

पिछले छह दिनों तक चले भीषण संघर्ष के बाद गज़ा पर हमास के लड़ाकों का नियंत्रण हो गया है। हालांकि हमास और फ़तह गुटों को फ़लस्तीनी साझा सरकार में होना चाहिए लेकिन दोनों लड़ रहे हैं और इस संघर्ष मे करीब १०० लोग मारे जा चुके है।
- गुरुवार को दिन भर चली कार्रवाई में हमास ने फ़तह के सुरक्षा मुख्यालय पर कब्ज़ा कर लिया और इसके बाद उन्होंने 'गज़ा की आज़ादी' की घोषणा की. इस घोषणा के बाद इस बात कि आशंका व्यक्त कि जा रही है कि , अब गज़ा और पश्चिमी तट अलग-अलग हो जाएँगे।
आइये पहले बात करते है हमास कि --------- 1987 में गठित यह संगठन फ़लस्तीनी क्षेत्रों से इसराइली सेना को हटाने के लिए लगातार संघर्ष चलाता रहा है.
हमास इसराइल को मान्यता नहीं देता और यह पूरे फ़लस्तीनी क्षेत्र में इस्लामी राष्ट्र की स्थापना करना चाहता है.
हमास इसराइल को मान्यता नहीं देता और यह पूरे फ़लस्तीनी क्षेत्र में इस्लामी राष्ट्र की स्थापना करना चाहता है.
- हमास की स्थापना में धार्मिक नेता शेख़ यासीन अहमद की अहम भूमिका रही थी और उन्हें ही हमास के लोग आध्यात्मिक नेता और प्रेरणा स्रोत मानते रहे थे।
- हमास की एक हथियारबंद इकाई है और दूसरी राजनीतिक इकाई.
राजनीतिक इकाई ने पश्चिमी किनारे और ग़ज़ा पट्टी में अस्पताल और स्कूल बनवाए हैं और यह स्थानीय लोगों की सामाजिक और धार्मिक मामलों में सहायता करती है.
हमास की सशस्त्र इकाई इसराइली ठिकानों पर हमले करती है.
राजनीतिक इकाई ने पश्चिमी किनारे और ग़ज़ा पट्टी में अस्पताल और स्कूल बनवाए हैं और यह स्थानीय लोगों की सामाजिक और धार्मिक मामलों में सहायता करती है.
हमास की सशस्त्र इकाई इसराइली ठिकानों पर हमले करती है.
- सितंबर 2000 में दूसरे इंतफ़दा की शुरूआत के बाद से हमास ने इसराइली क्षेत्रों में कई आत्मघाती हमले किए हैं।
- हमास ग़ज़ा पट्टी में ख़ासा लोकप्रिय है, जहाँ पश्चिमी तट की तुलना में ग़रीबी अधिक है.
-----मध्य पूर्व --------
----इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच चलने वाला संघर्ष दुनिया में सबसे ज़्यादा ख़तरनाक और लंबे समय तक चलने वाली लड़ाई है. इस संघर्ष की जड़ में है ज़मीन पर ऐतिहासिक दावा जो भूमध्यसागर और जॉर्डन सागर के पूर्वी तटीय इलाक़े में पड़ता है. पिछले 100 वर्षों के दौरान फ़लस्तीनियों के सामने उपनिवेशवाद का दौर आया, फिर उन्हें उस इलाक़े से खदेड़ा गया और फिर क़ब्ज़ा कर लिया गया. उसके बाद शुरू हुई एक ऐसे देश के साथ रहने की मुश्किलें जिसे वे अपनी समस्याओं और नुक़सान के लिए ज़िम्मेदार मानते हैं. इसराइल के यहूदी लोगों के लिए उनके पूर्वजों की ज़मीन तो उन्हें मिली लेकिन सालों तक कष्ट झेलने के बाद. इसके बाद भी शांति और सुरक्षा की समस्या बनी हुई है. उन्हें कई बार संकटों का सामना करना पड़ा जब पड़ोसी देशों ने उनके देश को नक्शे पर से मिटाने की कोशिश की.
