भारत के सभी राज्यों मे यौन शिक्षा का विरोध हो रहा है। ये विरोध कुछ अजीब है। ये सब कुछ यौन शिक्षा के सिलेबस, नामकरण, और सुचानाओ को लेकर नही है। विरोधियो का मानना है कि इस विषय कि जरुरत ही नही है, क्योकि ये संस्कृति के विरूद्व है।
- संस्कृति का मतलब है , अपने आप को जानने का प्रयास करना। और इस अपने को जानने मे अपनी देह और उससे सम्बंधित कामनाओ और प्रक्रियाओ को जानना भी शामिल है। क्योकि उसको जाने बिना उस आत्मा को भी नही जाना जा सकता जो देह मे बसी है। और उसी कि प्रक्रियाओ के माध्यम से उसका अतिक्रमण भी भावनात्मक स्तर पर तो कर ही सकता है। जब हम brahamcharya या वासनाओ को जीतने कि बात करते है तब वह उन्हें और उनकी प्रक्रियाओ को जाने बिना नही किया जा सकता। योग और आसन आदि बदन के जरिये से आत्मा को सिद्ध करने कि प्रक्रिया है। इसलिये जो लोग शिक्षा मे एक ओर तो ध्यान , योग, प्राणायाम आदि के समर्थक है क्योकि उनसे न सिर्फ देह स्वस्थ रहती है, बल्कि अपनी इन्द्रियों और कामनाओ पर नियंत्रण रखा जा सकता है। वही लोग जब संस्कृति के नाम पर इन इन्द्रियों और उनसे सम्बंधित कामनाओ को समझाने वाली शिक्षा का न केवल विरोध करते है बल्कि उत्तेजना और उग्र आंदोलन करते है तो इसे सांस्कृतिक पाखंड ही कहा जा सकता है।
Thursday, 7 June 2007
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4 comments:
मित्र, समस्या "यौन शिक्षा" के समर्थको के साथ है, सालो से ढोल पिट रहे है लेकिन आज तक कंही ये नहीं बताया की आखिर वो बच्चों को पढायेगें क्या? मुझे लगता है कि पहले "यौन शिक्षा" का पुरा पाठयक्रम तैयार करें, सारी पुस्तके तैयार करें, फिर सरकार/समाज के पास जाये कि हम ये पढाना चाह्ते हैं. विरोध करने वाले भी कुतर्क या हवा मे विरोध नहीं कर पायेगे.
"यौन शिक्षा" जारुरत ही नही हे,जरुरत हे चत्रिर निर्णमान की,पश्चिम की नकल कयो करे,फ़िर पश्चिम मॆ कया यौन शिक्षा कामयाव हे??,
यौन शिक्षा एक अनिवार्य शिक्षा होनी चाहिए. यौन शिक्षा का अर्थ व्याभिचार की शिक्षा नहीं है, यह विरोध करने वालो को समझना चाहिए.
मैं संजय जी से सहमत हूँ
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