
- 1947-48
1920 से फ़लस्तीन पर शासन कर रहे ब्रिटेन ने ज़ायनिस्ट-अरब विवाद को सुलझाने की ज़िम्मेदारी 1947 में संयुक्त राष्ट्र को सौंप दी. इलाक़े में हिंसा फैल गई. अरब और यहूदियों के बीच संघर्ष होने लगा. उस समय तक यहूदी आबादी का एक तिहाई हो गए थे. स्थिति नाज़ी जर्मनी में यहूदी के साथ होने वाले बर्ताव के कारण और ख़राब हो गई. लाखों यहूदी यूरोप से दर-बदर हो गए. माना जाता है कि दूसरे विश्व युद्ध के समय होलोकॉस्ट में 60 लाख यहूदी मारे गए. संयुक्त राष्ट्र ने इस मामले पर एक विशेष समिति का गठन किया जिसने अलग-अलग यहूदी और फ़लस्तीनी राज्य के गठन की सिफ़ारिश की. फ़लस्तीनी प्रतिनिधियों ने इस सिफ़ारिश को नामंज़ूर कर दिया जबकि यहूदी पक्ष ने इसे स्वीकार कर लिया. विभाजन योजना के अनुसार यहूदियों को फ़लस्तीन का 56.47 फ़ीसदी इलाक़ा देने की बात कही गई. जबकि अरब राज्य के लिए 43.53 प्रतिशत इलाक़ा देने का प्रस्ताव था. जबकि येरूशलम की अंतरराष्ट्रीय घेरेबंदी की बात कही गई. 29 नवंबर 1947 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में 33 देशों ने विभाजन योजना के पक्ष में मतदान किया. 13 देशों ने इसके ख़िलाफ़ मतदान किया जबकि 10 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया. फ़लस्तीनियों ने इस योजना को पहले ही नामंज़ूर कर दिया था और इसे कभी लागू भी नहीं किया जा सका. इस बीच ब्रिटेन ने घोषणा की कि वह 15 मई 1948 को फ़लस्तीन से हट जाएगा. लेकिन इस तारीख़ से पहले ही हिंसा भड़क उठी. संघर्ष में ब्रितानी सैनिक भी मारे गए. इस कारण फ़लस्तीन में ब्रिटेन की उपस्थिति पर ब्रिटेन में काफ़ी विरोध हुआ. इसके अलावा अमरीका के दवाब में ब्रिटेन इस बात पर भी तैयार हो गया कि वहाँ और यहूदी लोगों को आने दिया जाए. यह ज़ायनिस्ट के प्रति अमरीका के बढ़ते समर्थन का भी संकेत था. अरब और यहूदी- दोनों पक्षों ने संघर्ष की तैयारी के लिए सेना का गठन शुरू किया. इस दिशा में पहला क़दम यहूदियों ने उठाया जब फ़लस्तीनियों को गाँव से निकालने के लिए अभियान चलाया गया. 1948 14 मई 1948 को दोपहर चार बजे तेल अवीव में इसराइल के गठन की घोषणा की गई. यह क़रीब 2000 वर्षों में पहला यहूदी राष्ट्र था. यह घोषणा अगले दिन कार्यरूप में आई जब ब्रिटेन की आख़िरी सैनिक टुकड़ी वहाँ से हटी. फ़लस्तीनी 15 मई का दिन 'आपदा' के रूप में याद करते हैं. इस साल की शुरुआत हुई थी अरब और यहूदी सैनिकों के एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नियंत्रण वाले इलाक़े में हमला करके. इरगुन और लेही चरमपंथी गुटों के सहयोग से यहूदी सैनिकों ने यहूदी राष्ट्र के लिए तय इलाक़ों पर तो नियंत्रण किया ही साथ में फ़लस्तीनियों के कुछ इलाक़ों पर भी क़ब्ज़ा कर लिया. नौ अप्रैल को येरूशलम के निकट डेयर यासीन नामक गाँव में कई लोगों की हत्या कर दी. इस जनसंहार की ख़बर फैलते ही फ़लस्तीनियों में डर फैल गया और लाखों की संख्या में फ़लस्तीनी मिस्र, लेबनॉन और आज के पश्चिमी तट के इलाक़ों की ओर भाग गए. यहूदी सैनिक नेगेव, गैलिली, पश्चिमी येरूशलम और तटीय मैदानी इलाक़ों में विजयी रहे. इसराइली राष्ट्र की घोषणा के बाद जॉर्डन, मिस्र, लेबनॉन, सीरिया और इराक़ के अरब सैनिकों ने हाथ मिलाया और इसराइल पर हमला कर दिया. लेकिन इसराइली सेना ने इस हमले को नाकाम कर दिया. संघर्ष विराम के बाद इसराइली सीमा क़रीब-क़रीब उन हिस्सों तक फैल गई जो ब्रितानी शासन के अधीन फ़लस्तीनी इलाक़े थे. मिस्र को गज़ा पट्टी मिल गई जबकि जॉर्डन ने पूर्वी येरूशलम और आज के पश्चिमी तट के इलाक़ों को अपने में मिला लिया. यह ब्रितानी शासन वाले फ़लस्तीन का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा था।
1920 से फ़लस्तीन पर शासन कर रहे ब्रिटेन ने ज़ायनिस्ट-अरब विवाद को सुलझाने की ज़िम्मेदारी 1947 में संयुक्त राष्ट्र को सौंप दी. इलाक़े में हिंसा फैल गई. अरब और यहूदियों के बीच संघर्ष होने लगा. उस समय तक यहूदी आबादी का एक तिहाई हो गए थे. स्थिति नाज़ी जर्मनी में यहूदी के साथ होने वाले बर्ताव के कारण और ख़राब हो गई. लाखों यहूदी यूरोप से दर-बदर हो गए. माना जाता है कि दूसरे विश्व युद्ध के समय होलोकॉस्ट में 60 लाख यहूदी मारे गए. संयुक्त राष्ट्र ने इस मामले पर एक विशेष समिति का गठन किया जिसने अलग-अलग यहूदी और फ़लस्तीनी राज्य के गठन की सिफ़ारिश की. फ़लस्तीनी प्रतिनिधियों ने इस सिफ़ारिश को नामंज़ूर कर दिया जबकि यहूदी पक्ष ने इसे स्वीकार कर लिया. विभाजन योजना के अनुसार यहूदियों को फ़लस्तीन का 56.47 फ़ीसदी इलाक़ा देने की बात कही गई. जबकि अरब राज्य के लिए 43.53 प्रतिशत इलाक़ा देने का प्रस्ताव था. जबकि येरूशलम की अंतरराष्ट्रीय घेरेबंदी की बात कही गई. 29 नवंबर 1947 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में 33 देशों ने विभाजन योजना के पक्ष में मतदान किया. 