-- ईसा पूर्व 1250- 638 ईस्वी
प्राचीन काल के इतिहास में इसका वर्णन है कि इसराइल और फ़लस्तीनी प्रशासन के इलाक़े की ज़मीन कई बार जीती गई। प्राचीन इसराइल के बारे में जानकारी धुँधली है. जो भी जानकारी है वह है बाइबिल की पहली पुस्तकों और ऐतिहासिक साहित्यों में. बाइबिल के अनुसार जानकारी ईसापूर्व 1250- इसराइलियों ने पूर्वी भूमध्यसागर के तटीय इलाक़े में स्थित कनान को जीतना शुरू किया और वहाँ बसना भी शुरू किया. ईसापूर्व 961-922- राजा सोलोमन का शासन और येरूशलम में उपासना स्थल का निर्माण. सोलोमन के शासन के बाद उनका साम्राज्य दो हिस्सों में बँट गया. ईसापूर्व 586- दक्षिणी साम्राज्य जूडा पर बेबीलोन ने हमला किया और जीत लिया. यहूदी वहाँ से खदेड़ दिए गए और सोलोमन का मंदिर तोड़ दिया गया. 70 सालों के बाद यहूदियों ने वापस लौटना शुरू किया और धीरे-धीरे येरूशलम को फिर से बसाना शुरू किया और मंदिर का भी फिर से निर्माण किया गया. ऐतिहासिक काल ईसापूर्व 333- सिकंदर महान ने इस इलाक़े को जीता और यह इलाक़ा ग्रीक शासन के अंतर्गत आ गया. ईसापूर्व 165- जूडिया में विद्रोह के बाद प्राचीन काल के आख़िरी स्वतंत्र यहूदी राज्य का गठन हुआ. ईसापूर्व 63- यहूदी राज्य जूडिया रोमन साम्राज्य के फ़लस्तीन प्रांत में मिल गया. 70 ईस्वी- रोमन साम्राज्य के ख़िलाफ़ बग़ावत हुई लेकिन राजा टिटियस ने इसे कुचल दिया और दूसरे उपासना स्थल को भी तोड़ दिया गया. इसी के बाद यहूदियों के बिखराव की शुरुआत हुई. 118-138 ईस्वी- रोमन राजा हेड्रियन के शासनकाल के शुरू में यहूदियों को येरूशलम लौटने की अनुमति दी गई लेकिन 133 ईस्वी में यहूदियों के दूसरे विद्रोह के कारण शहर को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया. लोगों को वहाँ से निकाल दिया गया और ग़ुलाम के रूप में बेच दिया गया. 638 ईस्वी- अरब मुस्लिमों ने बैज़ेन्टाइन शासन का ख़ात्मा किया. बैज़ेन्टाइन साम्राज्य पूर्व में रोमन साम्राज्य के बाद स्थापित हुआ था. इस्लाम के द्वितीय खलीफ़ा उमर ने उस जगह पर एक मस्जिद बनवाई जहाँ आज अल अक़्सा मस्जिद है. इसके बाद 20वीं शताब्दी में आटोमन साम्राज्य के पतन तक इस इलाक़े में ज़्यादातर समय मुसलमानों का ही शासन रहा.
प्राचीन काल के इतिहास में इसका वर्णन है कि इसराइल और फ़लस्तीनी प्रशासन के इलाक़े की ज़मीन कई बार जीती गई। प्राचीन इसराइल के बारे में जानकारी धुँधली है. जो भी जानकारी है वह है बाइबिल की पहली पुस्तकों और ऐतिहासिक साहित्यों में. बाइबिल के अनुसार जानकारी ईसापूर्व 1250- इसराइलियों ने पूर्वी भूमध्यसागर के तटीय इलाक़े में स्थित कनान को जीतना शुरू किया और वहाँ बसना भी शुरू किया. ईसापूर्व 961-922- राजा सोलोमन का शासन और येरूशलम में उपासना स्थल का निर्माण. सोलोमन के शासन के बाद उनका साम्राज्य दो हिस्सों में बँट गया. ईसापूर्व 586- दक्षिणी साम्राज्य जूडा पर बेबीलोन ने हमला किया और जीत लिया. यहूदी वहाँ से खदेड़ दिए गए और सोलोमन का मंदिर तोड़ दिया गया. 70 सालों के बाद यहूदियों ने वापस लौटना शुरू किया और धीरे-धीरे येरूशलम को फिर से बसाना शुरू किया और मंदिर का भी फिर से निर्माण किया गया. ऐतिहासिक काल ईसापूर्व 333- सिकंदर महान ने इस इलाक़े को जीता और यह इलाक़ा ग्रीक शासन के अंतर्गत आ गया. ईसापूर्व 165- जूडिया में विद्रोह के बाद प्राचीन काल के आख़िरी स्वतंत्र यहूदी राज्य का गठन हुआ. ईसापूर्व 63- यहूदी राज्य जूडिया रोमन साम्राज्य के फ़लस्तीन प्रांत में मिल गया. 70 ईस्वी- रोमन साम्राज्य के ख़िलाफ़ बग़ावत हुई लेकिन राजा टिटियस ने इसे कुचल दिया और दूसरे उपासना स्थल को भी तोड़ दिया गया. इसी के बाद यहूदियों के बिखराव की शुरुआत हुई. 118-138 ईस्वी- रोमन राजा हेड्रियन के शासनकाल के शुरू में यहूदियों को येरूशलम लौटने की अनुमति दी गई लेकिन 133 ईस्वी में यहूदियों के दूसरे विद्रोह के कारण शहर को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया. लोगों को वहाँ से निकाल दिया गया और ग़ुलाम के रूप में बेच दिया गया. 638 ईस्वी- अरब मुस्लिमों ने बैज़ेन्टाइन शासन का ख़ात्मा किया. बैज़ेन्टाइन साम्राज्य पूर्व में रोमन साम्राज्य के बाद स्थापित हुआ था. इस्लाम के द्वितीय खलीफ़ा उमर ने उस जगह पर एक मस्जिद बनवाई जहाँ आज अल अक़्सा मस्जिद है. इसके बाद 20वीं शताब्दी में आटोमन साम्राज्य के पतन तक इस इलाक़े में ज़्यादातर समय मुसलमानों का ही शासन रहा.
