नक्सलवाद से सबसे ज़्यादा प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ में पुलिस ने पीयूसीएल के एक पदाधिकारी को गिरफ़्तार कर लिया है.
डॉ विनायक सेन पर आरोप है कि वे कथित रुप नक्सलियों की मदद कर रहे थे.
उनकी गिरफ़्तारी के बाद मानों पूरे देश में खलबली सी मची हुई है। कुल मिलाकर दिखता है कि देश के बौद्धिक और नागरिक समाज की अनुवाई करने वालों का एक बड़ा हिस्सा इन गिरफ़्तारियों के ख़िलाफ़ खड़ा है।
सरकारी आँकड़ा बताता है कि उसी छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर इलाक़े में पिछले दो साल में पाँच सौ से अधिक आदिवासियों की मौत हो चुकी है.या तो वे नक्सलियों के हाथों मारे गए हैं या फिर नक्सली होने के शक में पुलिस के हाथों मारे गए हैं.
सरकार ही बताती है कि पचास हज़ार से ज़्यादा आदिवासियों को उनके गाँवों से उजाड़कर सड़कों के किनारे कैंपों में लाकर रखा गया है. वह भी ऐसे कैंपों में जहाँ नक्सली जब चाहते हैं, हमला कर देते हैं. हज़ारों लोग पड़ोस के राज्यों आँध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और उड़ीसा में पलायन कर गए हैं और कठिन जीवन गुज़ार रहे हैं. न कैंपों में रह रहे आदिवासियों की सुध लेने की किसी को मोहलत है और न पलायन कर गए आदिवासियों का हाल पूछने की फ़ुर्सत किसी को है.
- क्या इस मारा मारी मे इस बात का ख़्याल किया गया कि सलवा जुडूम शुरू होने के बाद छत्तीसगढ़ मे बहुत सी कम्पनिया आ रही है। इन कम्पनियों को ना नक्सल समर्थक और ना नक्सल विरोधी ही नुकसान पहुँचा रहे है। क्या ये सब राज्य मे उद्योग को फैलाने के लिए तो नही किया जा रहा। इसे कौन साबित करेगा कि उद्योगों के लिए बिछाई जा रही लाल कालीन , आदिवासियों के खून से सुर्ख नही है।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
2 comments:
कुमार परवेज जी छत्तीसगढ के बस्तर में जो कम्पनियां आ रही हैं वो पिछले तीन चार साल से पहले की आई हुई हैं, कोई भी कारपोरेट या मल्टीनेशनल या फिर नेशनल कंपनियां नक्सली मार काट को देख कर भी सिर्फ शासन के कहने मात्र से बस्तर में नही आ जायेगी इतिहास गवाह है कि शंकर गुहा नियोगी के समय में छत्तीसगढ मुक्ति मोर्चे के आतंक की वजह से छत्तीसगढ की कंपनियां भाग गयी थी और बाहर से आने वाली कंपनियां मजदूर आंदोलन के डर से यहां नही आई थी। हम मजदूर आंदोलन के विरोधी नही हैं पर आतंक का राज्य चाहे तथाकथित नक्सलियों का हो या मजदूरों का उचित नही है शांतिपूर्ण आंदोलन के हम पक्षधर हैं । डा सेन व पी यू सी एल नें छत्तीसगढ की जनता को हक के लिए आवाज उठाना सिखाया है छत्तीसगढ की जनता को चाहिए कि उनकी गिरफतारी के विरोध में आवाज उठाये आयातित आवाज से कुछ नही होने वाला । आज की परिस्थितियों में डा सेन व नक्सली पोस्टमेन संबंधी समाचार नक्सल विरोधी लहर में कुछ दब सी गयी है । जन मन की आवाज आज नक्सल विरोधी है छत्तीसगढ व बस्तर की जनता की सहनशक्ति नक्सल आतंक की पराकाष्ठा में पहुच चुकी है अभी जनता सिर्फ और सिर्फ नक्सलवाद की बुराई को सुनना चाहती है ।
माफ़ी चाहूंगा अब तक आपका ब्लॉग मेरी नज़र में नहीं आ पाया था।
जानकर खुशी हुई कि आपको छत्तीसगढ़ की बीट मिली हुई है।
क्या हम रायपुर या नई दिल्ली में बैठकर बस्तर में चल रहे नक्स्ली आंदोलन की रिपोर्टिंग कर सकते हैं , अगर हां तो यह कितना जमीनी होगा?
दूसरी बात जो मैं देख रहा हूं ना जानें क्यों अधिकतर पत्रकार ढंके छुपे शब्दों में नक्सलियों को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं क्या सिर्फ़ इसलिए कि सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ़ लिखना और बोलना पत्रकारिता का पहला पाठ है।
उपर संजीव जी ने जो कहा उस से काफ़ी हद तक सहमत हूं।
कृपया यह जरुर-जरुर देखें
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं व एक्टिविस्ट के नाम एक छत्तीसगढ़िया का पत्र
धन्यवाद्।
शुभकामनाएं
Post a Comment