13 देशों ने इसके ख़िलाफ़ मतदान किया जबकि 10 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया. फ़लस्तीनियों ने इस योजना को पहले ही नामंज़ूर कर दिया था और इसे कभी लागू भी नहीं किया जा सका. इस बीच ब्रिटेन ने घोषणा की कि वह 15 मई 1948 को फ़लस्तीन से हट जाएगा. लेकिन इस तारीख़ से पहले ही हिंसा भड़क उठी. संघर्ष में ब्रितानी सैनिक भी मारे गए. इस कारण फ़लस्तीन में ब्रिटेन की उपस्थिति पर ब्रिटेन में काफ़ी विरोध हुआ. इसके अलावा अमरीका के दवाब में ब्रिटेन इस बात पर भी तैयार हो गया कि वहाँ और यहूदी लोगों को आने दिया जाए. यह ज़ायनिस्ट के प्रति अमरीका के बढ़ते समर्थन का भी संकेत था. अरब और यहूदी- दोनों पक्षों ने संघर्ष की तैयारी के लिए सेना का गठन शुरू किया. इस दिशा में पहला क़दम यहूदियों ने उठाया जब फ़लस्तीनियों को गाँव से निकालने के लिए अभियान चलाया गया. 1948 14 मई 1948 को दोपहर चार बजे तेल अवीव में इसराइल के गठन की घोषणा की गई. यह क़रीब 2000 वर्षों में पहला यहूदी राष्ट्र था. यह घोषणा अगले दिन कार्यरूप में आई जब ब्रिटेन की आख़िरी सैनिक टुकड़ी वहाँ से हटी. फ़लस्तीनी 15 मई का दिन 'आपदा' के रूप में याद करते हैं. इस साल की शुरुआत हुई थी अरब और यहूदी सैनिकों के एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नियंत्रण वाले इलाक़े में हमला करके. इरगुन और लेही चरमपंथी गुटों के सहयोग से यहूदी सैनिकों ने यहूदी राष्ट्र के लिए तय इलाक़ों पर तो नियंत्रण किया ही साथ में फ़लस्तीनियों के कुछ इलाक़ों पर भी क़ब्ज़ा कर लिया. नौ अप्रैल को येरूशलम के निकट डेयर यासीन नामक गाँव में कई लोगों की हत्या कर दी. इस जनसंहार की ख़बर फैलते ही फ़लस्तीनियों में डर फैल गया और लाखों की संख्या में फ़लस्तीनी मिस्र, लेबनॉन और आज के पश्चिमी तट के इलाक़ों की ओर भाग गए. यहूदी सैनिक नेगेव, गैलिली, पश्चिमी येरूशलम और तटीय मैदानी इलाक़ों में विजयी रहे. इसराइली राष्ट्र की घोषणा के बाद जॉर्डन, मिस्र, लेबनॉन, सीरिया और इराक़ के अरब सैनिकों ने हाथ मिलाया और इसराइल पर हमला कर दिया. लेकिन इसराइली सेना ने इस हमले को नाकाम कर दिया. संघर्ष विराम के बाद इसराइली सीमा क़रीब-क़रीब उन हिस्सों तक फैल गई जो ब्रितानी शासन के अधीन फ़लस्तीनी इलाक़े थे. मिस्र को गज़ा पट्टी मिल गई जबकि जॉर्डन ने पूर्वी येरूशलम और आज के पश्चिमी तट के इलाक़ों को अपने में मिला लिया. यह ब्रितानी शासन वाले फ़लस्तीन का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा था।
- 1964-67
1948 से इसराइल के पड़ोसी अरब देशों में इस बात की प्रतिद्वंद्विता बढ़ गई थी कि कौन देश इसराइली राष्ट्र के गठन के ख़िलाफ़ अरब देशों का नेतृत्व करेगा. इस प्रतिद्वंद्विता के बीच फ़लस्तीनी मूक दर्शक बन गए. जनवरी 1964 में अरब देशों ने फ़लस्तीनी लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (पीएलओ) का गठन किया. अरब देश ऐसा फ़लस्तीनी संगठन चाहते थे जो उनके नियंत्रण में रहे. लेकिन फ़लस्तीनी एक स्वतंत्र संगठन चाहते थे. यही लक्ष्य था फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात का जिन्होंने 1969 में पीएलओ की अध्यक्षता संभाली. पाँच साल पहले गुप्त रूप से गठित उनका संगठन फ़तह इसराइल के ख़िलाफ़ सशस्त्र अभियान के कारण कुख्यात हो रहा था. 1968 में जॉर्डन के कारामेह में फ़तह ने बड़ी संख्या में इसराइली सैनिकों को हताहत किया. 1967 इसराइल और उसके पड़ोसी अरब देशों के बीच बढ़ते तनाव का नतीजा था 5 जून 1967 को शुरू हुआ युद्ध. युद्ध सिर्फ़ छह दिन चला और 11 जून को ख़त्म हो गया. लेकिन इसने मध्यपूर्व के संघर्ष का चेहरा बदल दिया. इसराइल ने दक्षिण में मिस्र से गज़ा और सिनई को छीन लिया. जबकि उत्तर में उसने सीरिया से गोलान की पहाड़ी छीन ली. इसराइल ने पश्चिमी तट और पूर्वी येरूशलम से जॉर्डन के सैनिकों को भगा दिया. पहले ही दिन मिस्र की शक्तिशाली वायु सेना को इसराइल ने ध्वस्त कर दिया. दरअसल इसराइली जेट विमानों ने बमबारी करके मिस्र के विमानों को नष्ट कर दिया. इस युद्ध के बाद इसराइल को मिले इलाक़ों से इसराइल का क्षेत्रफल और बढ़ गया. इस युद्ध में जीत से इसराइल और उसके समर्थकों का आत्मविश्वास बढ़ गया. लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव संख्या 242 पारित किया और ज़ोर देकर कहा कि युद्ध के बल पर हासिल इलाक़े को मान्यता नहीं दी जाएगी. इसराइल से अपील की गई कि वह युद्ध के बाद हथियाए गए इलाक़ों को ख़ाली कर दे. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ इस युद्ध के कारण क़रीब पाँच लाख फ़लस्तीनी दर-बदर हो गए और उन्होंने मिस्र, लेबनान, सीरिया और जॉर्डन में पनाह ली.