- पहला ज़ायनिस्ट काँग्रेस 1897 में पहला ज़ायनिस्ट काँग्रेस स्विट्ज़रलैंड के बैज़ल में हुआ. बैठक का मक़सद था 1896 में आई थियोडोर हर्ल्ज़ की क़िताब द जेविश स्टेट पर विचार-विमर्श करना जिसमें यहूदी राज्य के गठन की कल्पना की गई थी. हर्ल्ज़ एक यहूदी पत्रकार और लेखक थे और वियना में रहते थे. वे चाहते थे कि यहूदी का अपना राष्ट्र हो. उनकी इस सोच का शुरुआती कारण था यूरोप का यहूदी विरोधी रुख़. इस काँग्रेस में बैज़ल प्रोग्राम जारी किया गया. इसमें कहा गया कि फ़लस्तीन में यहूदी लोगों के लिए घर बनाया जाए और इसे क़ानून के माध्यम से संरक्षण दिया जाए. इस दिशा में काम करने के लिए इस काँग्रेस में विश्व ज़ायनिस्ट संगठन का गठन किया गया. 1897 के पहले ही कुछ ज़ायनिस्ट इस इलाक़े में पहुँचना शुरू हो गए थे. 1903 तक वहाँ 25,000 ज़ायनिस्ट इकट्ठा हो गए थे जिनमें से ज़्यादातर पूर्वी यूरोप से आए थे. उस समय वह इलाक़ा आटोमन साम्राज्य का हिस्सा था और क़रीब पाँच लाख अरबों के साथ ज़ायनिस्ट भी रहने लगे. 1904 और 1914 के बीच और 40 हज़ार अप्रवासी वहाँ पहुँच गए. 1917 पहले विश्व युद्ध के दौरान इस इलाक़े पर तुर्की के आटोमन साम्राज्य का शासन था. इस इलाक़े से तुर्की का नियंत्रण उस समय ख़त्म हुआ जब ब्रिटेन के सहयोग से अरबों ने आटोमन साम्राज्य को ख़त्म कर दिया. 1918 में विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटेन ने इस इलाक़े पर नियंत्रण कर लिया. 25 अप्रैल 1920 को लीग ऑफ़ नेशंस ने उस इलाक़े में ब्रितानी शासन को मान्यता दे दी. बदलाव के इस दौर में तीन महत्वपूर्ण वादे किए गए थे. 1916 में मिस्र में ब्रितानी उपायुक्त सर हेनरी मैकमोहन ने अरब नेताओं से वादा किया था कि विश्व युद्ध के बाद पूर्व आटोमन साम्राज्यों के प्रांतों को स्वतंत्र कर दिया जाएगा. लेकिन उसी समय ब्रिटेन और फ़्रांस ने आपस में एक और संधि कर रखी थी जिसके तहत ये प्रावधान था कि दोनों देश इलाक़े को बाँट लेंगे. 1917 में ब्रिटेन के विदेश मंत्री ऑर्थर बैलफ़ोर ने वादा किया कि ब्रिटेन फ़लस्तीन में यहूदी लोगों के लिए बस्ती बनाने की दिशा में काम करेगा. बैलफ़ोर ने शीर्ष ज़ायनिस्ट नेता लॉर्ड रॉट्सचाइल्ड को पत्र लिखकर ये वादा किया था. बाद में यह बैलफ़ोर घोषणापत्र के रूप में जाना गया.
