों से अलग थे.
कुछ इतिहासकार इन्हें हूणों का वंशज भी मानते हैं.
भारत में आने के बाद कई वर्षों तक ये योद्धा रहे और छठी सदी के बाद ये सत्ता पर भी क़ाबिज़ होने लगे. सातवीं से 12 वीं सदी में गूजर कई जगह सत्ता में थे.
गुर्जर-प्रतिहार वंश की सत्ता कन्नौज से लेकर बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात तक फैली थी.
मिहिरभोज को गुर्जर-प्रतिहार वंश का बड़ा शासक माना जाता है और इनकी लड़ाई बिहार के पाल वंश और महाराष्ट्र के राष्ट्रकूट शासकों से होती रहती थी.
12वीं सदी के बाद प्रतिहार वंश का पतन होना शुरू हुआ और ये कई हिस्सों में बँट गए.
गूजर समुदाय से अलग हुए सोलंकी, प्रतिहार और तोमर जातियाँ प्रभावशाली हो गईं और राजपूतों के साथ मिलने लगीं.
अन्य गूजर कबीलों में बदलने लगे और उन्होंने खेती और पशुपालन का काम अपनाया.
ये गूजर राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों में फैले हुए हैं। भारत में गूजर जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली और हरियाणा में भी है.
हिमाचल और जम्मू कश्मीर में जहां गूजरों को अनुसूचित जनजाति का दर्ज़ा दिया गया है वहीं राजस्थान में ये लोग अन्य पिछड़ा वर्ग में आते हैं.
- समाजशास्त्रियों के अनुसार हिंदू वर्ण व्यवस्था में इन्हें क्षत्रिय वर्ग में रखा जा सकता है लेकिन जाति के आधार पर ये राजपूतों से पिछड़े माने जाते हैं.
पाकिस्तान में गुजरावालां, फैसलाबाद और लाहौर के आसपास इनकी अच्छी ख़ासी संख्या है.
भारत और पाकिस्तान में गूजर समुदाय के लोग ऊँचे ओहदे पर भी पहुँच हैं. इनमें पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति फ़ज़ल इलाही चौधरी और कांग्रेस के दिवंगत नेता राजेश पायलट शामिल हैं.
1 comment:
अच्छा लेख है । गूजरों के बारे जानकारी देने के लिए धन्यवाद ।
घुघूती बासूती
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