1948 से इसराइल के पड़ोसी अरब देशों में इस बात की प्रतिद्वंद्विता बढ़ गई थी कि कौन देश इसराइली राष्ट्र के गठन के ख़िलाफ़ अरब देशों का नेतृत्व करेगा. इस प्रतिद्वंद्विता के बीच फ़लस्तीनी मूक दर्शक बन गए. जनवरी 1964 में अरब देशों ने फ़लस्तीनी लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (पीएलओ) का गठन किया. अरब देश ऐसा फ़लस्तीनी संगठन चाहते थे जो उनके नियंत्रण में रहे. लेकिन फ़लस्तीनी एक स्वतंत्र संगठन चाहते थे. यही लक्ष्य था फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात का जिन्होंने 1969 में पीएलओ की अध्यक्षता संभाली. पाँच साल पहले गुप्त रूप से गठित उनका संगठन फ़तह इसराइल के ख़िलाफ़ सशस्त्र अभियान के कारण कुख्यात हो रहा था. 1968 में जॉर्डन के कारामेह में फ़तह ने बड़ी संख्या में इसराइली सैनिकों को हताहत किया. 1967 इसराइल और उसके पड़ोसी अरब देशों के बीच बढ़ते तनाव का नतीजा था 5 जून 1967 को शुरू हुआ युद्ध. युद्ध सिर्फ़ छह दिन चला और 11 जून को ख़त्म हो गया. लेकिन इसने मध्यपूर्व के संघर्ष का चेहरा बदल दिया. इसराइल ने दक्षिण में मिस्र से गज़ा और सिनई को छीन लिया. जबकि उत्तर में उसने सीरिया से गोलान की पहाड़ी छीन ली. इसराइल ने पश्चिमी तट और पूर्वी येरूशलम से जॉर्डन के सैनिकों को भगा दिया. पहले ही दिन मिस्र की शक्तिशाली वायु सेना को इसराइल ने ध्वस्त कर दिया. दरअसल इसराइली जेट विमानों ने बमबारी करके मिस्र के विमानों को नष्ट कर दिया. इस युद्ध के बाद इसराइल को मिले इलाक़ों से इसराइल का क्षेत्रफल और बढ़ गया. इस युद्ध में जीत से इसराइल और उसके समर्थकों का आत्मविश्वास बढ़ गया. लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव संख्या 242 पारित किया और ज़ोर देकर कहा कि युद्ध के बल पर हासिल इलाक़े को मान्यता नहीं दी जाएगी. इसराइल से अपील की गई कि वह युद्ध के बाद हथियाए गए इलाक़ों को ख़ाली कर दे. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ इस युद्ध के कारण क़रीब पाँच लाख फ़लस्तीनी दर-बदर हो गए और उन्होंने मिस्र, लेबनान, सीरिया और जॉर्डन में पनाह ली.
- 1973-77
जब सीरिया और मिस्र राजनयिक कोशिशों के माध्यम से 1967 के युद्ध के दौरान हारी हुई अपनी ज़मीन वापस न पा सके तो उन्होंने इसराइल पर हमला कर दिया। उन्होंने इसराइल पर हमला किया उनके महत्वपूर्ण पर्व यॉम किपूर पर ये हमला किया गया. ये संघर्ष रमज़ान युद्ध के रूप में भी जाना जाता है. शुरू में मिस्र और सीरिया सिनई और गोलान पहाड़ी इलाक़े में आगे बढ़े. लेकिन तीन हफ़्ते तक चली लड़ाई के बाद उन्हें पीछे हटना पड़ा. उल्टे इसराइल ने 1967 के युद्ध के बाद के अपने इलाक़े में थोड़ा और विस्तार कर लिया. इसराइली सैनिक गोलान पहाड़ी से आगे भी सीरिया के क्षेत्र में घुस गए हालाँकि बाद में उन्होंने कुछ इलाक़े वापस कर दिए. मिस्र में भी इसराइली सैनिकों ने कई इलाक़ों पर फिर से नियंत्रण कर लिया और स्वेज़ नहर के पश्चिमी हिस्सों की ओर भी बढ़ गए. अमरीका, सोवियत संघ और संयुक्त राष्ट्र- सभी ने कूटनीतिक कोशिश करके युद्धविराम समझौता कराने की कोशिश की. इस युद्ध में सीरिया और मिस्र के कुल साढ़े आठ हज़ार सैनिक मारे गए जबकि 6000 इसराइली सैनिक भी युद्ध के दौरान मारे गए. इस युद्ध के बाद सैनिक, कूटनीतिक और आर्थिक समर्थन के लिए इसराइल अमरीका पर ज़्यादा निर्भर हो गया. युद्ध के कुछ ही समय बाद सऊदी अरब ने उन देशों को पेट्रोलियम पदार्थ देने पर रोक लगा दी, जिन्होंने इसराइल का समर्थन किया था. इस प्रतिबंध के कारण पेट्रोल की क़ीमतों में काफ़ी बढ़ोतरी हुई और दुनियाभर में ईंधन की कमी हो गई. यह स्थिति मार्च 1974 तक रही. अक्तूबर 1973 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 338 पारित किया. इस प्रस्ताव के तहत युद्ध में शामिल सभी देशों से अपील की गई कि वे अपनी सैनिक गतिविधियाँ तुरंत बंद कर दें और मध्य पूर्व में स्थायी शांति के लिए आपस में बातचीत करें. 