- 1929-36
-1920 और 1930 के दशक की ज़ायनिस्ट योजनाओं के कारण लाखों यहूदी ब्रितानी क़ब्ज़े वाले फ़लस्तीन क्षेत्र में आ गए। इसके कारण अरब समुदाय में रोष पैदा होने लगा. 1922 की एक ब्रितानी जनगणना के मुताबिक़ फ़लस्तीन की सात लाख 50 हज़ार की आबादी में यहूदियों की आबादी क़रीब 11 फ़ीसदी बढ़ गई. अगले 15 सालों में तीन लाख से ज़्यादा यहूदी इस इलाक़े में पहुँचे. 1929 में अरब और ज़ायनिस्ट लोगों के बीच बढ़ती दूरी ख़ूनी संघर्ष में बदल गई. संघर्ष में फ़लस्तीनियों ने 133 यहूदियों को मार डाला जबकि 110 फ़लस्तीन ब्रितानी पुलिस के हाथों मारे गए. 1936 में अरब लोगों का ग़ुस्सा एक बार फिर भड़का और हड़ताल के दौरान व्यापाक अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया. उस समय चरमपंथी ज़ायनिस्ट ग्रुप इरगुन ज़वई लूमी ने फ़लस्तीनियों और ब्रितानी ठिकानों पर हमले की योजना बनाना शुरू कर दिया था. मक़सद था फ़लस्तीन और मौजूदा जॉर्डन को आज़ाद कराना. जुलाई 1937 में ब्रिटेन ने एक शाही आयोग का गठन किया जिसकी अगुआई की भारतीय मामलों के पूर्व विदेश सचिव लॉर्ड पील. इस आयोग ने इलाक़े को दो हिस्सों में बाँटने की सिफ़ारिश की. एक यहूदी राज्य और एक अरब राज्य. फ़लस्तीनी और अरब प्रतिनिधियों ने इसे अस्वीकार कर दिया. उन्होंने बड़ी संख्या में आ रहे यहूदियों पर रोक लगाने की मांग की. उनकी एक और मांग थी कि देश को बाँटा न जाए और एकीकृत देश में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षा दी जाए. ब्रितानी आयोग की सिफ़ारिश का हिंसात्मक विरोध 1938 तक जारी रहा. बाद में ब्रिटेन ने बलपूर्वक इस विरोध को कुचल दिया.
-1920 और 1930 के दशक की ज़ायनिस्ट योजनाओं के कारण लाखों यहूदी ब्रितानी क़ब्ज़े वाले फ़लस्तीन क्षेत्र में आ गए। इसके कारण अरब समुदाय में रोष पैदा होने लगा. 1922 की एक ब्रितानी जनगणना के मुताबिक़ फ़लस्तीन की सात लाख 50 हज़ार की आबादी में यहूदियों की आबादी क़रीब 11 फ़ीसदी बढ़ गई. अगले 15 सालों में तीन लाख से ज़्यादा यहूदी इस इलाक़े में पहुँचे. 1929 में अरब और ज़ायनिस्ट लोगों के बीच बढ़ती दूरी ख़ूनी संघर्ष में बदल गई. संघर्ष में फ़लस्तीनियों ने 133 यहूदियों को मार डाला जबकि 110 फ़लस्तीन ब्रितानी पुलिस के हाथों मारे गए. 1936 में अरब लोगों का ग़ुस्सा एक बार फिर भड़का और हड़ताल के दौरान व्यापाक अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया. उस समय चरमपंथी ज़ायनिस्ट ग्रुप इरगुन ज़वई लूमी ने फ़लस्तीनियों और ब्रितानी ठिकानों पर हमले की योजना बनाना शुरू कर दिया था. मक़सद था फ़लस्तीन और मौजूदा जॉर्डन को आज़ाद कराना. जुलाई 1937 में ब्रिटेन ने एक शाही आयोग का गठन किया जिसकी अगुआई की भारतीय मामलों के पूर्व विदेश सचिव लॉर्ड पील. इस आयोग ने इलाक़े को दो हिस्सों में बाँटने की सिफ़ारिश की. एक यहूदी राज्य और एक अरब राज्य. फ़लस्तीनी और अरब प्रतिनिधियों ने इसे अस्वीकार कर दिया. उन्होंने बड़ी संख्या में आ रहे यहूदियों पर रोक लगाने की मांग की. उनकी एक और मांग थी कि देश को बाँटा न जाए और एकीकृत देश में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षा दी जाए. ब्रितानी आयोग की सिफ़ारिश का हिंसात्मक विरोध 1938 तक जारी रहा. बाद में ब्रिटेन ने बलपूर्वक इस विरोध को कुचल दिया.
1 comment:
बहुत ही जानकारी पूर्ण लेख है। धन्यवाद। फ़लस्तीन और इस्राईल के बीच का मसला कभी भी ठीक तरह से समझ नहीं आया था। अंग्रेज़ी में बहुत अधिक पढ़ने को मन नहीं करता था। ये जानकारी हिन्दी में विस्तार से उपलब्ध करवाने के लिए धन्यवाद।
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