1974 1970 के दशक में यासिर अराफ़ात के नेतृत्व में पीएलओ के गुट और अबू निदाल जैसे अन्य फ़लस्तीनी चरमपंथी गुटों ने इसराइल और अन्य ठिकानों पर हमले किए. ऐसा ही एक हमला 1972 के म्यूनिख ओलंपिक के दौरान हुआ जिसमें 11 इसराइली एथलीट मारे गए. हालाँकि पीएलओ फ़लस्तीन की आज़ादी के लिए सशस्त्र संघर्ष की बात करता था, लेकिन 1974 में यासिर अराफ़ात आश्चर्यजनक रूप से संयुक्त राष्ट्र में आए और शांतिपूर्ण समाधान की बात कही. उन्होंने ज़ायनिस्ट योजना की आलोचना की और कहा, "आज मैं एक हाथ में जैतून की टहनी (शांति का प्रतीक चिह्न) और दूसरे हाथ में बंदूक लेकर यहाँ आया हूँ. आप मेरे हाथ से इस जैतून की टहनी को गिरन न दें." अपने स्वतंत्र राष्ट्र की मांग कर रहे फ़लस्तीनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन की दिशा में यासिर अराफ़ात के भाषण को काफ़ी महत्वपूर्ण माना जाता है. एक साल बाद तत्कालीन अमरीकी विदेश मंत्रायल के अधिकारी हेरॉल्ड सौन्डर्स ने पहली बार स्वीकार किया कि अरब-इसराइल शांति वार्ता में फ़लस्तीनी अरबों की जायज़ मांगों का भी ध्यान रखा जाए. 1977 उग्रवादी इरगुनी और लेही ग्रुप की भले ही एक स्वतंत्र इसराइली राष्ट्र के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका रही हो लेकिन हेरत पार्टी (बाद में लिकुद पार्टी) में उनके उत्तराधिकारी 1977 तक चुनाव नहीं जीत पाए. उस समय तक इसराइली राजनीति में वामपंथी विचारधारा वाले लेबर पार्टी का वर्चस्व था. लिकुद पार्टी की विचारधारा में शामिल था इसराइली राष्ट्र का विस्तार करना और इसे ब्रितानी फ़लस्तीन जितना फैला लेना. साथ में उनका लक्ष्य यह भी था कि जॉर्डन के कुछ हिस्सों पर भी क़ब्ज़ा किया जाए और बाइबिल में जिस इसराइल का वर्णन है, उसका गठन किया जाए. पूर्व इरगुन नेता मेनाचेम बेगिन की अगुआई वाली नयी सरकार ने पश्चिमी तट और गज़ा में यहूदी बस्तियाँ बसाने के लिए गतिविधियाँ तेज़ कर दी. उस समय के कृषि मंत्री अरियल शेरॉन ने इस अभियान का नेतृत्व किया.
जब सीरिया और मिस्र राजनयिक कोशिशों के माध्यम से 1967 के युद्ध के दौरान हारी हुई अपनी ज़मीन वापस न पा सके तो उन्होंने इसराइल पर हमला कर दिया। उन्होंने इसराइल पर हमला किया उनके महत्वपूर्ण पर्व यॉम किपूर पर ये हमला किया गया. ये संघर्ष रमज़ान युद्ध के रूप में भी जाना जाता है. शुरू में मिस्र और सीरिया सिनई और गोलान पहाड़ी इलाक़े में आगे बढ़े. लेकिन तीन हफ़्ते तक चली लड़ाई के बाद उन्हें पीछे हटना पड़ा. उल्टे इसराइल ने 1967 के युद्ध के बाद के अपने इलाक़े में थोड़ा और विस्तार कर लिया. इसराइली सैनिक गोलान पहाड़ी से आगे भी सीरिया के क्षेत्र में घुस गए हालाँकि बाद में उन्होंने कुछ इलाक़े वापस कर दिए. मिस्र में भी इसराइली सैनिकों ने कई इलाक़ों पर फिर से नियंत्रण कर लिया और स्वेज़ नहर के पश्चिमी हिस्सों की ओर भी बढ़ गए. अमरीका, सोवियत संघ और संयुक्त राष्ट्र- सभी ने कूटनीतिक कोशिश करके युद्धविराम समझौता कराने की कोशिश की. इस युद्ध में सीरिया और मिस्र के कुल साढ़े आठ हज़ार सैनिक मारे गए जबकि 6000 इसराइली सैनिक भी युद्ध के दौरान मारे गए. इस युद्ध के बाद सैनिक, कूटनीतिक और आर्थिक समर्थन के लिए इसराइल अमरीका पर ज़्यादा निर्भर हो गया. युद्ध के कुछ ही समय बाद सऊदी अरब ने उन देशों को पेट्रोलियम पदार्थ देने पर रोक लगा दी, जिन्होंने इसराइल का समर्थन किया था. इस प्रतिबंध के कारण पेट्रोल की क़ीमतों में काफ़ी बढ़ोतरी हुई और दुनियाभर में ईंधन की कमी हो गई. यह स्थिति मार्च 1974 तक रही. अक्तूबर 1973 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 338 पारित किया. इस प्रस्ताव के तहत युद्ध में शामिल सभी देशों से अपील की गई कि वे अपनी सैनिक गतिविधियाँ तुरंत बंद कर दें और मध्य पूर्व में स्थायी शांति के लिए आपस में बातचीत करें. 1974 1970 के दशक में यासिर अराफ़ात के नेतृत्व में पीएलओ के गुट और अबू निदाल जैसे अन्य फ़लस्तीनी चरमपंथी गुटों ने इसराइल और अन्य ठिकानों पर हमले किए. ऐसा ही एक हमला 1972 के म्यूनिख ओलंपिक के दौरान हुआ जिसमें 11 इसराइली एथलीट मारे गए. हालाँकि पीएलओ फ़लस्तीन की आज़ादी के लिए सशस्त्र संघर्ष की बात करता था, लेकिन 1974 में यासिर अराफ़ात आश्चर्यजनक रूप से संयुक्त राष्ट्र में आए और शांतिपूर्ण समाधान की बात कही. उन्होंने ज़ायनिस्ट योजना की आलोचना की और कहा, "आज मैं एक हाथ में जैतून की टहनी (शांति का प्रतीक चिह्न) और दूसरे हाथ में बंदूक लेकर यहाँ आया हूँ. आप मेरे हाथ से इस जैतून की टहनी को गिरन न दें." अपने स्वतंत्र राष्ट्र की मांग कर रहे फ़लस्तीनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन की दिशा में यासिर अराफ़ात के भाषण को काफ़ी महत्वपूर्ण माना जाता है. एक साल बाद तत्कालीन अमरीकी विदेश मंत्रायल के अधिकारी हेरॉल्ड सौन्डर्स ने पहली बार स्वीकार किया कि अरब-इसराइल शांति वार्ता में फ़लस्तीनी अरबों की जायज़ मांगों का भी ध्यान रखा जाए. 1977 उग्रवादी इरगुनी और लेही ग्रुप की भले ही एक स्वतंत्र इसराइली राष्ट्र के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका रही हो लेकिन हेरत पार्टी (बाद में लिकुद पार्टी) में उनके उत्तराधिकारी 1977 तक चुनाव नहीं जीत पाए. उस समय तक इसराइली राजनीति में वामपंथी विचारधारा वाले लेबर पार्टी का वर्चस्व था. लिकुद पार्टी की विचारधारा में शामिल था इसराइली राष्ट्र का विस्तार करना और इसे ब्रितानी फ़लस्तीन जितना फैला लेना. साथ में उनका लक्ष्य यह भी था कि जॉर्डन के कुछ हिस्सों पर भी क़ब्ज़ा किया जाए और बाइबिल में जिस इसराइल का वर्णन है, उसका गठन किया जाए. पूर्व इरगुन नेता मेनाचेम बेगिन की अगुआई वाली नयी सरकार ने पश्चिमी तट और गज़ा में यहूदी बस्तियाँ बसाने के लिए गतिविधियाँ तेज़ कर दी. उस समय के कृषि मंत्री अरियल शेरॉन ने इस अभियान का नेतृत्व किया.
- 1979-82
मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात ने इसराइल की यात्रा करके सारी दुनिया को सन्न कर दिया। इतना ही नहीं उन्होंने 19 नवंबर 1977 को येरूशलम में इसराइली संसद को भी संबोधित किया. सादात पहले ऐसे अरब नेता बने जिन्होंने इसराइल को मान्यता दी. सितंबर 1978 में मिस्र और इसराइल ने कैम्प डेविड समझौते पर दस्तख़त किए. इस समझौते में मध्य पूर्व में शांति की रूपरेखा खींची गई. समझौते में फ़लस्तीनियों को सीमित स्वायत्तता देने की भी बात थी. छह महीने बाद मार्च 1979 में मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात और इसराइल के प्रधानमंत्री मेनाचेम बेगिन ने द्विपक्षीय समझौते पर भी हस्ताक्षर किए. 1967 के युद्ध के बाद इसराइल ने सिनई पर क़ब्ज़ा कर लिया था, उसे मिस्र को लौटा दिया गया. मिस्र की इसराइल के साथ संधि और बातचीत के कारण अरब देशों ने मिस्र का बहिष्कार कर दिया. मिस्र की सेना में इस्लामी तत्त्वों ने 1981 में सादात की हत्या कर दी. ये लोग इसराइल के साथ शांति के विरोधी थे. 1982 1982 की गर्मियों में इसराइली सेना ने लेबनान पर हमला कर दिया. पीस फ़ॉर गैलिली नाम की इस कार्रवाई का उद्देश्य था इसराइल की उत्तरी सीमा से लगे फ़लस्तीनी गुरिल्ला ठिकाने को ख़त्म करना. लेकिन उस समय इसराइल के रक्षा मंत्री अरियल शेरॉन के इशारे पर इसराइली सैनिक बेरूत तक पहुँच गए और पीएलओ को वहाँ से खदेड़ दिया. इसराइल ने 6 जून को हमला किया. दरअसल लंदन में इसराइली दूत श्लोमो आर्गोव पर हुए हमले के कारण इसराइल ने हमला शुरू किया. इस हमले में फ़लस्तीनी चरमपंथी गुट अबू निदाल का हाथ था. इसराइली सैनिक अगस्त में बेरूत पहुँचे. युद्धविराम समझौते के बाद पीएलओ को लेबनान से निकाल दिया गया. सितंबर में बेरूत में इसराइली सैनिक भी मौजूद थे. उसी समय क्रिश्चियन फलांगे के नेता बशीर गेमायल उनके मुख्यालय पर हुए बम हमले में मारे गए. अगले ही दिन इसराइली सेना ने पश्चिमी बेरूत पर क़ब्ज़ा कर लिया. 16 से 18 सितंबर तक फाल्गनिस्टों ने सैकड़ों फ़लस्तीनियों की हत्या की. फाल्गनिस्ट इसराइल से मिले हुए थे. साबरा और शातिला शरणार्थी शिविर में ये ख़ूनी खेल हुआ. 1983 में इस घटना की जाँच में यह पाया गया कि रक्षा मंत्री अरियल शेरॉन यह संहार रोकने में नाकाम रहे थे. इस कारण शेरॉन ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.
मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात ने इसराइल की यात्रा करके सारी दुनिया को सन्न कर दिया। इतना ही नहीं उन्होंने 19 नवंबर 1977 को येरूशलम में इसराइली संसद को भी संबोधित किया. सादात पहले ऐसे अरब नेता बने जिन्होंने इसराइल को मान्यता दी. सितंबर 1978 में मिस्र और इसराइल ने कैम्प डेविड समझौते पर दस्तख़त किए. इस समझौते में मध्य पूर्व में शांति की रूपरेखा खींची गई. समझौते में फ़लस्तीनियों को सीमित स्वायत्तता देने की भी बात थी. छह महीने बाद मार्च 1979 में मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात और इसराइल के प्रधानमंत्री मेनाचेम बेगिन ने द्विपक्षीय समझौते पर भी हस्ताक्षर किए. 1967 के युद्ध के बाद इसराइल ने सिनई पर क़ब्ज़ा कर लिया था, उसे मिस्र को लौटा दिया गया. मिस्र की इसराइल के साथ संधि और बातचीत के कारण अरब देशों ने मिस्र का बहिष्कार कर दिया. मिस्र की सेना में इस्लामी तत्त्वों ने 1981 में सादात की हत्या कर दी. ये लोग इसराइल के साथ शांति के विरोधी थे. 1982 1982 की गर्मियों में इसराइली सेना ने लेबनान पर हमला कर दिया. पीस फ़ॉर गैलिली नाम की इस कार्रवाई का उद्देश्य था इसराइल की उत्तरी सीमा से लगे फ़लस्तीनी गुरिल्ला ठिकाने को ख़त्म करना. लेकिन उस समय इसराइल के रक्षा मंत्री अरियल शेरॉन के इशारे पर इसराइली सैनिक बेरूत तक पहुँच गए और पीएलओ को वहाँ से खदेड़ दिया. इसराइल ने 6 जून को हमला किया. दरअसल लंदन में इसराइली दूत श्लोमो आर्गोव पर हुए हमले के कारण इसराइल ने हमला शुरू किया. इस हमले में फ़लस्तीनी चरमपंथी गुट अबू निदाल का हाथ था. इसराइली सैनिक अगस्त में बेरूत पहुँचे. युद्धविराम समझौते के बाद पीएलओ को लेबनान से निकाल दिया गया. सितंबर में बेरूत में इसराइली सैनिक भी मौजूद थे. उसी समय क्रिश्चियन फलांगे के नेता बशीर गेमायल उनके मुख्यालय पर हुए बम हमले में मारे गए. अगले ही दिन इसराइली सेना ने पश्चिमी बेरूत पर क़ब्ज़ा कर लिया. 16 से 18 सितंबर तक फाल्गनिस्टों ने सैकड़ों फ़लस्तीनियों की हत्या की. फाल्गनिस्ट इसराइल से मिले हुए थे. साबरा और शातिला शरणार्थी शिविर में ये ख़ूनी खेल हुआ. 1983 में इस घटना की जाँच में यह पाया गया कि रक्षा मंत्री अरियल शेरॉन यह संहार रोकने में नाकाम रहे थे. इस कारण शेरॉन ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.
-1987-88
इसराइली क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ जन आंदोलन यानी इंतिफ़ादा पहले गज़ा में शुरू हुआ और जल्द ही पश्चिमी तट में भी फैल गया. आंदोलन में नागरिक अवज्ञा, हड़ताल, इसराइली सामानों का बहिष्कार किया गया. लेकिन इसराइली सैनिकों पर पत्थरबाज़ी की घटना के कारण दुनिया का ध्यान इस पर गया. इसराइली सैनिकों ने इसका जवाब दिया और बड़ी संख्या में फ़लस्तीनी मारे गए. 1993 तक चले इस संघर्ष में एक हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए. 1988 अपनी सैनिक शक्ति के बावजूद इसराइल 1987 में शुरू हुए इंतिफ़ादा को रोकने में नाकाम रहा. इसराइली क़ब्ज़े में रहने वाले सभी फ़लस्तीनियों ने इस इंतिफ़ादा का समर्थन किया. 1982 में लेबनान से निकाले जाने के बाद पीएलओ ट्यूनीशिया से काम कर रहा था. इंतिफ़ादा के शुरू होने से फ़लस्तीनी क्रांति में अपनी मुख्य भूमिका के प्रति संगठन को ख़तरा लगने लगा. क्योंकि इंतिफ़ादा के कारण सबका ध्यान इसराइल के क़ब्ज़े वाले इलाक़े पर चला गया. निर्वासन में अपने को फ़लस्तीनी सरकार कहने वाले फ़लस्तीनी राष्ट्रीय परिषद ने नवंबर 1988 में अल्जीरिया में बैठक बुलाई. इस बैठक में संयुक्त राष्ट्र के 1947 के दो राष्ट्र के सिद्धांत के पक्ष में मतदान हुआ. बैठक में आतंकवाद की निंदा की गई और प्रस्ताव संख्या 242 के आधार पर बातचीत से मसला सुलझाने की वकालत भी की गई. अमरीका ने भी पीएलओ के साथ बातचीत शुरू कर दी. लेकिन इसराइल अपनी इस बात पर डटा रहा कि पीएलओ एक आतंकवादी संगठन है. जिसके साथ वो बातचीत नहीं करेगा. इसके बदले इसराइली प्रधानमंत्री इत्ज़ाक शमीर ने स्वशासन के मुद्दे पर समझौते से पहले क़ब्ज़े वाले इलाक़े में चुनाव का प्रस्ताव रखा.
- 1991-93
1991 का खाड़ी युद्ध पीएलओ और उसके नेता यासिर अराफ़ात के लिए बहुत बड़ा संकट साबित हुआ. इराक़ का समर्थन करने के कारण पीएलओ को खाड़ी में अपने धनाढ़्य समर्थकों से हाथ धोना पड़ा. कुवैत को इराक़ी क़ब्ज़े से छुड़ाने के बाद अमरीकी प्रशासन ने मध्य पूर्व में शांति प्रक्रिया पर ध्यान देना शुरू किया. इस प्रक्रिया ने वित्तीय रूप से कमज़ोर और राजनीति रूप से अलग-थलग पड़ चुके यासिर अराफ़ात का भी ध्यान खींचा. लेकिन इससे इसराइल के कट्टरवादी प्रधानमंत्री इत्ज़ाक शमीर ज़्यादा प्रभावित नहीं हुए. अमरीकी विदेश मंत्री जेम्स बेकर ने इलाक़े की कई बार यात्रा की और मैड्रिड में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के लिए ज़मीन तैयार की. सीरिया ने भी इस बैठक में हिस्सा लेने पर सहमति जताई इस उम्मीद में कि इसमें गोलान पहाड़ी लौटाने पर भी बातचीत होगी. जॉर्डन ने भी सम्मेलन में आने का न्यौता स्वीकार कर लिया. लेकिन शमीर ने पीएलओ से सीधे बात करने से इनकार कर दिया. इसके बाद जॉर्डन और फ़लस्तीनियों का संयुक्त प्रतिनिधिमंडल तैयार हुआ जिसमें पीएलओ से कोई नहीं था. सम्मेलन से कुछ दिन पहले वॉशिंगटन ने क़ब्ज़े वाले इलाक़े में बस्तियाँ बसाने को लेकर इसराइल की 10 अरब डॉलर की कर्ज़ गारंटी को रोक दिया. 30 अक्तूबर को शुरू हुए इस सम्मेलन पर दुनियाभर की नज़र थी. सम्मेलन में शामिल हुए प्रत्येक देशों को अपनी बात रखने के लिए 45 मिनट का समय दिया गया. फ़लस्तीनियों ने इसराइल के साथ भविष्य पर अपनी बात रखी. इसराइली प्रधानमंत्री शमीर ने यहूदी राष्ट्र के अस्तित्त्व को सही ठहराया. जबकि सीरिया के विदेश मंत्री फ़ारूक़ अल शारा ने शमीर के 'आतंकवादी' अतीत पर सवाल उठाए. इस सम्मेलन के बाद अमरीका ने इसराइल और सीरिया के साथ अलग से द्विपक्षीय बातचीत भी कराई. जॉर्डन-फ़लस्तीनी प्रतिनिधिमंडल से भी द्विपक्षीय बात हुई. 1993 जून 1992 में इत्ज़ाक राबिन की अगुआई में वामपंथी सरकार के गठन के बाद 1990 के दशक के मध्य में इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच शांति की कई बार कोशिश तो हुई लेकिन आवेश में. सरकार में राबिन को कट्टरपंथी माना जाता था तो शिमॉन पेरेज़ और योसी बेईलिन को अपेक्षाकृत उदारवादी समझा जाता था. फ़लस्तीनी लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (पीएलओ) भी शांति प्रक्रिया के लिए उतावला दिख रहा था क्योंकि खाड़ी युद्ध के बाद उसकी स्थिति थोड़ी कमज़ोर हुई थी. वाशिंगटन में होने वाली द्विपक्षीय बातचीत के लिए इसराइल ने पीएलवो के प्रतिनिधियों पर से प्रतिबंध हटा लिया. इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात ये थी कि इसराइली विदेश मंत्री पेरेज़ और उनके सहयोगी मंत्री बेईलिन ने नॉर्वे की मध्यस्थता से गुप्त रूप से बातचीत के लिए भी कोशिश की. वाशिंगटन में हो रही द्विपक्षीय वार्ता का कोई नतीजा निकलता नहीं दिख रहा था. इसी कारण गुप्त रूप से चलने वाली ओस्लो वार्ता 20 जनवरी 1993 को शुरू हुई. नॉर्व के शहर सार्प्सबर्ग में हुई इस बातचीत में आश्चर्यजनक रूप से प्रगति हुई. इसराइली क़ब्ज़े को चरणबद्ध तरीक़े से ख़त्म करने के बदले फ़लस्तीनी इसराइल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दे- इस पर काफ़ी विचार-विमर्श हुआ. बातचीत के बाद ऐतिहासिक घोषणापत्र पर दस्तख़त हुए और दुनियाभर ने व्हाइट हाउस के लॉन में राबिन और यासिर अराफ़ात को हाथ मिलाते देखा.
इसराइली क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ जन आंदोलन यानी इंतिफ़ादा पहले गज़ा में शुरू हुआ और जल्द ही पश्चिमी तट में भी फैल गया. आंदोलन में नागरिक अवज्ञा, हड़ताल, इसराइली सामानों का बहिष्कार किया गया. लेकिन इसराइली सैनिकों पर पत्थरबाज़ी की घटना के कारण दुनिया का ध्यान इस पर गया. इसराइली सैनिकों ने इसका जवाब दिया और बड़ी संख्या में फ़लस्तीनी मारे गए. 1993 तक चले इस संघर्ष में एक हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए. 1988 अपनी सैनिक शक्ति के बावजूद इसराइल 1987 में शुरू हुए इंतिफ़ादा को रोकने में नाकाम रहा. इसराइली क़ब्ज़े में रहने वाले सभी फ़लस्तीनियों ने इस इंतिफ़ादा का समर्थन किया. 1982 में लेबनान से निकाले जाने के बाद पीएलओ ट्यूनीशिया से काम कर रहा था. इंतिफ़ादा के शुरू होने से फ़लस्तीनी क्रांति में अपनी मुख्य भूमिका के प्रति संगठन को ख़तरा लगने लगा. क्योंकि इंतिफ़ादा के कारण सबका ध्यान इसराइल के क़ब्ज़े वाले इलाक़े पर चला गया. निर्वासन में अपने को फ़लस्तीनी सरकार कहने वाले फ़लस्तीनी राष्ट्रीय परिषद ने नवंबर 1988 में अल्जीरिया में बैठक बुलाई. इस बैठक में संयुक्त राष्ट्र के 1947 के दो राष्ट्र के सिद्धांत के पक्ष में मतदान हुआ. बैठक में आतंकवाद की निंदा की गई और प्रस्ताव संख्या 242 के आधार पर बातचीत से मसला सुलझाने की वकालत भी की गई. अमरीका ने भी पीएलओ के साथ बातचीत शुरू कर दी. लेकिन इसराइल अपनी इस बात पर डटा रहा कि पीएलओ एक आतंकवादी संगठन है. जिसके साथ वो बातचीत नहीं करेगा. इसके बदले इसराइली प्रधानमंत्री इत्ज़ाक शमीर ने स्वशासन के मुद्दे पर समझौते से पहले क़ब्ज़े वाले इलाक़े में चुनाव का प्रस्ताव रखा.
- 1991-93
1991 का खाड़ी युद्ध पीएलओ और उसके नेता यासिर अराफ़ात के लिए बहुत बड़ा संकट साबित हुआ. इराक़ का समर्थन करने के कारण पीएलओ को खाड़ी में अपने धनाढ़्य समर्थकों से हाथ धोना पड़ा. कुवैत को इराक़ी क़ब्ज़े से छुड़ाने के बाद अमरीकी प्रशासन ने मध्य पूर्व में शांति प्रक्रिया पर ध्यान देना शुरू किया. इस प्रक्रिया ने वित्तीय रूप से कमज़ोर और राजनीति रूप से अलग-थलग पड़ चुके यासिर अराफ़ात का भी ध्यान खींचा. लेकिन इससे इसराइल के कट्टरवादी प्रधानमंत्री इत्ज़ाक शमीर ज़्यादा प्रभावित नहीं हुए. अमरीकी विदेश मंत्री जेम्स बेकर ने इलाक़े की कई बार यात्रा की और मैड्रिड में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के लिए ज़मीन तैयार की. सीरिया ने भी इस बैठक में हिस्सा लेने पर सहमति जताई इस उम्मीद में कि इसमें गोलान पहाड़ी लौटाने पर भी बातचीत होगी. जॉर्डन ने भी सम्मेलन में आने का न्यौता स्वीकार कर लिया. लेकिन शमीर ने पीएलओ से सीधे बात करने से इनकार कर दिया. इसके बाद जॉर्डन और फ़लस्तीनियों का संयुक्त प्रतिनिधिमंडल तैयार हुआ जिसमें पीएलओ से कोई नहीं था. सम्मेलन से कुछ दिन पहले वॉशिंगटन ने क़ब्ज़े वाले इलाक़े में बस्तियाँ बसाने को लेकर इसराइल की 10 अरब डॉलर की कर्ज़ गारंटी को रोक दिया. 30 अक्तूबर को शुरू हुए इस सम्मेलन पर दुनियाभर की नज़र थी. सम्मेलन में शामिल हुए प्रत्येक देशों को अपनी बात रखने के लिए 45 मिनट का समय दिया गया. फ़लस्तीनियों ने इसराइल के साथ भविष्य पर अपनी बात रखी. इसराइली प्रधानमंत्री शमीर ने यहूदी राष्ट्र के अस्तित्त्व को सही ठहराया. जबकि सीरिया के विदेश मंत्री फ़ारूक़ अल शारा ने शमीर के 'आतंकवादी' अतीत पर सवाल उठाए. इस सम्मेलन के बाद अमरीका ने इसराइल और सीरिया के साथ अलग से द्विपक्षीय बातचीत भी कराई. जॉर्डन-फ़लस्तीनी प्रतिनिधिमंडल से भी द्विपक्षीय बात हुई. 1993 जून 1992 में इत्ज़ाक राबिन की अगुआई में वामपंथी सरकार के गठन के बाद 1990 के दशक के मध्य में इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच शांति की कई बार कोशिश तो हुई लेकिन आवेश में. सरकार में राबिन को कट्टरपंथी माना जाता था तो शिमॉन पेरेज़ और योसी बेईलिन को अपेक्षाकृत उदारवादी समझा जाता था. फ़लस्तीनी लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (पीएलओ) भी शांति प्रक्रिया के लिए उतावला दिख रहा था क्योंकि खाड़ी युद्ध के बाद उसकी स्थिति थोड़ी कमज़ोर हुई थी. वाशिंगटन में होने वाली द्विपक्षीय बातचीत के लिए इसराइल ने पीएलवो के प्रतिनिधियों पर से प्रतिबंध हटा लिया. इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात ये थी कि इसराइली विदेश मंत्री पेरेज़ और उनके सहयोगी मंत्री बेईलिन ने नॉर्वे की मध्यस्थता से गुप्त रूप से बातचीत के लिए भी कोशिश की. वाशिंगटन में हो रही द्विपक्षीय वार्ता का कोई नतीजा निकलता नहीं दिख रहा था. इसी कारण गुप्त रूप से चलने वाली ओस्लो वार्ता 20 जनवरी 1993 को शुरू हुई. नॉर्व के शहर सार्प्सबर्ग में हुई इस बातचीत में आश्चर्यजनक रूप से प्रगति हुई. इसराइली क़ब्ज़े को चरणबद्ध तरीक़े से ख़त्म करने के बदले फ़लस्तीनी इसराइल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दे- इस पर काफ़ी विचार-विमर्श हुआ. बातचीत के बाद ऐतिहासिक घोषणापत्र पर दस्तख़त हुए और दुनियाभर ने व्हाइट हाउस के लॉन में राबिन और यासिर अराफ़ात को हाथ मिलाते देखा.
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